Saturday, April 25, 2026
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धृत सुत युयुत्सु……-कालीचरण राजपूत

धृत सुत युयुत्सु……

(महाभारत/आदिपर्व/संभव पर्व/अध्याय _114)

 

सुबल सुता थी गर्भ से,करती थी आराम ।

काल चक्र नहीं ठीक था, हुए विधाता बाम ।।1।।

गांधारी का महल था, धृत के ही नजदीक ।

तभी अनुचरी एक ने, डोर डाले ठीक ।।2।।

 

सुबल सुता के गर्भ में, दुर्योधन का स्थान ।

तब दासी धारी गर्भ, जाने सकल जहान।।3।।

 

गांधारी सुत थे प्रथम, युयुत्सु रहे द्वितीय ।

हक न मिला युयुत्सु को, दुर्यो थे अद्वितीय ।।4।।

 

गर्भ रहा था एक ही, तनय हुए शत एक ।

दासी भी थी गर्भिणी, यही नहीं था नेक ।।5।।

 

युयुत्सु रहा द्वितीय क्रम, गिना एक सौ एक ।

राजा सुत होते हुए, भाग्य नहीं था नेक ।।6।।

 

पांडव संग जा मिला, युयुत्सु उत्तम वीर ।

जब पांडव संग में गया, कौरव हुए अधीर ।।7।।

 

किसके दल में आ गया, उसे नहीं था भान ।

कृपा हुई भगवान की, बचा लिए तब प्राण ।।8।।

 

चीयर हरण के दृश्य में, खूब किया था विरोध ।

कौरव भाई तो सभी, करते रहते क्रोध ।।9।।

 

समय समय कहता रहा, कौरव के षडयंत्र ।

दुष्ट दुर्योधन के सभी, नहीं चले थे मंत्र ।। 10।।

नहीं चले थे मंत्र………

रचना के .सी राजपूत, कोटा।

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