Tuesday, June 2, 2026
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युवराज युधिष्ठिर-कवि कालीचरण राजपूत

युवराज युधिष्ठिर…….

महाभारत, आदिपार्व, संभव पर्व, युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, अध्याय_138 पर आधारित।

 

गुरु द्रोण आदेश से, जीता द्रुपद नरेश ।

पीछे से लौटा दिया, उसका आधा देश ।।

पांडव सभी हो गए, शस्त्र कला में तेज ।

अब तक तो धृतराष्ट्र की, बुद्धि हो गई तेज ।।

सहिष्णुता, स्थिरता, धृति अरु अविचल सोहार्द ।

धर्मराज गुणवान हैं, है उनका भाई पार्थ ।

सक्षम, सदव्यवहारी युधि, सदाचार की रेख।

कर्म किये मन योग से, देव रहे सब देख ।।

क्षुर विपाठ सब वाण हैं, अर्जुन के यह अस्त्र ।

भल्ल नाराच शान से, ग्रहण किये सब शस्त्र ।।

आयुध वक्र विशाल हैं, अर्जुन करते प्यार ।

रिजु शस्त्र भी कम नहीं, जब लेता आकर ।।

क्षुर तो ऐसा वाण है, अगल-बगल में धार ।

विपाठ तेज अस्त्र यह, इसमें काफी भार ।।

नाराच भल्ल अस्त्र है, सीधा, टेढ़ा रूप ।

अलग-अलग वाण के, अलग अलग ही रूप ।।

ब्रह्मसिर मिला द्रोण से, सिख अर्जुन सा होय ।

अस्त्र यह अमोघ है, काट सके ना कोय ।।

शस्त्र तो वज्र समान है, होता प्रकाशमान ।

भारत में गुरु सिख भिड़े, जाने सकल जहान ।।

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