*****ग़ज़ल *****
शकूर अनवर
सितारों भरी कहकशाँ* कुछ नहीं है।
मुक़ाबिल* तेरे आसमाॅं कुछ नहीं है।।
*
जहाँ मालो-ज़र* हो वहाँ चैन कैसा।
वहीं पर सुकूँ है जहाँ कुछ नहीं है।
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कहाँ से लिखूँ शेर हम्दो-सना* के।
न ताक़त क़लम में, ज़ुबाॅं* कुछ नहीं है।
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करूँ पार कैसे ॲंधेरों का जंगल।
कोई रास्ता कारवाॅं कुछ नहीं है।।
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अब आंखों में ऑंसू भी सूखे पड़े हैं।
इधर देख ज़ालिम यहाँ कुछ नहीं है।।
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मैं ज़ाहिर* में जो हूंँ वही मेरा बातिन*।
अयाॅं* मेरा सब कुछ निहाॅं” कुछ नहीं है।।
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न तेशा* न पर्बत न सेहरा* की ख़्वाइश।
यहाँ दिल में अब दास्ताँ कुछ नहीं है।।
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ये मन्दिर ये मस्जिद के झगड़ों को छोड़ो।
कि खाओ कमाओ मियाँ कुछ नहीं है।।
”
गले से मिले लोग धोका हैं जैसे।
ज़मीं से मिला आसमाॅं कुछ नहीं है।।
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सियासत के मारो यहाँ क्या मिलेगा।
यहाँ बस ग़ज़ल है यहां कुछ नहीं है।।
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मेरी आरज़ू इससे आगे है “अनवर”।
वतन के लिये जिस्मो-जाॅं कुछ नहीं है।।
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शब्दार्थ:-
कहकशाँ*आकाश गंगा
मुक़ाबिल*समक्ष
मालो-ज़र*धन दौलत
हम्दो-सना*ईश्वर की तारीफ में लिखा गया काव्य
जुबाॅं*भाषा
ज़ाहिर*प्रकट में
बातिन*अंतर्मन
अयाॅं*सामने
निहाँ* छुपा हुआ
तेशा*पत्थर तोड़ने का औजार
सहरा*रेगिस्तान
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शकूर अनवर
9460851271
*****ग़ज़ल *****
शकूर अनवर
फिर कामयाब देखिये शैतान हो गया।
फिर अपना देश हिन्दू-मुसलमान हो गया।।
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ये वो ज़मीन है जहाँ “मोहन” के इश्क़ में।
“मीरा” बनी कोई, कोई “रसख़ान” हो गया।।
चलिये किसी के ख़ूॅं से बुझी तो किसी की प्यास।
चलिये किसी की मौत का सामान हो गया।।
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अब तो घरों में भूख ग़रीबी मुक़ीम* है।
इफ़लास* मुस्तक़िल* यहाँ मेहमान हो गया।।
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सौ फ़ायदे हुए हों मेरे क़त्ल से तुम्हें।
लेकिन यहाँ तो जान का नुक़सान हो गया।।
*
अब तो हुकूमतों की सियासत अजीब है।
कल तक जो राहज़न* था वो सुल्तान हो गया।।
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जीने का इक हुनर भी मयस्सर* नहीं हुआ।
अलबत्ता मरना अब हमें आसान हो गया।।
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रंगों में जानवर में भी अब धर्म बॅंट गये।
“अनवर” ये कैसा लोगों का ईमान हो गया।।
*
शब्दार्थ:-
मुक़ीम होना*रहना बसना
इफ़लास* दरिद्रता ग़रीबी
मुस्तकि़ल*स्थाई
राहज़न*लुटेरा डाकू
मयस्सर होना*प्राप्त होना
शकूर अनवर
9460851271
*****ग़ज़ल*****
शकूर अनवर
नाकाम बन के रह गये हो कर फ़िगार* हाथ।
जो थे किसी के लम्स* के उम्मीदवार हाथ।।
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लेकर कहाँ पे जाऊँ मैं इस एक जान को।
