धृत सुत युयुत्सु……
(महाभारत/आदिपर्व/संभव पर्व/अध्याय _114)
सुबल सुता थी गर्भ से,करती थी आराम ।
काल चक्र नहीं ठीक था, हुए विधाता बाम ।।1।।
गांधारी का महल था, धृत के ही नजदीक ।
तभी अनुचरी एक ने, डोर डाले ठीक ।।2।।
सुबल सुता के गर्भ में, दुर्योधन का स्थान ।
तब दासी धारी गर्भ, जाने सकल जहान।।3।।
गांधारी सुत थे प्रथम, युयुत्सु रहे द्वितीय ।
हक न मिला युयुत्सु को, दुर्यो थे अद्वितीय ।।4।।
गर्भ रहा था एक ही, तनय हुए शत एक ।
दासी भी थी गर्भिणी, यही नहीं था नेक ।।5।।
युयुत्सु रहा द्वितीय क्रम, गिना एक सौ एक ।
राजा सुत होते हुए, भाग्य नहीं था नेक ।।6।।
पांडव संग जा मिला, युयुत्सु उत्तम वीर ।
जब पांडव संग में गया, कौरव हुए अधीर ।।7।।
किसके दल में आ गया, उसे नहीं था भान ।
कृपा हुई भगवान की, बचा लिए तब प्राण ।।8।।
चीयर हरण के दृश्य में, खूब किया था विरोध ।
कौरव भाई तो सभी, करते रहते क्रोध ।।9।।
समय समय कहता रहा, कौरव के षडयंत्र ।
दुष्ट दुर्योधन के सभी, नहीं चले थे मंत्र ।। 10।।
नहीं चले थे मंत्र………
रचना के .सी राजपूत, कोटा।




