Saturday, October 3, 2026
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स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका के अकाट्य तथ्य – मुरलीधर

भारत सिंह चौहान

कोटा। स्वतंत्रता दिवस की 80 वी वर्षगाठ के शुभ अवसर पर भारतीय जनकल्याण समिति, कोटा द्वारा सूरज भवन, बल्लभबाड़ी कोटा पर स्वतंत्रता दिवस का भव्य समारोह आयोजित किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता कोटा विभाग के विभाग संघचालक पन्नालाल शर्मा ने की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चितौड़ प्रांत के प्रान्त प्रचारक मुरलीधर ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने संबोधन में कहा कि ” भारतीय इतिहास को धूमिल करने के प्रयास अब और नहीं टिकेंगे। ” उन्होंने ” स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका के अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत किये।”

मुरलीधर ने उद्बोधन में स्पष्ट किया कि ” भारत की आजादी बिना खड़ग-बिना ढाल से नहीं बल्कि क्रांतिकारियों के बलिदान और जनजन के संघर्षों का परिणाम है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संस्थापक डॉ केशवराव हेडगेवार एवं तत्कालीन स्वयंसेवकों की टोली ने अपना अमूल्य योगदान दिया। ” उन्होंने कहा कि ” जो लोग संघ पर आरोप लगाते हैं उनको “संघ और स्वतंत्रता आंदोलन” नाम की पुस्तक पढ़नी चाहिए। ”

मुरलीधर ने कहा कि ” डॉ. हेडगेवार ने 8 वर्ष की आयु में ब्रिटिश रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की हीरक जयंती की मिठाई को सबके सामने कूड़ेदान में फेंककर विदेशी दासता का प्रतिकार किया । वे अपने शेष जीवन में स्वाधीनता संग्राम से दूर रहे ऐसा कैसे हो सकता है। 1907 में नीलसिटी हाई स्कूल में इसलिए निष्कासित किया गया कि उन्होंने पिछले रिस्ले सर्कुलर के विरोध में पूरे स्कूल को वन्देमातरम् और भारत माता की जय से गूंजायमान कर दिया। कलकत्ता में क्रांतिकारियों की अनुशीलन समिति में उनकी सक्रिय भूमिका रही जहाँ उन्हें “कोकेन” छद्म नाम दिया गया।”

उन्होंने बताया कि ” 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में संयुक्त सचिव के पद का निर्वहन करते हुए पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित करने को सर्वप्रथम आग्रह डॉ. हेडगेवार ने किया जिसे कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने पारित नहीं किया, और यही प्रस्ताव कांग्रेस ने 1929 के लाहौर अधिवेशन में पारित किया।

1925 में क्रांतिकारी राजगुरु डॉ. हेडगेवार के पुणे नहीं आगे की सलाह दी लेकिन राजगुरु को पुणे आने पर गिरफ्तार किया गया और अंततः उन्हें फांसी दे दी गई।”

मुख्यवक्ता मुरलीधर ने बताया कि ” डॉ. हेडगेवार के स्वाधीनता संघर्ष में सक्रिय रहने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि 1930 में 11 माह की जेल काटकर रिहा होते समय मोतीलाल नेहरू, हाकिम अजमल खां और राजगोपालाचार्य जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जेल के बाहर उनको लेने आये।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में 7 लोग गोली से शहीद हुए, उसमें से 2 लोग सक्रिय स्वयंसेवक थे। हेमू कालानी संघ के स्वयंसेवक थे जिनको 1943 में मौत की सजा दी गयी। 1947 में एक शाखा प्रमुख दादानाई को मौत की सजा मिली। एक शाखा प्रमुख रामदास की हत्या पुलिस की गोली से हुई। इसी प्रकार आंदोलनरत स्वयंसेवक बालाजी रामदास को अंग्रेज पुलिस ने गोली मारी।”

उन्होंने बताया कि ” विभाजन के समय हिंदुओं को पाकिस्तान से बचाकर भारत लाने की आंखों देखी खबरें आज भी कोटा में वयोवृद्ध स्वयंसेवक श्री लद्दाराम जी से सुनी जा सकती हैं। भारत विभाजन में हिंदुओं पर जो भीषण अत्याचार हुए उन्हें नई पीढ़ी से और अधिक नहीं छिपाया जा सकता। देश की जनता ने स्वतंत्रता का क्या मूल्य चुकाया इसकी व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। 1947 में असंख्य कांग्रेस नेताओं को विस्थापन के पश्चात शरण देने वाले स्वयंसेवकों के नाम गिनाये जा सकते हैं जिनका अरुणा आसफ अली जैसे कांग्रेस नेताओं ने सार्वजनिक रूप से आभार प्रकट किया।

मुरलीधर ने नागरिकों से विकसित और अखंड भारत के लिए कर्तव्य निर्वहन करने का आग्रह किया।”

स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर इस समारोह में अखिल भारतीय सामाजिक सद्भाव कार्य के प्रमुख आ. बलिराम जी, विभाग संघचालक पन्नालाल, महानगर संघचालक गोपाल गर्ग, वयोवृद्ध प्रचारक राजेन्द्र द्विवेदी एवं कई गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

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