पीछे पड़े हुए हैं मेरे बेशुमार हाथ।।
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लड़ते हैं अपने पेट की ख़ातिर ये जंग* भी।
करते हैं ज़िंदगी में बहुत जीत-हार हाथ।।
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दुश्मन के नाम पर भी मेरे वक़्ते-शाम आज।
उट्ठे दुआ के वास्ते बे इख़्तियार* यार हाथ।।
*
डूबा कहाँ पे हाय मुक़द्दर तो देखिये।
कश्ती से दूर जबकि किनारा था चार हाथ।।
”
क्या क्या न कर गुज़र रहे इस दौर के इमाम*।
क्या क्या न कुफ़्र* बेच रहे दीनदार” हाथ।।
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आता है याद अब तो मुसलसल* वो बेवफा।
पड़ता है अब तो दिल पे मेरे बार- बार हाथ।।
*
उट्ठेगा इन्क़लाब* नया रोज़गार* में।
“अनवर” जो एक हो गये बेरोज़गार हाथ।।
शब्दार्थ:-
फ़िगार*जख़्मी
लम्स*स्पर्श
जंग*युद्ध
बे इख़्तियार*अपने आप अचानक
इमाम*धार्मिक पेशवा
कुफ्र*अधर्म
दीनदार*धार्मिक
मुसलसल*लगातार
इन्क़लाब*क्रांति
रोज़गार*संसार
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*****ग़ज़ल*****
शकूर अनवर
किसे आवाज़ दूॅं मैं दुनिया वालो।
भॅंवर में है मेरी कश्ती निकालो।।
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ये बिजली देखना गिर कर रहेगी।
तुम अपने आशियाने* को बचालो।।
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अब आगे ऑंसुओं का मरहला* है।
अभी कुछ देर है हॅंसलो हॅंसालो।।
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अरे ऐ ज़ालिमों रोको तबाही*।
अरे ऐ क़ातिलों हथियार डालो।।
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बहारों का है क्या आयें न आयें।
चलो वीरानियों से घर सजालो।।
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मेरी तन्हाई देगी बददुआएँ।
मेरी महफ़िल से उठकर जाने वालो।।
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यहाँ इफ़रात* होगी मछलियों की।
यहाँ ठहरो यहीं पर जाल डालो।।
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लहू इन्सान का सस्ता है “अनवर”।
इसे जब जी में आये तुम बहालो।।
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शब्दार्थ:-
आशियाने*घोंसले घर
मरहला*पड़ाव
तन्हाई*एकांत
इफ़रात*अधिकता
शकूर अनवर
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*****ग़ज़ल*****
शकूर अनवर
शिकस्ता नाव* थी मेरी मेरा मुक़द्दर था।
सियाहियों* का बहुत दूर तक समन्दर था।।
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अगरचे फूल सा नाज़ुक बदन तो था उसका।
मगर वो ज़ुल्म का परवर्दा* दिल का पत्थर था।।
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हमारा अज़्म* हमें मंज़िलों पे लाया है।
वगरना* मौत का साया हमारे सर पर था।।
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ख़ुदा ने इसलिये ख़ूॅंरेज़ियाॅं* अता कर दीं।
फिर उसके बंदों के दस्ते-दुआ* में ख़ंजर था।।
तुम्हारे हिज्र* में “अनवर” कहाँ अकेले रहे।
हमारे साथ तो यादों का एक लश्कर था।।
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शब्दार्थ:-
शिकस्ता*यानी टूटी हुई कश्ती
सियाहियाें*अंधेरों
परवर्दा*पाला हुआ
अज्म*हौसला
वगरना*वर्ना
ख़ूॅंरेज़ियाॅं *रक्तपात ख़ून ख़राबा
दस्ते-दुआ* दुआ माॅंगने वाले हाथ
हिज्र*वियोग जुदाई
शकूर अनवर
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