Friday, September 25, 2026
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बाहरी विषयों से हटकर आत्मस्वरूप की ओर बढ़ना ही ब्रह्मचर्य साधना : मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज

दशलक्षण महापर्व के दशम एवं अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना के साथ श्रावक योग संस्कार शिविर का हुआ समापन

कोटा, 25 सितम्बर। दशलक्षण महापर्व के दशम एवं अंतिम दिन शुक्रवार को श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ की गई। इस अवसर पर ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए ब्रह्मचर्य धर्म के आध्यात्मिक स्वरूप पर प्रकाश डाला।

मुनिश्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल विषय-वासनाओं से दूर रहना नहीं, बल्कि अपनी आत्मा में रमण करना है। जब जीव बाहरी पदार्थों, विषयों और इंद्रियों के आकर्षण से हटकर अपने भीतर की ओर देखता है, तब वास्तविक ब्रह्मचर्य की साधना प्रारंभ होती है। आत्मा ही हमारा वास्तविक स्वरूप है, जबकि संसार के सभी संबंध और भोग-पदार्थ क्षणिक हैं।

उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन इंद्रियों के विषयों में उलझकर निरंतर बाहर की ओर भाग रहा है। आंखें रूप के पीछे, कान शब्द के पीछे, जीभ स्वाद के पीछे और मन संसार के आकर्षणों के पीछे दौड़ता रहता है। इंद्रियों को विषयों से हटाकर आत्मा की ओर मोड़ना ही ब्रह्मचर्य की सच्ची साधना है। संयमित जीवन, पवित्र विचार और निरंतर आत्मचिंतन से ब्रह्मचर्य धर्म पुष्ट होता है।

दस धर्मों की साधना केवल पर्व तक सीमित न रहे

मुनिश्री ने श्रावकों को प्रेरित करते हुए कहा कि दशलक्षण महापर्व के दस दिनों में हमने उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन और ब्रह्मचर्य जैसे दस धर्मों की आराधना की है। इन धर्मों का उद्देश्य केवल दस दिनों तक धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि इन आत्मिक गुणों को जीवन का स्थायी संस्कार बनाना है।

उन्होंने कहा कि यदि पर्व समाप्त होने के साथ धर्म भी समाप्त हो जाए तो पर्व का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता। धर्म का प्रभाव हमारे व्यवहार, विचार और जीवनशैली में दिखाई देना चाहिए। दशलक्षण महापर्व आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर है।

मुनिश्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य आत्मा को परमात्मा बनने की दिशा में ले जाने वाला धर्म है। जितना-जितना जीव अपने भीतर रमण करता है, उतना-उतना बाहरी आकर्षण कम होता जाता है और आत्मिक शांति का अनुभव बढ़ता जाता है।

श्रावक योग संस्कार शिविर का हुआ भव्य समापन

दशलक्षण महापर्व के साथ चल रहे श्रावक योग संस्कार शिविर का भी आज समापन हुआ। शिविर में श्रावकों को धर्म-साधना, स्वाध्याय, पूजन, जिनवाणी श्रवण, संस्कार एवं आत्मकल्याण से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से धर्म के व्यावहारिक स्वरूप को समझाया गया।

मुनिश्री ने कहा कि संस्कार ही धर्म को जीवन में उतारने का माध्यम हैं। बच्चों और युवाओं के साथ-साथ प्रत्येक श्रावक को ऐसे संस्कारों की आवश्यकता है, जो जीवन की भागदौड़ के बीच उसे अपनी आत्मा और धर्म से जोड़े रखें। शिविर में प्राप्त ज्ञान, अनुशासन और संस्कारों को जीवन में निरंतर बनाए रखना ही शिविर की वास्तविक सफलता है।

दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिन धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना करते हुए आत्मचिंतन, संयम एवं सदाचार का संकल्प लिया। दस दिनों तक चले इस आध्यात्मिक पर्व ने श्रद्धालुओं को दसों धर्मों के आत्मिक गुणों को जीवन में धारण करने की प्रेरणा दी।

उपवासकर्ताओं ने बग्गियों में सवार होकर की भव्य धर्म प्रभावना

दस उपवास, पंचमेरु, तेला एवं सोलह कारण व्रत के साधकों का हुआ सम्मान

शिविर निदेशक श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में शिविरार्थियों ने साधना, संयम और धार्मिक अनुशासन के साथ उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना की। अनेक शिविरार्थियों ने दशलक्षण धर्म के दस उपवास, पंचमेरु धर्म के पांच उपवास, तेला तथा सोलह कारण व्रत की साधना की।

अनंत चतुर्दशी के अवसर पर देव-शास्त्र-गुरु के पावन सान्निध्य में भव्य धर्म प्रभावना जुलूस निकाला गया। दस उपवास की साधना करने वाले उपवासकर्ता बग्गियों में सवार होकर धर्म प्रभावना करते हुए शामिल हुए।

