Tuesday, April 28, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर

*****ग़ज़ल*****

शकूर अनवर

 

जब तेरी चश्मे-इनायत* से उतर जाऊॅंगा।

अपने अश्कों* में कहीं डूब के मर जाऊॅंगा।।

*

एक मुद्दत से ज़ुबाँ बन्द किये बैठा हूँ।

अब भी कुछ कह न सकूॅंगा तो बिखर जाऊॅंगा।।

*

जिसकी ताबीर* से दिन मेरे बदल जायेंगे।

ये भी मुमकिन है मैं उस ख़्वाब से डर जाऊॅंगा।।

*

तू वो क़ानून है जिसकी कोई फ़रियाद नहीं।

मैं वो इल्ज़ाम हूँ जो अपने ही सर जाऊॅंगा।।

*

होश खो दूॅं तो ये मॅंझधार डुबो देगी मुझे।

अज़्म* रक्खूॅंगा तो उस पार उतर जाऊॅंगा।।

*

कोई तो शाम मेरे नाम की ऐसी होगी।

जब परिंदों की तरह लौट के घर जाऊॅंगा।।

*

ज़िंदगी भर मुझे महसूस करोगे “अनवर”।

मैं कोई हल्का नशा हूँ कि उतर जाऊॅंगा।।

*

शब्दार्थ:-

चश्मे इनायत*कृपा दृष्टि

अश्कों*ऑंसुओं

ताबीर*स्वप्न फल,नतीजा

अज़्म*हौसला

*

शकूर अनवर

9460851271

***** ग़ज़ल*****

शकूर अनवर

 

मिलनसारी तुम्हारी और कुछ है।

तुम्हारी हमसे यारी और कुछ है।।

*

वफ़ादारी तुम्हारी जानता हूँ।

अदाकारी*तुम्हारी और कुछ है।।

*

हमारा जो जुनूँ* है सामने है।

तुम्हारी होशियारी और कुछ है।।

*

तुम्हारा सैर को जाना भी धोखा।

तुम्हारी घुड़-सवारी और कुछ है।।

*

ज़रा देखो समंदर का नज़ारा*।

यहाँ की चित्रकारी और कुछ है।।

*

जो दिखते हो तुम ऐसे तो नहीं हो।

तुम्हारी इंकसारी*और कुछ है।।

*

वहाॅं तुम हो उदू*भी साथ में है।

यहाॅं हालत हमारी और कुछ है।।

*

तुम्हें अपना कहूं तो कैसे “अनवर”।

तुम्हारी राज़दारी* और कुछ है।।

*

शब्दार्थ:-

अदाकारी*अभिनय

जुनूँ* दीवानगी

नज़ारा*दृष्य

इंकसारी*विनम्रता

उदू* प्रेमिका का प्रेमी, दुश्मन

राज़दारी* वफ़ादारी, लायल्टी

*

शकूर अनवर

9460851271

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