गीता श्लोक 11/03…
विराट रूप दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना …
अर्जुन प्रार्थना करते हैं कि हे पुरुषोत्तम ! आप अपने आप को जैसा कहते हैं, यह वास्तव में ऐसा ही है। हे परमेश्वर ! आपके ईश्वर संबंधी रूप को मैं देखना चाहता हूं ।
अर्जुन कहते हैं कि हे भगवान! मेरी दृष्टि में इस संसार में आपके सामान कोई उत्तम या श्रेष्ठ नहीं है। भगवान ने कहा मैं क्षर से अतीत और अक्षर से उत्तम हूं । अतः में शास्त्र और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूं ।
अर्जुन कहते हैं कि हे पुरुषोत्तम! आपने मेरे प्रति अपने अलौकिक प्रभाव का सामर्थ और प्रभाव जो वर्णन किया है, वह वास्तव में वैसा ही है । भगवान ने कहा कि यह संसार मेरे से ही उत्पन्न हुआ है और मेरे में ही लीन हो जाता है। मेरे सिवा इसका कोई कारण नहीं है और सब कुछ वासुदेव अर्थात कृष्ण ही हैं । ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अद्भुत, अधिदेव,अधियग्य मैं ही हूं ।अनन्य भक्ति से प्राप्त होने वाला परम तत्व मैं ही हूं। मेरे से ही यह संपूर्ण संसार व्याप्त है, मैं संसार में हूं, परंतु संसार मेरे में नहीं है ।
गीता श्लोक 11/04….
अर्जुन द्वारा विश्वरूप दिखाने की प्रार्थना…….
अर्जुन बोले कि_ हे प्रभु ! मेरे द्वारा आपका वह ऐश्वर्य रूप देखा जा सकता है, ऐसा अगर मानते हैं, तो हे योगेश्वर ! आप अपने इस अविनाशी स्वरूप को मुझे दिखा दीजिए ।
जो सर्व समर्थ है, उसका नाम प्रभु है । इससे यह प्रतीत होता है कि प्रभु आप मुझ में विराट रूप देखने की सामर्थ मानते हैं, तब तो ठीक है अन्यथा आप मेरे को ऐसी सामर्थ दीजिए _ जिसमें मैं आपका वह ऐश्वर्य अर्थात ईश्वर संबंधी रूप देख सकूं । प्रभु यदि आप अपना रूप नहीं दिखाएंगे तो भी, मैं यही मानूंगा कि आपका रूप तो वैसा ही है, जैसा iआप कहते आए हैं । परंतु मैं उसको देखने का अधिकारी नहीं हूं, योग्य नहीं हूं अथवा पात्र भी नहीं हूं । इस तरह अर्जुन को भगवान के वचनों में जरा भी संदेह नहीं है । वरन दृढ़ विश्वास है, इसलिए वह कहते हैं कि आप मेरे को अपना विराट रूप दिखा दीजिए ।
इस श्लोक में अर्जुन, भगवान को “योगेश्वर” कहकर संबोधित कर रहे हैं । इसका तात्पर्य है कि भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, हठयोग, राजयोग, लययोग, मंत्रयोग आदि जितने भी योग हो सकते हैं, उन सबके आप मालिक हैं । इसलिए आप अपनी अलौकिक योग शक्ति से वह विराट रूप दिखा दीजिए ।
गीता श्लोक 11/ 05…
भगवान द्वारा अर्जुन को विश्वरूप देखने की आज्ञा देना…
भगवान भोले_ हे अर्जुन ! हे प्रथानंदन ! अब मेरे अनेक तरह के और अनेक वर्णों अर्थात रंगो तथा आकृतियां वाले सैकड़ो, हजारों, अलौकिक रूपों को तू देख ।
