गीता श्लोक 2/5.(भाग – 1)
अर्जुन की बातें उचित ही हैं…
अर्जुन पुनः कहते हैं कि महानुभाव गुरुजनों को न मार कर, इस लोक में मैं भिक्षा का अन्य खाना भी श्रेष्ठ समझता हूं, क्योंकि गुरुजनों को मार कर यहां रक्त से सने हुए तथा धन की कामना की मुख्यता वाले भोगों को ही तो भोगूंगा।
गीता श्लोक 2/2 में भगवान अर्जुन से कहते हैं कि इस विषम अवसर पर तुम्हारे अंदर यह कायरता कहां से आ गई?
श्लोक 2/3 में भगवान कहते हैं कि अर्जुन तुम नपुंसकता को प्राप्त मत हो। युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
इस श्लोक में ऐसा लग रहा है कि भगवान द्वारा श्लोक 2/2 और श्लोक 2/3 में कहे हुए वचनों का, अब अर्जुन पर असर अर्थात प्रभाव दिखाई दे रहा है। इसी प्रभाव से अर्जुन के मन में यह विचार आ रहा है कि भीष्म, द्रोण आदि को मारना धर्म संगत नहीं है। फिर भी भगवान मुझे बिना किसी झिझक या संदेह के युद्ध करने अर्थात इन लोगों को मारने के लिए कह रहे हैं। अतः कहीं न कहीं, मैं ही नहीं समझ पा रहा हूं। अतः यह सोचकर ही अर्जुन अपनी पहली और अबकी बात में संतुलन बना रहे हैं और अब उनकी बात में भी अकड़ नहीं है अर्थात नरमाई आ रही है।
गीता श्लोक 2/5 (भाग -2)
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अर्जुन सोच रहे हैं कि यदि मैं नहीं लडूंगा तो, राज्य भी नहीं मिलेगा और हमारा जीवनयापन बड़ी कठिनता से होगा, फिर भी मैं इन पूज्य लोगों को मार कर राज्य प्राप्त करने से तो भिक्षा मांग कर जीना पसंद करूंगा और उन्हें बचाने के लिए भी यही उचित है.
इस श्लोक में “अपि”पद का प्रयोग किया गया है. जिसका अर्थ होता है “भी” अर्जुन कह रहे हैं कि मेरे लिए पूजनीय अर्थात गुरु एवं पितामह आदि को मारना “भी” उचित नहीं, क्योंकि मैं क्षत्रिय हूं और क्षत्रिय का कर्तव्य भिक्षा मांगना नहीं है । अतः दोनों ही कार्य मेरे लिए उचित नहीं, तो फिर क्या करें?
अर्जुन अब भगवान की कही हुई बातों की तरफ ध्यान देते हुए कहते हैं कि अगर मैं आपकी (श्रीकृष्ण की ) आज्ञा के अनुसार कार्य करूं, तो युद्ध में गुरुजनों श्रृद्देयों की हत्या करके जो राज्य प्राप्त होगा, उससे मुझे राज्य भोग तो मिलेगा, परंतु न शांति मिलेगी और न मुक्ति मिलेगी .
श्रीमद्भगवद्गीता- कालीचरण राजपूत






