Saturday, April 25, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर 

ग़ज़ल

शकूर अनवर

 

हम ही कुछ दीवाने निकले।

वर्ना लोग सियाने निकले।।

*

सच्ची थी बस एक मुहब्बत।

बाक़ी सब अफ़साने निकले।।

*

जिसमें थी आबाद मुहब्बत।

उस दिल में वीराने निकले।।

*

उसकी गली में सब दीवाने।

क़िस्मत को चमकाने निकले।।

*

उरयानी* के इस मौसम में।

आप कहाँ शरमाने निकले।।

*

कहने को थी अपनी महफ़िल।

लोग मगर बेगाने निकले।।

*

पटरी पर इक लाश मिली है।

जेब से बारह आने निकले।।

*

शायद कुछ सन्नाटा टूटे।

हम भी शोर मचाने निकले।।

*

ऐसे भी गुज़री है “अनवर”।

हम घर से मर जाने निकले।।

*

शब्दार्थ:-

उरयानी*नग्नता,अश्लीलता

*

शकूर अनवर

9460851271

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