Sunday, April 19, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर 

ग़ज़ल

शकूर अनवर

*

बिखरी बिखरी हर ख़ुशी अच्छी लगी।

मुन्तशिर* सी ज़िंदगी अच्छी लगी।।

*

उसकी दानाई* का मैं क़ाइल* हुआ।

मुझको उससे दुश्मनी अच्छी लगी।।

*

टेडी-मेढ़ी दूर तक ग़म की क़तार*।

साॅंप जैसी ये नदी अच्छी लगी।।

 

*

जा रहा था जब ये सूरज डूबने।

पंछियों की वापसी अच्छी लगी।।

*

होते-होते दिन भी पूरा हो गया।

जाते-जाते शाम भी अच्छी लगी।।

*

नर्म फूलों से चुने रस्ते भी थे।

क्यूँ झुलसती रेत ही अच्छी लगी।।

 

काॅंपती रातों का अपना हुस्न* था।

सर्दियों की चाॅंदनी अच्छी लगी।।

*

ऑंधियों के लश्करी अंदाज़” थे।

मौसमों की छावनी अच्छी लगी।।

*

जगमगाते शहर में “अनवर” मुझे।

बस अभावों की गली अच्छी लगी।।

*

शब्दार्थ:-

मुन्तशिर*अस्त व्यस्त,बिखरी हुई

दानाई*अक्लमंदी

क़ायल* मुरीद होना

क़तार* यानी पंक्ति

हुस्न*सौंदर्य

लश्करी अंदाज़*फौजी तरीका

*

शकूर अनवर

9460851271

*****ग़ज़ल******

शकूर अनवर

*

बेड़ा मेरा उस पार भी पहुॅंचेगा कभी तो।

तूफ़ान मेरी नाव से हारेगा कभी तो।।

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मैं उसकी मुहब्बत में गिरफ़्तार हूँ जैसे।

वो मेरे तरीक़े से भी सोचेगा कभी तो।।

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बैठा ही रहूॅंगा मैं इसी राहगुज़र* पर।

आवाज़ तो देगा, वो पुकारेगा कभी तो।।

*

हर रोज़ ही उगते हैं नये चाॅंद-सितारे।

अपना भी सितारा कोई बदलेगा कभी तो।।

*

अब तक तो खिलौना रहा हाथों में सभी के।

दिल अपनी तबीयत से भी मचलेगा कभी तो।।

*

है मेरे भी सीने में मुहब्बत का समन्दर।

इस बात को “अनवर” कोई समझेगा कभी तो।।

*

शब्दार्थ:-

राहगुज़र*आम रास्ता

तबीयत*स्वभाव

*

शकूर अनवर

9460851271

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