अर्जुन ने प्रभु से संकोच पूर्वक प्रार्थना की उसको भी सुनकर भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए और अर्जुन के लिए पार्थ कहकर संबोधन किया । अर्जुन तुम्हारा मेरा रिश्ता भी है, तुम मेरे बुआ प्रथा के अर्थात कुंती के पुत्र हो। फिर, अर्जुन से कहा कि तू मेरे रूपों को देख । रूपों में एक, दो, चार को नहीं, सैकड़ो और हजारों रूपों को देख । अन्य गिनती रूपों को देख । भगवान पहले कह चुके हैं कि मेरी विभूतियों का अंत नहीं है । परंतु यहां मेरे रूपों का अंत नहीं है ।
भगवान उन स्वरूपों की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि उन स्वरूपों की बनावट तरह-तरह की है । उनके रंग भी तरह-तरह के हैं । उनमें एक-एक रूप में भी कई कई रंग हैं । उन रूपों की आकृतियां भी तरह-तरह की हैं । कोई छोटा है, कोई मोटा है, कोई लंबा है, कोई नाटा है, कोई चौड़ा है । आदि आदि है।
भगवान का यह दिव्य रूप सबके सामने प्रकट नहीं है । वरण संसार रूप से ही प्रकट है । क्यों मनुष्य की दृष्टि भगवान की तरफ न होकर संसार की तरफ ही रहती है । अवतार लेने पर प्रभु तो भगवत रूप में अवतार नहीं लेते वरन मनुष्यों के रूप में प्रकट होते हैं । ऐसे ही विश्वरूप भगवान सबके सामने संसार रूप से प्रकट रहते हैं । हर एक को यह विश्वरूप या संसार रूप से ही में दिखाता हूं । अब भगवान अपने दिव्य, अविनाशी, विश्वरूप से साक्षात प्रकट होकर अर्जुन को कह रहे हैं कि तू मेरे दिव्य रूपों को देख ।
गीता श्लोक 11/06…..
अर्जुन तो देवताओं को देख…
भगवान बोले_ हे भारत वंश के उद्भव अर्जुन ! बारह आदित्यों को,आठ वासियों को, ग्यारह रुद्रों को और दो अश्विनी कुमारों को तथा उनचास मरुदगनों को देख । जिनको तूने पहले कभी नहीं देखा _ ऐसे बहुत से आश्चर्यजनक रूपों को तू देख।
कुल मिलाकर 33 कोटि देवता हैं । देवताओं में मर्दानों का नाम भी आता है, परंतु वे 49 मारुदगनो, इन 33 कोटि / प्रकार के देवताओं से अलग माने गए हैं । क्योंकि वह दैत्यों से देवता बने हैं, इसलिए भगवान ने भी मरुदगनों को अलग बताया है । हे अर्जुन ! पहले तुमने इन सबको, इन रूपों को, कभी अपनी आंखों से नहीं देखा, कानों से नहीं सुना, मन से चिंतन नहीं किया, बुद्धि से कल्पना नहीं की, इन रूपों की तरफ तुम्हारी कभी वृत्ति ही नहीं गई, ऐसे अन्य रूपों को भी तू अब देख ले
गीता श्लोक 11/07
हे भगवान , मैं इन रूपों को कहां देखूं ?
भगवान बोले है नींद को जीतने वाले गुडाकेश अर्थात अर्जुन ! मेरे इस शरीर के एक देश में अथवा एक अंश में चराचर सहित संपूर्ण जगत को अभी देख ले । इसके सिवाय तू और भी जो कुछ देखना चाहता है, वह भी देख ले ।
यहां भगवान ने अर्जुन को गुडाकेश कहकर संबोधित किया है । गुडा का अर्थ होता है, नींद और ईश का अर्थ होता है _स्वामी अर्थात वह पुरुष जिसका नींद पर अधिकार है, (अर्थात अर्जुन) उसे गुडाकेश कहते हैं । नींद पर स्वामित्व करने वाला, नींद को जीतने वाला, नींद पर अधिकार करने वाला, एक पुरुष भगवान के समक्ष ही खड़ा है, वह है_ अर्जुन । भगवान कह रहे हैं कि हे अर्जुन तू बिना आलस के,बिना नींद के, तू मेरा विराट रूप, विश्वरूप देख ।
गीता श्लोक 11/08..
