कोटा/श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन चातुर्मास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में आत्मकल्याण का अमृत संदेश प्रवाहित हुआ। मुनिश्री ने कहा कि संसार में पाने की नहीं, बल्कि छोड़ने की साधना ही आत्मा को परम शांति और मोक्ष की ओर ले जाती है। इच्छाओं का अंत कभी नहीं होता; एक आकांक्षा पूरी होते ही दूसरी जन्म ले लेती है। इसलिए त्याग, संतोष और वैराग्य ही जीवन का वास्तविक वैभव हैं।
मुख्य संयोजक चातुर्मास–2026 श्री हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि मुनिश्री की अमृतमयी वाणी का श्रवण करने के लिए प्रतिदिन कोटा सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुण्योदय अतिशय क्षेत्र पहुँच रहे हैं और धर्म एवं आत्मकल्याण की प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं।
आकांक्षा का अंत ही संतोष का आरंभ, त्याग ही आत्मकल्याण का प्रथम सोपान
रत्नकरण्ड श्रावकाचार के बारहवें श्लोक का भावार्थ स्पष्ट करते हुए मुनिश्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन का वास्तविक स्वरूप तभी प्रकट होता है, जब साधक नश्वर सांसारिक सुखों और कर्माधीन भोगों के प्रति आकर्षण छोड़ देता है।
उन्होंने कहा कि जब जीव को सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा प्राप्त होती है, तब उसके भीतर संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं के प्रति मोह स्वतः कम होने लगता है। अंतरंग लक्ष्मी और आत्मानुभूति की प्राप्ति के बाद कुछ भी पाने की इच्छा शेष नहीं रहती। वास्तविक संतोष वहीं से प्रारंभ होता है, जहाँ आकांक्षाओं का अंत होता है।
लोभ और तृष्णा पतन का कारण, ‘छोड़ोगे तभी पाओगे’ जीवन का शाश्वत सत्य
अपने ओजस्वी प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि लोभ, तृष्णा और अनियंत्रित इच्छाएँ मनुष्य को पतन की ओर ले जाती हैं। इतिहास इसका साक्षी है कि लोभ और आकांक्षा के कारण महान चक्रवर्ती भी अधोगति को प्राप्त हुए।
उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा—
“यदि जीवन में कुछ श्रेष्ठ पाना है, तो पहले कुछ छोड़ना सीखिए। छोड़ोगे तभी पाओगे।”
उन्होंने कहा कि दान, त्याग और इच्छाओं का शमन ही आत्मा को निर्मल बनाता है। आकांक्षा ऐसी अग्नि है जो कभी शांत नहीं होती। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इसलिए इच्छाओं का नहीं, आत्मा का अनुसरण करें।
भोग नहीं, वैराग्य है मुक्ति का मार्ग; कमल की तरह संसार में रहें
मुनिश्री ने कहा कि संसार के भोग अंततः रोग का कारण बनते हैं। मनुष्य को संसार में रहते हुए भी कमल के समान निर्लिप्त रहना चाहिए। जैसे कमल जल में रहकर भी उससे अछूता रहता है, वैसे ही साधक को संसार में रहते हुए भी मोह और ममता से ऊपर उठना चाहिए।
उन्होंने कहा कि न स्वयं पर से प्रभावित होना है और न दूसरों को प्रभावित करने का अहंकार रखना है। परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी, किन्तु साधक की आत्मिक शांति अडिग रहनी चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि भोग भुजंग (सर्प) के समान हैं। जिस प्रकार सर्प का विष जीवन के लिए घातक होता है, उसी प्रकार अनियंत्रित भोग-विलास, तृष्णा और विषयासक्ति आत्मा की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा हैं। वैराग्य का उदय होते ही पाप और भोगों की आकांक्षा स्वतः समाप्त होने लगती है।
श्रद्धा, भक्ति और जिनवाणी से गुंजायमान रहा पुण्योदय अतिशय क्षेत्र
चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धा, भक्ति और अध्यात्म का अनुपम वातावरण बना रहा। प्रतिदिन की भाँति श्रद्धालुओं ने पूजन, अर्घ्य समर्पण, जिनवाणी वंदना एवं विविध धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया।
धर्मसभा में बाहर से पधारे राकेश जैन (महामंत्री, श्री मुनिसुव्रतनाथ अतिशय क्षेत्र, केशोरायपाटन), श्री महेन्द्र गोधा (अध्यक्ष, खंडेलवाल समाज, दादाबाड़ी) एवं श्री सिद्धार्थ जैन (पूर्व अध्यक्ष, महावीर नगर विस्तार योजना) ने परम पूज्य मुनिश्री के श्रीचरणों में श्रीफल अर्पित कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।
तत्पश्चात चातुर्मास स्वागत समिति द्वारा सभी अतिथियों का आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया गया।
आज के प्रमुख पुण्यार्जक
प्रशासनिक मंत्री अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेन्द्र जी, हुकम जैन ‘काका’, प्रकाश हरसोरा परिवार, महावीर मित्तल परिवार तथा सुशीला जी एवं विवेक ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
अशोक खादी ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन रामरतन जी, प्रेमवती जी, डॉ. अक्षय जी, डॉ. निधि जी, प्रजस एवं जनित सहित समस्त बरमुंडा परिवार (घाट का बराना वाले), इंदिरा विहार तथा समस्त चिन्मय भक्त परिवार, कोटा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।
धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन महावीर जी, भारती जी, नेहा जी एवं सिद्धार्थ जी मित्तल परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि मुनिश्री योगसागर के आहारदान का सौभाग्य हुकमचंद जी, कपिल जी एवं श्री अमित जी सोगानी परिवार को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर मोना माडिया एवं हर्षा कोटिया द्वारा सम्पन्न किया गया।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभावपूर्वक आचार्यश्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
🌼 गुरुवाणी के अमृत संदेश 🌼
🔸 छोड़ने में ही पाने का वास्तविक रहस्य छिपा है।
🔸 आकांक्षाओं का अंत ही संतोष और आत्मशांति का प्रारंभ है।
🔸 लोभ और तृष्णा मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं।
🔸 भोग अंततः रोग का कारण बनते हैं, वैराग्य ही मोक्षमार्ग का आधार है।
🔸 देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा आत्मकल्याण का प्रथम आधार है।
🔸 त्याग, संयम, दान और आत्मचिंतन ही जीवन को परम शांति और सिद्धत्व की ओर ले जाते हैं।





