Sunday, April 19, 2026
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श्रीमद् भागवद् गीता- के.सी. राजपूत

गीता श्लोक 5/10

भक्तियोगी कर्मों में निर्लिप्त रहता है…

भगवान कहते हैं कि जो भक्तयोगी संपूर्ण कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति का त्याग करके कर्म करता है, वह जल से कमल के पत्ते की तरह पाप से निर्लिप्त रहता है।

इंद्रियां, मन, बुद्धि, शरीर, प्राण आदि सब भगवान के हैं । अपने हैं ही नहीं । अतः इनके द्वारा होने वाली क्रियायों को भक्तियोगी अपनी कैसे मान सकता है ? इसलिए उसका यह भाव रहता है कि मात्र क्रियाएं अर्थात सभी क्रियाएं भगवान के द्वारा हो रही हैं । मैं तो निमित्त मात्र हूं । भगवान ही अपनी इंद्रियों के द्वारा आप ही संपूर्ण क्रियाएं करते हैं । यहां अपनी का तात्पर्य है, हम सब की इंद्रियां,जो उनके द्वारा नियंत्रित हैं।

यह कितनी विशेष बात है कि भगवान के सम्मुख होकर भक्तियोगी संसार में रहकर संपूर्ण भगवतकर्म करते हुए भी कर्मों से नहीं बंधता, जैसे कमल का पत्ता जल में उत्पन्न होकर और जल में रहकर भी जल से प्रभावित नहीं रहता है अर्थात जल का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।

जल, कमल पत्ते पर कोई दुष्प्रभाव पैदा नहीं कर पाता । ऐसे ही भक्तियोगी, संसार में रहकर सारी क्रियाएं करने पर भी भगवान के सम्मुख होने के कारण संसार में सर्वथा निर्लिप्त रहता है

गीता श्लोक 5 /11 …

कर्मयोगी के कर्म की शैली….

भगवान कहते हैं कि कर्मयोगी आसक्ति का त्याग करके केवल ममता रहित इंद्रियां, शरीर, मन और बुद्धि के द्वारा अंतकरण की शुद्धि के लिए ही कर्म करते हैं ।

जो योगी भगवत दर्पण बुद्धि से कर्म करते हैं वह भक्तियोगी कहलाते हैं । परंतु जो योगी केवल संसार की सेवा के लिए निष्काम भाव पूर्वक कर्म करते हैं, वह कर्मयोगी कहलाते हैं । कर्मयोगी अपने कहलाने वाले शरीर, मन, इंद्रियों आदि से कर्म करते हुए भी उन्हें अपना नहीं मानता, वरन संसार का ही मानता है । कारण यह है कि शरीर आदि की संसार के साथ एकता है ।

विचार पूर्वक देखा जाए तो शरीर आदि पदार्थ किसी भी दृष्टि से अपने नहीं है । मालिक की दृष्टि से देखा जाए तो, भगवान के हैं । कारण की दृष्टि से देखें तो, यह संसार के हैं । संसार से अलग नहीं । इस प्रकार किसी भी दृष्टि से इनका अपना मानना, इनमें ममता रखना भूल है ।

गीता श्लोक 5 /12….

कर्म योग की महिमा…

भगवान कहते हैं कि कर्मयोगी कर्मफल का त्याग करके नेष्ठिकी शांति को प्राप्त होता है । परंतु मनुष्य कामना के कारण फल में आसक्त होकर बंध जाता है ।

जिनका उद्देश्य समता है, वह सभी पुरुष युक्तपुरुष हैं अर्थात योगी पुरुष हैं । यहां कर्मयोगी का प्रकरण चल रहा है, इसलिए ऐसे कर्मयोगी के लिए युक्त पद आया है जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका होने से जिसमें सांसारिक कामनाओं का अभाव हो गया है अर्थात जिसकी कामनाएं समाप्त हो गई हैं ।

साधारण मनुष्य किसी न किसी कामना को लेकर ही कर्मों का आरंभ करता है और कर्मों की समाप्ति तक उसी कामना का चिंतन करता है । कर्मयोगी फल की इच्छा का त्याग करके कर्म करता है । यहां पर एक सामान्य प्रश्न है कि यदि कोई इच्छा ही न हो तो, कर्म ही क्यों करें,? बात यह है कि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था में कर्मों का त्याग नहीं कर सकता । जब तक मनुष्य के भीतर राग अर्थात आकर्षण है, तब तक वह शांति से नहीं बैठ सकता । जब तक राग अर्थात लगाव का अभाव नहीं हो जाता तब तक मनुष्य कर्मों से छूट नहीं सकता ।

गीता श्लोक 5/13…

नौ द्वारों वाला “पुर” अर्थात शरीर

भगवान कहते हैं कि जिसकी इंद्रियां और मन वश में हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारों वाले शरीर रूपी “पुर” में संपूर्ण कर्मों का विवेकपूर्ण मन से त्याग करके निःसंदेह न करता हुआ और न कराता हुआ, सुखपूर्वक अपने स्वरूप में स्थित रहता है ।