भगवान द्वारा अर्जुन को दिव्य नेत्र प्रदान करना….
भगवान अर्जुन से कहते हैं कि तू इन अपनी आंखों से अर्थात चर्म चक्षुओं से या नेत्रों से मेरे अर्थात मेरे विश्वरूप को नहीं देख पाएगा, इसलिए मैं तुझे दिव्य नेत्र प्रदान करता हूं, जिससे तू मेरे ईश्वरीय सामर्थ को देख सकेगा ।
भगवान ने पार्थ पद का प्रयोग कई बार करके अर्जुन को अपना विश्व रूप देखने की आज्ञा दी ।तब अर्जुन ने अपनी पूरी पूरी आंखें खोलकर विराट रूप अर्थात विश्व रूप को देखने की कोशिश की । परंतु अर्जुन को इन सामान्य नेत्रों से भगवान का विश्वरूप दिखाई नहीं दिया । अतः अर्जुन को इन सामान्य नेत्रों से भगवान का विश्व रूप न देखने का कारण बताते हैं। फिर इनको दिव्य नेत्र प्रदान करके विश्व रूप देखने की उन्हें आज्ञा देते हैं ।
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! तुम्हारे जो कर्म चक्षु अर्थात चर्म नेत्र हैं, उनकी देखने की शक्ति बहुत अल्प है और सीमित भी है । प्राकृतिक होने के कारण यह चरम चक्षु केवल प्रकृति के कुछ कार्य को ही देख सकते हैं । परंतु वे मन, बुद्धि, इंद्रियों से अतीत, मेरे रूप को नहीं देख सकते हैं । अर्जुन_ तुझे अतींद्रिय, अलौकिक रूप को देखने की सामर्थ वाले दिव्या
चक्षु मैं प्रदान करता हूं अर्थात तेरे इन्हीं नेत्रों को दिव्य शक्ति प्रदान करता हूं । ताकि तू अतींद्रिय, अलौकिक पदार्थ भी देख सके और उनकी दिव्यता को भी देख सके और उनकी दिव्यता भी जान सके ।
गीता श्लोक 11/09…
अर्जुन ने भगवान का विश्व स्वरूप देखा…….
भगवान अर्जुन को अपना विश्व रूप दिखा रहे हैं । उसका सीधा वृतांत, संजय_ अपने। महाराज धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं और वह कह रहे हैं कि __
हे राजन ! ( धृतराष्ट्र) ऐसा कहकर महायोगेश्वर भगवान ने अर्जुन को परमैष्वर्य विराट रूप दिखाया ।
धृतराष्ट्र के मंत्री संजय को दिव्य दृष्टि, महर्षि वेदव्यास ने प्रदान की थी, ताकि वह युद्ध स्थल का आंखों देखा वृतांत महाराज धृतराष्ट्र को सुना सकें । अतह भगवान के विश्व रूप के दर्शन अर्जुन के साथ-साथ संजय को भी प्राप्त हुए । अब संजय भगवान के इस विराट रूप के दर्शन के बारे में महाराज धृतराष्ट्र को बता रहे हैं ।
पहले भगवान ने अर्जुन से कहा था कि तू अपने चक्षुओं से मुझे नहीं देख सकता । इसलिए मैं तुझे दिव्य नेत्र प्रदान करता हूं । तू मेरे ईश्वर संबंधी योग को देख । अर्जुन ने भगवान को योगेश्वर कहा और संजय यहां भगवान को महायोगेश्वर कह रहे हैं । तात्पर्य है कि भगवान ने अर्जुन को प्रार्थना से बहुत अधिक अपना स्वरूप दिखाया । जिससे भक्त की थोड़ी सी वास्तविक रुचि भगवान की तरफ होने पर भगवान अपनी अपारशक्ति से उसकी पूर्ति कर देते हैं ।
गीता श्लोक 11/10 और 11/11…
संजय द्वारा भगवान के ऐश्वर्य रूप का वर्णन …
संजय, महाराज धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि जिनके अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेक तरह के अद्भुत दर्शन हैं, अनेक अलौकिक आभूषण है, हाथों में उठाए हुए अनेक दिव्या
