Saturday, September 26, 2026
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मतदाता सूची का पुनरीक्षण और लोकतंत्र का भरोसा

 मतदाता सूची का पुनरीक्षण और लोकतंत्र का भरोसा

✍️ डॉ नयन प्रकाश गांधी, पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट, मैनेजमेंट विश्लेषक

भारतीय चुनाव आयोग द्वारा २६ सितंबर २०२६ को जारी प्रेस नोट को केवल एक दैनिक प्रशासनिक सूचना मानना भूल होगी। यह दस्तावेज देश में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की दार्शनिक दिशा, उसकी नीयत और उसकी कार्यप्रणाली को स्पष्ट करता है। किसी भी लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल नामों का रजिस्टर नहीं होती। वह उस सामाजिक अनुबंध का लिखित रूप है जिसके आधार पर नागरिक राज्य को शासन करने की वैधता प्रदान करता है। यदि इस सूची में ही त्रुटि, पक्षपात या बहिष्करण रह जाए तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की पूरी इमारत हिल जाती है।

इसी गंभीर पृष्ठभूमि में आयोग की २६ सितंबर की बैठक में लिए गए पांच निर्णयों का मूल्यांकन करना आवश्यक है।

पहला निर्णय: नागरिक पर बोझ नहीं, राज्य की जिम्मेदारी

सबसे क्रांतिकारी बदलाव नोटिस प्राप्त मतदाताओं की प्रक्रिया में किया गया है। एसआईआर के दौरान जिन्हें अनमैप्ड होने या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी हुआ है, उन्हें अब निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के कार्यालय में सुनवाई के लिए नहीं बुलाया जाएगा। इसके स्थान पर बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ स्वयं उनके घर जाएंगे, दस्तावेज एकत्र करेंगे और ईसीआईनेट पोर्टल पर अपलोड करेंगे। निर्णय ईआरओ द्वारा लिया जाएगा। सुनवाई केवल असाधारण परिस्थितियों में होगी और वह भी अधिमानतः ऑनलाइन माध्यम से। आवश्यकता पड़ने पर परिवार का कोई भी वयस्क सदस्य मतदाता की ओर से अधिकृत होकर सुनवाई में भाग ले सकता है।

लोक प्रशासन के सिद्धांत में इसे प्रशासनिक बोझ का स्थानांतरण कहा जाता है। परंपरागत भारतीय नौकरशाही में नागरिक को अपनी पात्रता सिद्ध करने के लिए व्यवस्था के द्वार पर खड़ा होना पड़ता था। यहां व्यवस्था स्वयं नागरिक के द्वार पर जा रही है। यह विशेष रूप से दिहाड़ी मजदूरों, बुजुर्गों, महिलाओं और उन लोगों के लिए जीवनदायी है जो एक दिन की मजदूरी छोड़कर कार्यालय नहीं जा सकते। यह निर्णय प्रक्रिया को दंडात्मक से बदलकर सुविधात्मक बनाता है।

दूसरा निर्णय: अदृश्य नागरिकों को दृश्य बनाना

आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिया है कि रैन बसेरों में रहने वाले, श्रमिक, निर्धन और बेघर व्यक्तियों के लिए पर्याप्त संख्या में हेल्प डेस्क बनाए जाएं और विशेष शिविर आयोजित किए जाएं।

सार्वजनिक नीति के अध्ययन बताते हैं कि मतदाता सूची के शुद्धिकरण अभियानों में सबसे अधिक कीमत यही हाशिए पर खड़े समूह चुकाते हैं। उनके पास स्थायी पता नहीं होता, किरायेदारी बदलती रहती है और दस्तावेज अधूरे होते हैं। तकनीकी भाषा में जिसे तार्किक विसंगति कहा जाता है, वह वास्तव में उनकी गरीबी का प्रमाण होती है। आयोग द्वारा उनके लिए विशेष शिविरों की घोषणा सामाजिक न्याय के प्रति संवेदनशीलता दर्शाती है। यह समावेशी लोकतंत्र के उस वादे को दोहराता है जिसमें कोई भी वैध मतदाता केवल इसलिए वंचित नहीं रहेगा क्योंकि वह गरीब है।

तीसरा और चौथा निर्णय: कानूनी स्पष्टता और तकनीकी जवाबदेही

तीसरे बिंदु में आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर के लिए फॉर्म छह के साथ संलग्न घोषणा को सर्वोच्च न्यायालय ने वैध ठहराया है। गैर एसआईआर अवधि में यथानियम पुराने फॉर्म ही प्रयोग होंगे। इससे जमीनी स्तर पर फैले कानूनी भ्रम को समाप्त करने में सहायता मिलेगी और बीएलओ से लेकर ईआरओ तक सभी अधिकारियों को स्पष्ट मार्गदर्शन मिलेगा।

