ग़ज़ल
शकूर अनवर
आस्तीनों में छुपाया हुआ ख़ंजर क्या है।
ख़ून-आलूदा वही शहर का मंज़र क्या है।।
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जब मेरे घर में कोई काॅंच की खिड़की भी नहीं।
फिर तेरे हाथ में ऐ दोस्त ये पत्थर क्या है।।
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तू सितमगर* है तो तलवार उठा काट मुझे।
मेरा क्या है मेरी औक़ात* मेरा सर क्या है।।
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इनको ऐसे भी तो समझो कि ये अच्छे दिन हैं।
फिर मेरी जान कोई ख़ौफ़ कोई डर क्या है।।
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ज़िंदगी भूख से ग़ुरबत* से मुक़ाबिल* ही रही।
हमने वो जंग लड़ी है कि सिकन्दर क्या है।।
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हो रहा है वही सब कुछ जो यहाँ होना था।
फिर भी अंदेशा* कोई ज़ह्न के अंदर क्या है।।
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दिल तो दिल है कई जंगल कई सहरा* इसमें।
दिल की वुसअत* के बराबर ये समन्दर क्या है।।
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सूरमा* कोई भी हो कौन बचा है इससे।
मौत के सामने अदना” सा ये “अनवर” क्या है।।
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शकूर अनवर
ख़ून-आलूदा*रक्त रंजित
सितमगर*अत्याचार करने वाला
औक़ात*हैसियत
ग़ुरबत*दरिद्रता गरीबी
मुक़ाबिल*युद्धरत
अंदेशा*ख़याल, वहम
सहरा*रेगिस्तान
वुसअत*विस्तार, फैलाव
सूरमा*बहादुर, निडर
अदना*तुच्छ
9460851271