आयुध हैं तथा जिनके गले में दिव्य मालाएं हैं, जो अलौकिक वस्त्र पहने हुए हैं, जिनके ललाट अर्थात माथे पर, शरीर पर, दिव्य चंदन, कुमकुम आदि लगा हुआ है, ऐसे संपूर्ण आश्चर्यमय अनंत रूपों वाले तथा सब तरफ मुखों वाले, ऐसे अपने दिव्य रूप को भगवान ने दिखाया ।
विराट रूप में प्रकट हुए भगवान के जितने मुख और नेत्र दिखाई दे रहे हैं, वे सब के सव दिव्य हैं । विराट रूप में जितने प्राणी दिखाई दे रहे हैं, वह सब के सब दिव्य हैं और उनके मुख, नेत्र, हाथ पर अस्त्र, सबके सब विराट रूप भगवान के हैं । भगवान स्वयं ही विराट रूप से प्रकट हुए हैं ।
भगवान ने अपने हाथों में चक्र, गदा,धनुष, वाण,पारेख आदि अनेक प्रकार के जो आयुध, अस्त्र-शस्त्र उठा रखे हैं, वह सब के सब दिव्य हैं । विराट रूप भगवान ने गले में फूलों की, सोने की, चांदी की, मोतियों की रतन की, गूंजों आदि की अनेक प्रकार की मालाएं धारण कर रखी हैं, वह सभी दिव्य हैं । उन्होंने अपने शरीरों पर लाल, पीले, हरे, सफेद, कपिश आदि, अनेक रंग के वस्त्र पहन रखे हैं, वे सभी दिव्य हैं ।
गीता श्लोक 11/12….
भगवान के विराट रूप में प्रकाश.
संजय, राजा धृत्रराष्ट्र को बता रहे हैं कि _ अगर आकाश में एक साथ हजारों सूर्य का उदय हो जाए तो भी उन सब प्रकाश मिलकर उस महात्मा (विराट रूप परमात्मा) के प्रकाश के समान शायद ही हो अर्थात नहीं हो सकता ।
आकाश में हजारों तारे एक साथ उदित होने पर भी, उन सब का मिला हुआ प्रकाश, एक चंद्रमा के प्रकाश के सदस्य नहीं हो सकता और हजारों चंद्रमाओं का मिला हुआ प्रकाश, एक सूर्य के प्रकाश के सदस्य नहीं हो सकता । ऐसे ही आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदित होने पर भी, उनका सबक मिला हुआ प्रकाश विराट रूप भगवान के प्रकाश के सदस्य नहीं हो सकता । हजारों सूर्यों का प्रकाश भी विराट रूप भगवान के प्रकाश के बराबर नहीं हो सकता । ऐसा प्रकाश देखकर संजय भी संकोच में पड़ गए हैं। सूर्य का प्रकाश तो भौतिक है । जबकि विराट रूप भगवान का प्रकाश दिव्य है । भौतिक प्रकाश कितना ही अधिक क्यों न हो, दिव्य प्रकाश के सामने हमेशा तुच्छ अर्थात कम ही रहता है । संजय भी हजारों सूर्यों के भौतिक प्रकाश की कल्पना करके, विराट रूप भगवान के प्रकाश या तेज का लक्ष्य कराते हैं ।
गीता श्लोक 11/13…
संजय के अनुसार, अर्जुन विश्वरूप भगवान के दर्शन करते हैं ……
संजय कहते हैं कि हे राजन (धृतराष्ट्र) ! उस समय अर्जुन ने देवों के देव भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित, अनेक प्रकार के विभागों में विभक्त संपूर्ण जगत को देखा ।