इंद्रियां, मन, बुद्धि आदि में ममता या आसक्ति होने से ही मनुष्य पर अपना अधिकार जमाते हैं । ममता, आसक्ति न रहने पर ये स्वतः अपने वश में रहते हैं ।

नव द्वार वाला पुर/ नगर/ शरीर …

1_ विषयों का सेवन करने के लिए _ दो कान, दो नेत्र, दो नासिका छिद्र तथा एक मुख =सात द्वार, ये शरीर के ऊपरी भाग हैं ।

2 _ मल _ मूत्र का त्याग करने के लिए _ गुदा और उपस्थ / पेशाब तंत्र, ये दो द्वार, शरीर के निचले भाग में हैं ।

कुल मिलाकर इन नौ द्वारों वाले पुर अर्थात शरीर में रहने वाला जीवात्मा और शरीर, दोनों अलग अलग हैं। गुणों के संग से जीव अवश अर्थात पराधीन हो जाता है। परंतु ज्ञानयोग से अवशता या पराधीनता मिट जाती है और जीव अवश अर्थात स्वाधीन या अपने अधीन हो जाता है ।

गीता श्लोक 5/ 14…

क्या भगवान कर्म करवाते हैं ?…..

भगवान कहते हैं कि परमेश्वर मनुष्यों के न कर्त्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल केसाथ संयोग की रचना करते हैं, स्वभाव ही बरत रहा है अर्थात यह सब अपने आप ही हो रहा है ।

सृष्टि की रचना करना सगुण भगवान का कार्य है । भगवान सर्व समर्थ हैं और सबके शासक और नियामक/ नियंत्रण करती हैं । श्रृष्टि रचना का कार्य करते हुए भी वह अकर्त्ता हैं । जीव जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है । जड़ होने के कारनकर्म स्वयं अपना फल भुगतने में असमर्थ हैं। अतः कर्मों के फल का विधान भगवान करते हैं । भगवान कर्मों का फल तो देते हैं, परंतु फल के साथ के साथ भगवान संबंध नहीं जोड़ते, वरन जीव स्वयं जोड़ता है ।

भगवान जिसका उत्थान चाहते हैं, उससे तो शुभ कर्म करवाते हैं और जिसकी अधोगति चाहते हैं उससे, अशुभ कर्म करवाते हैं ।

गीता श्लोक 5/15….

प्रभु किसी के कर्म फल के भागी नहीं……..

भगवान कहते हैं की सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पाप कर्म को और न शुभ कर्म को ही ग्रहण करते हैं, किंतु अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है, उसी से सब जीव मोहित हो रहे हैं ।

कर्मफल का भाग होना दो प्रकार का होता है ।

एक _एक में जो स्वयं कर्म करता है वह भी कर्म फल का भाग होता है।

दो _जो दूसरों से कर्म करवाता है वह भी कर्म फल का भागी होता है ।

परमात्मा न तो किसी के कर्म को करने वाला है और न कर्म करवाने वाला है । अतः वह किसी के भी कर्म फल का भागी नहीं हो सकता । स्वरूप का ज्ञान सभी मनुष्यों में स्वत सिद्ध है, किंतु आज्ञान के कारण यह ज्ञान ढका हुआ है । उसीअज्ञान के कारण जीव मूढ़ता को प्राप्त हो रहे हैं । अपने को कर्मों का कर्त्ता मानना मूर्खता है । भगवान के द्वारा मनुष्य को विवेक दिया हुआ है, जिसके द्वारा इस मूढ़ता का नाश किया जा सकता है । भगवान ने कहा है कि सांख्ययोगी कभी भी अपने को किसी कर्म का कर्ता न माने ।

गीता श्लोक 5/ 16 …

अज्ञान का नाश करने पर ज्ञान का उदय होता है ….

भगवान कहते हैं कि…. परंतु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान के द्वारा उस अज्ञान का नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्य की तरह परमात्मतत्व को प्रकाशित कर देता है ।

मैं और मेरेपन को जड़ के साथ न मिलाकर, साधक अपने विवेक को महत्व दे, कि मैं_ मेरेपन जिससे मिलाता हूं, वह सब बदलता है । परंतु मैं मेरेपन कहलाने वाला मैं वही रहता हूं । जड़ का बदलना और अभाव तो किसी की समझ में नहीं आता क्योंकि स्वयं में किंचित भी परिवर्तन अथवा अभाव कभी नहीं होता। इस विवेक के कारण मैं और मेरेपन का त्याग कर दो । यही विवेक के द्वारा अज्ञान का नाश है । सूर्य के उदय होने पर नई वस्तु का निर्माण नहीं होता वरन अंधकार से ढके जाने के कारण जो वस्तु दिखाई नहीं देती है, वह सूर्य के उगने से दिखाई देने लगती है । किस प्रकार परमात्म तत्व स्वत सिद्ध है । परंतु अज्ञान के कारण अनुभव नहीं हो रहा था। विवेक के द्वारा अज्ञान मिटते ही स्वत सिद्ध परमात्म तत्व का अनुभव होने लगता है।

k.c Rajput

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