पूछो तो जानो: जिज्ञासा ही सबसे बड़ी योग्यता है
✍️लेखक : परमानन्द गोयल, कोटा (राजस्थान)
अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में लिखा था:
“The important thing is not to stop questioning.”
अर्थात सबसे ज़रूरी बात यह है कि सवाल पूछना कभी बंद मत करो।
इसी बात को उन्होंने और सरलता से कहा था:
“I have no special talent. I am only passionately curious.”
यानी मुझमें कोई विशेष प्रतिभा नहीं है, मैं तो केवल जुनूनी रूप से जिज्ञासु हूँ।
आज जब शिक्षा का पैमाना अंकों की दौड़ और रटंत प्रणाली की ओर बढ़ गया है, यह विचार और भी प्रासंगिक हो गया है। इतिहास साक्षी है कि दुनिया के सारे युगांतरकारी परिवर्तन किसी तैयार जवाब से नहीं, एक साहसी सवाल से ही शुरू हुए हैं।
॰ रटना नहीं, तह तक जाना है
पारंपरिक शिक्षा तैयार जवाब याद करवाती है। आइंस्टीन ने छात्र जीवन में ही इस ढाँचे को चुनौती दी और हर नियम की तह तक जाने का रास्ता चुना। इसी जिज्ञासा ने सापेक्षता के सिद्धांत को जन्म दिया।
इस पर दो बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं-
पहली, नोबेल विजेता रिचर्ड फेनमैन ने कहा था: “मैं ऐसे सवाल रखना पसंद करूँगा जिनके जवाब न हों, बजाय ऐसे जवाबों के जिन पर सवाल ही न उठाया जा सके।” उनके अनुसार किसी चीज़ का नाम जान लेना और उस चीज़ को सच में समझना, दोनों में ज़मीन आसमान का अंतर है।
दूसरी, कबीरदास जी ने सैकड़ों साल पहले यही बात कितनी सरलता से कही थी: “जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।” यानी व्यक्ति की पृष्ठभूमि नहीं, उसके ज्ञान को परखने के लिए सवाल पूछो।
॰ जिज्ञासा के तीन आयाम
पहला आयाम: सही सवाल ही समझ की कसौटी है
वॉल्टेयर ने लिखा था: “किसी इंसान का आकलन उसके जवाबों से नहीं, उसके पूछे गए सवालों से कीजिए।”
विद्यालय से महाविद्यालय तक हम सवाल पूछने में झिझकते हैं। इस पर कन्फ्यूशियस ने कहा था कि जो पूछता है वह पाँच मिनट के लिए मूर्ख लग सकता है, लेकिन जो पूछता ही नहीं वह जीवन भर मूर्ख रह जाता है।
दूसरा आयाम: यथास्थिति को चुनौती देना
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम कहते थे: “रचनात्मकता वही चीज़ देखने में है जो सब देख रहे हैं, लेकिन सोचना वैसा है जैसा किसी ने न सोचा हो।”
इसी को स्टीव जॉब्स ने अपने प्रसिद्ध स्टैनफोर्ड भाषण में कहा था: “Stay hungry, stay foolish.” अर्थात भूखे रहो, बावले रहो। यह भूख ही जिज्ञासा है।
तीसरा आयाम: सतत सीखने की विनम्रता
सुकरात का कथन है: “सच्चा ज्ञान केवल यह स्वीकार करने में है कि आप कुछ नहीं जानते।”
अरस्तू ने अपनी पुस्तक मेटाफिजिक्स की शुरुआत ही इस वाक्य से की थी: “All men by nature desire to know.” यानी जानने की इच्छा हर मनुष्य में स्वाभाविक है।
और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर शिक्षा के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहते हैं: “उच्चतम शिक्षा वह नहीं जो हमें केवल जानकारी दे, बल्कि वह है जो हमारे जीवन का समस्त अस्तित्व के साथ सामंजस्य स्थापित करे।” यह सामंजस्य रटने से नहीं, पूछने और समझने से आता है।
॰ प्रशासनिक और शैक्षणिक अनुभव की कसौटी
यह दर्शन केवल किताबी नहीं है। इस लेख के लेखक का अपनी प्राथमिक शिक्षा से लेकर आज पाँच दशक बाद तक यही मत रहा है। भले ही इसका तात्कालिक खामियाजा यह रहा हो कि अपने अकादमिक करियर में, विद्यालय से महाविद्यालय तक, वह टॉपर की श्रेणी में नहीं आया, किंतु बाद के काल में इसका पूरा लाभ मिला।
राजस्थान लोक सेवा आयोग की स्कूल शिक्षा प्राध्यापक परीक्षा में मेरिट में प्रथम पाँच में स्थान से लेकर राजस्थान शिक्षा सेवा (स्टेट सर्विस)प्रशासनिक विंग , राजस्थान अधीनस्थ लेखा सेवा, राजस्थान लेखा सेवा और सेवानिवृत्ति के बाद सलाहकार की भूमिका तक, कार्य का एक ही स्थायी नियम रहा है: किसी भी प्रकरण की तह तक जाओ।
नियमों, फाइलों और व्यावहारिक समस्याओं के मूल तक जाने की आदत का तात्कालिक खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। गहराई से पढ़ने वाला विद्यार्थी कई बार सतही परीक्षा की टॉपर सूची में शीर्ष पर नहीं आता। कार्ल सागन ने इस स्थिति को बहुत सुंदर कहा है: “Somewhere, something incredible is waiting to be known.” यानी कहीं न कहीं कुछ अविश्वसनीय जानने के लिए प्रतीक्षा कर रहा है। जो तह तक जाता है, वह अंततः उसी अविश्वसनीय तक पहुँच जाता है और जीवन के दीर्घकालिक लक्ष्यों में कभी पीछे नहीं रहता।
॰ सिलेक्टिव नहीं, समग्र अध्ययन की शक्ति
प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर सिलेक्टिव स्टडी की सलाह दी जाती है। अनुभव कहता है कि चुनिंदा हिस्सों तक सिमटने के बजाय विषय को समग्रता से पढ़ना चाहिए। ज्ञान का कोई भी अंश व्यर्थ नहीं जाता।
समग्र अध्ययन से तीन लाभ निश्चित होते हैं:
1. विश्लेषण क्षमता का विस्तार होता है।
2. आप जटिल नियमों और वित्तीय प्रावधानों को आपस में जोड़कर देखने में सक्षम होते हैं।
3. सैद्धांतिक ज्ञान का लोक जीवन में सटीक प्रयोग संभव हो पाता है।
अंक तात्कालिक हैं, समझ स्थायी है। इसलिए जिज्ञासा के दीपक को बुझने मत दीजिए। सवाल ज़िंदा है तो दिमाग़ ज़िंदा है।