अनेक प्रकार के विभागों में विभक्त जैसे यह देवता हैं, यह मनुष्य हैं, यह पशु हैं, यह पृथ्वी है, यह समुद्र हैं, यह आकाश है, यह नक्षत्र हैं, आदि विभागों के सहित विस्तार से संपूर्ण चराचर जगत को भगवान के, शरीर के भी, एक देश में अर्थात एक भाग में अर्थात एक अंश में, अर्जुन ने भगवान के दिए हुए, दिव्य नेत्रों से प्रत्यक्ष देखा । भगवान श्रीकृष्ण के छोटे से शरीर के भी एक अंश में चर और अचर, स्थावर और जंगम सहित संपूर्ण संसार है । वह संसार भी अनेक ब्रह्मांडों के रूप में, अनेक देवताओं के, लोकों के रूप में, अनेक व्यक्तियों और पदार्थों के रूप में, विभक्त और विस्तृत, इस प्रकार से अर्जुन ने स्पष्ट रूप से देखा ।
गीता श्लोक 11/14…
भगवान के विराट रूप के दर्शन के बाद, अर्जुन की दशा…
संजय बोले कि हे राजन (धृतराष्ट्र) ! भगवान के विश्वरूप को देखकर अर्जुन बहुत चकित हुए और आश्चर्य के कारण उनका शरीर रोमांचित हो गया । वे हाथ जोड़कर विश्व रूप देव को मस्तक से प्रणाम करके बोले ।
अर्जुन ने भगवान के रूप के विषय में जैसी कल्पना भी नहीं की थी, वैसा रूप देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ । भगवान ने मेरे पर कृपा करके विलक्षण आध्यात्मिक बातें अपनी ओर से बताई और अब कृपा करके मेरे को अपना विलक्षण रूप दिखा रहे हैं । इस बात को लेकर अर्जुन प्रसन्नता के कारण रोमांचित हो उठे ।
भगवान की विलक्षण कृपा को देखकर अर्जुन का ऐसा भाव उमड़ा कि मैं इस सबके बदले में क्या कृतज्ञता प्रकट करूं ? मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि जो मैं भगवान के अर्पण कर सकूं । मैं तो केवल सिर से प्रमाण प्रणाम ही कर सकता हूं अर्थात अपने आप को ही अर्पित कर सकता हूं । अतः अर्जुन हाथ जोड़कर और सिर झुका कर प्रणाम करते हुए, भगवान की स्तुति करने लगे ।
गीता श्लोक 11/15….
अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति..
अर्जुन बोले कि हे देव ! मैं आपके शरीर में संपूर्ण देवताओं को तथा प्राणियों के विशेष_ विशेष समुदायों को और कमलासन पर बैठे हुए ब्रह्माजी को, शंकर जी को, संपूर्ण ऋषियों को और दिव्य सर्पों को देख रहा हूं ।
अर्जुन की भगवान द्वारा प्रदत्त दिव्य दृष्टि इतनी विलक्षण है कि उनको देवलोक भी अपने सामने दिखाई दे रहे हैं । इतना ही नहीं, उनको सबकी सब त्रिलोक दिख रहे हैं । केवल तीनों लोक ही नहीं, वरन त्रिलोक के उत्पाद, ब्रह्मा, पालन करता विष्णु, संहार करता महेश भी, प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे हैं । अतः अर्जुन कह रहे हैं कि मैं संपूर्ण देवों को, प्राणियों के समुदायों को और ब्रह्मा तथा शंकर को देख रहा हूं । अर्जुन पुनः कहते हैं कि मैं कमल के आसान से ऊपर विराजमान ब्रह्मा जी को देख रहा हूं। इससे यह बात जाहिर होती है कि अर्जुन कमल के नाल को और कमल नाल के उद्गम स्थान अर्थात मूल आधार भगवान विष्णु को, जो शेषनाग की सैया पर सोए हुए हैं, वह भी दिखाई दे रहे हैं । इसके सिवाय भगवान शंकर को, उनके कैलाश पर्वत को और कैलाश पर्वत पर उनके निवास स्थान, बट वृक्ष को भी देख रहे हैं । पृथ्वी पर जितने रहने वाले ऋषि हैं उनको, पाताल लोक को और दिव्य सर्पों को भी अर्जुन देख रहे हैं ।
गीता श्लोक 11/16….
अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति…
अर्जुन कहते हैं कि हे विश्व स्वरूप! हे विश्वेश्वर ! आपको मै हाथों, पेटो, मुखों और नेत्रों वाला तथा सब ओर सीमांत रूपों वाला देख रहा हूं । मैं न आपके आदि को, न मध्य को और न अंत को ही देख पा रहा हूं।
अर्जुन ने भगवान को दो नाम विश्वरूप और विश्वेसर से संबोधित किया है, जिसका तात्पर्य है कि हे प्रभु ! मेरे को जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह सब आप ही है और इस विश्व के मालिक भी आप ही हैं । सांसारिक मनुष्य के शरीर तो जड़ होते हैं और उनमें शारीरिक चेतन होता है, परंतु आपके विराट रूप में शरीर और शरीरी अर्थात आत्मा रूप से एक आप ही हैं । अतः अर्जुन विश्वरूप संबोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीर हैं और विश्वेश्वर संबोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीर अर्थात शरीर के मालिक अर्थात आत्मा है ।
भगवान से अर्जुन कह रहे हैं कि मैं आपके हाथों की ओर देखता हूं तो आपके हाथ भी अनेक हैं, आपके पेट की तरफ देखता हूं तो आपके पेट भी अनेक हैं और आपके मुख की ओर देखता हूं तो आपके मुख भी अनेक हैं । आपके नेत्रों की तरफ देखता हूं तो आपके नेत्र भी अनेक हैं । तात्पर्य यह है कि आपके हाथों पेटों मुख और नेत्रों का कोई अंत नहीं है । सब के सब अनंत हैं ।
गीता श्लोक 11/17…
भगवान में क्या क्या है ?
अर्जुन बोल मैं आपको किरीटि अर्थात मुकुट, गदा, चक्र तथा शंख और पद्म धारण किए हुए देख रहा हूं । आपको तेज की राशि, सब और प्रकाश वाले, देदीप्यमान अग्नि तथा सूर्य के समान कांति वाले नेत्रों के द्वारा कठिनता से देखे जाने योग्य और सब तरफ से अप्रमेय स्वरूप देख रहा हूं ।
हे प्रभु मैं आपको मुकुट गदा और चक्र धारण किए हुए देख रहा हूं । यहां अर्जुन को विश्व रूप में भगवान विष्णु का चतुर्भुज रूप शंख चक्र गदा और पदम धारण किए हुए भी दिखाई दे रहा है । प्रभु आप तेज की राशि है । मानो तेज का समूह अर्थात अनंत तेज इकट्ठा हो गया है । आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदित होने पर भी भगवान के तेज की बराबरी नहीं कर सकते । आप ऐसे प्रकाशमान हैं । स्वयं प्रकाश स्वरूप होने से आप चारों तरफ प्रकाश फैला रहे हैं
गीता श्लोक 11/18….
अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति..
अर्जुन बोल हे भगवान ! आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात अक्षर ब्रह्म हैं। आप ही इस संपूर्ण विश्व के परम आश्चर्य, आप ही सनातन धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं । ऐसा मैं मानता हूं ।
हे प्रभु वेदों, शास्त्रों, पुराणों, स्मृतियों संतों की वाणियों और तत्वज्ञ महापुरुषों द्वारा जानने योग्य, जो परमानंद स्वरूप अक्षर ब्रह्म हैं, जिनको निर्गुण निराकार कहते हैं, वह आप ही हैं ।
हे प्रभु देखने, सुनने, समझने में जो कुछ संसार में आता है, उस संसार के प्रारंभ, आश्रय आप ही हैं । जब महाप्रलय होता है और फिर महासर्ग के आदि में आपसे ही यह प्रकट होता है । इस तरह आप इस संसार के परम निधान हैं । जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब आप ही अवतार लेकर अधर्म का नाश करके, सनातन धर्म की रक्षा करते हैं । अव्यय अर्थात अविनाशी सनातन आदि रहित, सदा रहने वाले, उत्तम पुरुष आप हैं । ऐसा मैं मानता हूं ।