चौथा निर्णय डिजिटल शासन की परिपक्वता को दर्शाता है। फील्ड अधिकारियों को ईसीआईनेट में उनकी वैधानिक शक्तियों के अनुसार भूमिका आधारित पहुंच दी गई है। अब वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में एक समिति, जिसमें आईआईटी या ट्रिपलआईटी का स्वतंत्र विशेषज्ञ भी होगा, इस प्रणाली की समीक्षा करेगी कि वह अधिनियमों और नियमों के प्रावधानों का पालन करती है या नहीं।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर होने लगे तो उस प्लेटफॉर्म का ऑडिट किसी आंतरिक विभाग से नहीं, बल्कि स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों से होना चाहिए। इससे डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और निष्पक्षता पर जनता का भरोसा बढ़ेगा। आयोग ने यह भी कहा है कि भविष्य में सभी आईटी पहलों को आयोग के अनुमोदन से पहले अधिकारियों की समिति में चर्चा के लिए रखा जाएगा। यह संस्थागत नियंत्रण और संतुलन का उत्तम उदाहरण है।

पांचवां निर्णय: संघीय लचीलापन

मुख्य निर्वाचन अधिकारी दिल्ली के अनुरोध पर दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अवधि ३० अक्टूबर २०२६ तक बढ़ा दी गई है, जबकि निपटान की अवधि ३० नवंबर २०२६ तक रहेगी। इसी प्रकार महाराष्ट्र के लिए यह अवधि क्रमशः १२ अक्टूबर और १० नवंबर २०२६ तक बढ़ाई गई है।

यह निर्णय भारतीय संघीय ढांचे की वास्तविकता को स्वीकार करता है। दिल्ली जैसे महानगर की प्रवासी जनसंख्या की चुनौतियां महाराष्ट्र के विशाल ग्रामीण विस्तार से भिन्न हैं। एक ही समय सीमा पूरे देश पर थोपने के बजाय स्थानीय आवश्यकता के अनुसार विस्तार देना व्यावहारिक लोक प्रशासन का लक्षण है।

चुनौतियां और आगे का मार्ग

इन सकारात्मक कदमों के बावजूद कुछ गंभीर प्रश्न अनुत्तरित हैं। पहला प्रश्न क्षमता का है। क्या लाखों नोटिस प्राप्त घरों तक पहुंचने के लिए बीएलओ के पास पर्याप्त समय, प्रशिक्षण और मानदेय है। बीएलओ पहले से ही शिक्षक या अन्य सरकारी कर्मचारी के रूप में दोहरी जिम्मेदारी निभाते हैं। उन पर अतिरिक्त बोझ डालने से गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

दूसरा प्रश्न डिजिटल विभाजन का है। ऑनलाइन सुनवाई की सुविधा को मजबूत करने की बात कही गई है, परंतु ग्रामीण भारत में इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल साक्षरता अभी भी चुनौती है। क्या एक बेघर मजदूर ऑनलाइन सुनवाई में प्रभावी रूप से अपना पक्ष रख पाएगा।

तीसरा प्रश्न समय प्रबंधन का है। दावे आपत्तियों की अवधि बढ़ाने से अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन में देरी हो सकती है, जिसका प्रभाव आगामी चुनावी तैयारियों पर पड़ेगा। आयोग को एक स्पष्ट रोडमैप जनता के सामने रखना चाहिए।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग ने शुद्धता के साथ समावेशिता और नागरिक सुविधा को समान प्राथमिकता दी है। लोकतंत्र केवल मतदान के दिन की निष्पक्षता से नहीं मापा जाता। वह इस निरंतर भरोसे से मापा जाता है कि व्यवस्था किसी भी वैध नागरिक को बाहर नहीं करेगी। २६ सितंबर का प्रेस नोट उसी भरोसे को पुनर्स्थापित करने का एक गंभीर प्रयास है। अब इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई दिल्ली के निर्वाचन सदन में लिए गए निर्णय देश के अंतिम बूथ तक कितनी निष्ठा और पारदर्शिता के साथ क्रियान्वित होते हैं।

✍️ डॉ नयन प्रकाश गांधी, पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट, मैनेजमेंट विश्लेषक

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