उपवास साधना के प्रमुख वर्ग

🔸 सोलह कारण — 16 उपवास

🔸 दशलक्षण — 10 उपवास

🔸 पंचमेरु — 5 उपवास

🔸 तेला — 3 उपवास

🔸 अन्य उपवास साधक

दशलक्षण के दस उपवासकर्ताओं में संजय लुहाड़िया, बीना लुहाड़िया, आस्था जैन, मेनका जैन, सुरलाया, हितेश सोगानी, लक्ष्य जैन, दिनेश जैन एवं प्रमोद कुमारी जैन सहित अन्य साधक शामिल रहे।

पंचमेरु धर्म के पांच उपवासकर्ताओं में उमा देवी जैन, सीमा जैन, प्रज्ञा जैन एवं सुमित्रा जैन सहित अन्य साधकों ने तप आराधना की।

इस अवसर पर सभी उपवासकर्ताओं का सम्मान भी किया गया।

शिविरार्थियों ने शांतिधारा, दशलक्षण विधान, भक्तामर विधान, तत्त्वार्थ सूत्र एवं जिज्ञासा-समाधान सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भक्तिभाव से सहभागिता की। अनेक साधकों ने उपवास सहित एक समय शुद्ध भोजन का अनुशासन अपनाया। दिनभर की धर्म-साधना के पश्चात महाआरती में भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया।

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से किया पुण्यार्जन

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन कमल जी, दीप्ति जी, अंजना जी एवं जतिन परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया। कलश स्थापना का पुण्यार्जन अभय कुमार जी, रानी जी एवं नगेदा परिवार द्वारा किया गया।

श्री सुमित सेंकी ने बताया कि महाआरती का पुण्यार्जन मनोहर बाई एवं नमन ट्रेवल्स परिवार द्वारा किया गया।

श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान अनिल कुमार, अनुराग एवं अंश पोदार परिवार; श्रीमान बोधराज, राजकुमार एवं अशोक दुगेरिया परिवार; श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार; श्रीमान हेमंत कुमार, मनोज एवं प्रतीक जैसवाल परिवार तथा श्रीमान चन्द्र प्रकाश, पीयूष एवं अभिषेक कोटिया परिवार द्वारा किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि दशलक्षण विधान में महावीर मित्तल, प्रेम कासलीवाल, संजय लुहाड़िया, डॉ. संतोष, जम्बू, रानी दुगेरिया एवं सुशीला ठोरा सहित पांच अन्य श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया। भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रीमती किश्कन्धा बाई, जम्बू कुमार जी एवं भानु जी द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।

तत्त्वार्थ सूत्र का पुण्यार्जन दीप्ति जैन, प्रमोद कुमारी, अंजना जी, आशा श्रीमाल एवं सुमित्रा द्वारा भक्तिभाव से किया गया।

श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यार्जन/सौभाग्य उपवासकर्ता को प्राप्त हुआ।

श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य मुकेश जी एवं अर्पित जी को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

गुरुवाणी का अमृत संदेश

आज के प्रवचन का सार

“ब्रह्मचर्य केवल विषय-वासनाओं से दूर रहने का नाम नहीं, बल्कि अपनी आत्मा में रमण करने की साधना है। इंद्रियों को विषयों से हटाकर आत्मा की ओर मोड़ें, पवित्र विचारों और संयमित जीवन को अपनाएं। दशलक्षण के दसों धर्मों को केवल पर्व के दस दिनों तक सीमित न रखकर जीवन का स्थायी संस्कार बनाएं। देव-शास्त्र-गुरु के मार्गदर्शन में आत्मस्वरूप की ओर बढ़ना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की सच्ची आराधना है।”

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से किया पुण्यार्जन

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन कमल जी, दीप्ति जी, अंजना जी एवं जतिन परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया। कलश स्थापना का पुण्यार्जन अभय कुमार जी, रानी जी एवं नगेदा परिवार द्वारा किया गया।

श्री सुमित सेंकी ने बताया कि महाआरती का पुण्यार्जन

अजय कन्जोलिया परिवार द्वारा किया गया।

श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान अनिल कुमार, अनुराग एवं अंश पोदार परिवार ; श्री मान बोधराज, राजकुमार एवं अशोक दुगेरिया परिवार; श्रीमती सुशीला बाई-अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ; श्री मान हेमंत कुमार , मनोज एवं प्रतिक जैसवाल परिवार; श्री मान चन्द्र प्रकाश,पियूष अभिषेक कोटिया परिवार द्वारा किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि दशलक्षण विधान में महावीर मित्तल, प्रेम कासलीवाल, संजय लुहाड़िया, डॉ. संतोष, जम्बू, रानी दुगेरिया एवं सुशीला ठोरा सहित पांच अन्य श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया। भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रीमती किश्कन्धा बाई, जम्बू कुमार जी एवं भानु जी द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।

तत्त्वार्थ सूत्र का पुण्यार्जन दीप्ति जैन, प्रमोद कुमारी, अंजना जी, आशा श्रीमाल एवं सुमित्रा द्वारा भक्तिभाव से किया गया।

श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यार्जन/सौभाग्य मुकेश जी एवं अर्पित जी को प्राप्त हुआ।

श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उपवासकर्ता को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

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गुरुवाणी का अमृत संदेश

आज के प्रवचन का सार

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