सांच बचन बजनी घणा
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क्यूं टकरावै सांच सूं,पड़ैन्ह भाया पार।
दसा मला दै झूंठ तो,पड़ै पाड़णी बा’र।।
बणै भायला झूंठ का,वे बी खावै मार।
सत को झंडो ठोक दै,न्याव करै दातार।।
सांच बोल तो काच ज्यूं,निरमल जळ की धार।
तरै सांच की नाव सा,होज्या बेड़ो पार।।
बिरला सत को साथ दै,रेवै सत की लार।
कंचन ज्यूं काया तपै,पाड़ै कोनै बा’र।।
सत का रथ मं बेठ कै,करणो जनम सुधार।
हामळ भर कै झूंठ की,होज्या बंटाधार।।
सांच बचन भगवान का,सांच बोलणो यार।
संगत सत की साधणी,नाव कराड़ै पार।।
सांच बचन बजनी घणा,दुगणो यांको दाम।
करै हमेसा फायदो,राजी राखै राम।।
सांची बाणी नीम ज्यूं,लागै छोछी जे’र।
सांच बचन ज्यो बोल दै,ऊंसूं खाडै बेर।।
सांच बोलण्यां भापड़ा,झूंठ बोलण्यां जंत।
घर बैठ्यां आवै बला,मलैन्ह कांई तंत।।
चालां चालै झूंठ की,मन मं पाळै आस।
कस्यांन होवै ऊबदो,भरज्या भाया सास।।
मन का भूखा लाळची,खावै बीरा कोस।
मान गमावै आपणो,दै दूजा नै दोस।।
कलम कोइनै काम की,मांडन्ह पावै सांच।
झूंठा होज्या फेसला,सत कै आवै आंच।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा





