युवराज युधिष्ठिर…….
महाभारत, आदिपार्व, संभव पर्व, युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, अध्याय_138 पर आधारित।
गुरु द्रोण आदेश से, जीता द्रुपद नरेश ।
पीछे से लौटा दिया, उसका आधा देश ।।
पांडव सभी हो गए, शस्त्र कला में तेज ।
अब तक तो धृतराष्ट्र की, बुद्धि हो गई तेज ।।
सहिष्णुता, स्थिरता, धृति अरु अविचल सोहार्द ।
धर्मराज गुणवान हैं, है उनका भाई पार्थ ।
सक्षम, सदव्यवहारी युधि, सदाचार की रेख।
कर्म किये मन योग से, देव रहे सब देख ।।
क्षुर विपाठ सब वाण हैं, अर्जुन के यह अस्त्र ।
भल्ल नाराच शान से, ग्रहण किये सब शस्त्र ।।
आयुध वक्र विशाल हैं, अर्जुन करते प्यार ।
रिजु शस्त्र भी कम नहीं, जब लेता आकर ।।
क्षुर तो ऐसा वाण है, अगल-बगल में धार ।
विपाठ तेज अस्त्र यह, इसमें काफी भार ।।
नाराच भल्ल अस्त्र है, सीधा, टेढ़ा रूप ।
अलग-अलग वाण के, अलग अलग ही रूप ।।
ब्रह्मसिर मिला द्रोण से, सिख अर्जुन सा होय ।
अस्त्र यह अमोघ है, काट सके ना कोय ।।
शस्त्र तो वज्र समान है, होता प्रकाशमान ।
भारत में गुरु सिख भिड़े, जाने सकल जहान ।।





