जीना इसी का नाम है…
सर कलम करके, गिरा डाला है जमीन पर ।
कैसे-कैसे ये इंसान हैं, देखो इस मही पर ।।
रक्त बीज हूं मैं, गिरूंगा जहां फिर से जिऊंगा ।
नाम ही ऐसा है मेरा, लहू तुम्हारा ही पियूंगा ।।
पर तुमने कोई कसर, न छोड़ी मुझे मिटाने में ।
बड़ा होऊंगा मैं, तो कोई बैठेगा मेरे आशियाने में ।
ऐसे ही जीना छोड़ना, तो बस बुजदिल होगी ।
संसार में मैं नहीं, कई और होंगे भुगत भोगी ।
दशानन नहीं फिर भी, मेरी शाख आ ही गईं ।
ये टहनियां फिर, फलों की उम्मीद पा ही गईं ।।
मुझे साथ मिलता ही रहेगा,गर इस रसा का ।
ऋण उतारूंगा अभी, इस माता सी धरा का ।।
अगर मैं इस जमीन को, ऐसे ही छोड़ जाता हूं ।
वही रोपेगा मेदिनी में, जिसे मैं खूब भाता हूं ।।
मुझे चिंता नहीं अब, यह फल यहीं पर रहेगा ।
अब न किसी निर्दोष का खून “भू” पर बहेगा ।।
गवाह हो तुम सभी, मैंने जिया है कष्टप्रद जीवन ।
अब न काटो तुम इसे, छोड़ दो इसको सजीवन ।।
हम और वंशज हैं तो, मिलेगी वायु जीवन की ।
सहेजो वनों को,तभी होगी उम्मीद जीवन की ।।
तभी होगी उम्मीद जीवन की..
तभी होगी उम्मीद जीवन की..
के.सी.राजपूत
*****पुनः उम्मीद जीवन की…****
सर कलम करके, गिरा डाला है जमीन पर ।
कैसे-कैसे ये इंसान हैं, देखो इस मही पर ।।
रक्त बीज हूं मैं, गिरूंगा जहां फिर से जिऊंगा ।
नाम ही ऐसा है मेरा, लहू तुम्हारा ही पियूंगा ।।
पर तुमने कोई कसर, न छोड़ी मुझे मिटाने में ।
बड़ा होऊंगा मैं, तो कोई बैठेगा मेरे आशियाने में ।
ऐसे ही जीना छोड़ना, तो बस बुजदिल होगी ।
संसार में मैं नहीं, कई और होंगे भुगत भोगी ।
दशानन नहीं फिर भी, मेरी शाख आ ही गईं ।
ये टहनियां फिर, फलों की उम्मीद पा ही गईं ।।
मुझे साथ मिलता ही रहेगा,गर इस रसा का ।
ऋण उतारूंगा अभी, इस माता सी धरा का ।।
अगर मैं इस जमीन को, ऐसे ही छोड़ जाता हूं ।
वहीं रोपेगा मेदिनी में, जिसे मैं खूब भाता हूं ।।
मुझे चिंता नहीं अब, यह फल यहीं पर रहेगा ।
अब न किसी निर्दोष का खून “भू” पर बहेगा ।।
गवाह हो तुम सभी, मैंने जिया है कष्टप्रद जीवन ।
अब न काटो तुम इसे, छोड़ दो इसको सजीवन ।।
हम और वंशज हैं तो, मिलेगी वायु जीवन की ।
सहेजो वनों को,तभी होगी उम्मीद जीवन की ।।
तभी होगी उम्मीद जीवन की..
तभी होगी उम्मीद जीवन की..






