Tuesday, February 10, 2026
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श्रीमद्भगवद्गीता- कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 2/5 (*भाग -3)

….

इस श्लोक में “अर्थकामान” एक विशेषण है। जिसका अर्थ है, धन की कामना वाले। परंतु अर्थ अर्थात धन की कामना वाले हैं कौन? क्या गुरु द्रोण हैं? क्या पितामह भीष्म है? नहीं यह दोनों तो बिल्कुल नहीं है। यह दोनों दुर्योधन का दिया हुआ अन्य तो खा रहे हैं, परंतु धन अर्थात “अर्थ” की कामना वाले बिल्कुल नहीं है … तो फिर कौन है? यह दोनों तो अपने जीवन को बचाए रखने के लिए दिन प्रतिदिन अन्न तो खाते हैं, परंतु धन के लोभी नहीं हैं। दुर्योधन का अन्न खाना एक प्रकार की वृत्ति अर्थात वेतन है, जिसे धन या भोजन, वस्त्र रूप में बार-बार प्राप्त कर रहे हैं। इसे धन की कामना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पितामह को धन चाहिए होता तो, वह राज क्यों त्यागते? शादी भी कर लेते और राज भी ले लेते। परन्तु धन के लोभी न होने के कारण ऐसा नहीं किया।

धन आदि का लोभी तो दुर्योधान है, जो राज्य, धन आदि पाने के लिए युद्ध कर रहा है. धन आदि के लिए अन्धा होकर किसी की बात नहीं माँ रहा.

गीता श्लोक 2/6 (भाग -1)

हम उन्हें जीतेंगे या वे हमें जीतेंगे…

भगवान के वचन तो बड़े विलक्षण हैं जो अर्जुन पर धीरे-धीरे प्रभाव डाल रहे हैं। मैं युद्ध नहीं करूंगा — इस विषय पर अर्जुन को स्वयं भी संदेह होता जा रहा है। वह कहते हैं कि…

हम भी नहीं जानते हैं कि हम लोगों के लिए युद्ध करना अथवा न करना, इन दोनों में से कौन सा अत्यंत श्रेष्ठ है अथवा हम उन्हें जीतेंगे अथवा वह हमें जीतेंगे, जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते। वही दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के संबंधी हमारे सामने खड़े हैं.

अर्जुन कहते हैं कि मैं युद्ध करूं या फिर ना करूं, इस बात का निर्णय मशीन नहीं कर पा रहा हूं। प्रभु आपकी दृष्टि में तो युद्ध करना श्रेष्ठ है। इसलिए कह रहे हैं कि उठ और युद्ध कर। परंतु मेरी दृष्टि में श्रद्धेयजनों को मारना पाप है। यदि इन दोनों पक्षो को सामने रखो, तो मैं यह नहीं जान पा रहा कि इन दोनों (युद्ध करूँ या न करूँ ) में से श्रेष्ठ कौन सा है।

[25/01, 7:46 am] Kavi -K. C. Rajput: गीता श्लोक 2/6 (भाग -2)

..हम जीतेंगे अथवा वे लोग….

प्रभु! यदि आपकी आज्ञा, कि युद्ध करो, का पालन भी किया जाए तो भी, यह भी नहीं पता कि वह दुर्योधन आदि जीतेंगे या फिर हम जीतेंगे। ऐसा लग रहा है कि अर्जुन को अपने पर विश्वास नहीं हो रहा। परंतु ऐसा नहीं है, उसे अर्थात अर्जुन को अपने पर तो पूरा भरोसा है, परंतु भविष्य पर, कि युद्ध का परिणाम क्या होगा, इस पर विश्वास नहीं है। हे केशव! बात तो यह है कि जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वही धृतराष्ट्र के संबंधी हमारे सामने खड़े हैं। यह सब लोग हमारे कुटुंबी ही तो हैं। इन्हीं को मारकर हम कैसे जिएंगे?

गेरता श्लोक 2/7 (भाग -1)

प्रभु आप हमारे निश्चित कलयाण की बात कहें…

क्या करूं और क्या न करूं, इस बात का निर्णय अर्जुन नहीं कर पा रहे। इसलिए उनकी बेचैनी बढ़ रही है। अतः वह भगवान से ही प्रार्थना करते हैं कि –

हे प्रभु! कायरता रूप दोष से तिरस्कृत स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित अंतरण वाला, मैं आपसे पूछ रहा हूं कि जो बात निश्चित कल्याण करने वाली हो, वह बात मेरे लिए कहिए। मैं आपका शिष्य हूं। आपकी शरण में आए हुए, मुझे शिक्षा दीजिए।

अर्जुन युद्ध से अलग होना चाहते हैं। फिर पाप से बचने के लिए, युद्ध से अलग होना ही उचित मान रहे हैं। उनके लिए युद्ध से अलग होना कायरता नहीं है, वरन एक गुण है, जिससे कुटुंब का बचाव हो रहा है। वह तो कह रहे हैं कि मेरे स्वभाव में न दीनता है और न पलायन (युद्ध में पीठ दिखाना)।

अर्जुन की दो प्रतिज्ञाएं हैं-

एक- उनके अंदर न दीनता है और

दो – न पलायन करना अर्थात युद्ध से पीठ दिखाकर भाग जाना.

गीता धलोक 2/7 (भाग -2)

हे प्रभु! मेरे निश्चित कल्याण की बात कहें….

….. अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि जिसमें मेरा निश्चित कल्याण हो, ऐसी बात कहिए। साथ ही यह भी कह रहे हैं कि “शिष्य ते अहम” अर्थात “मैं आपका शिष्य हूं।” अर्जुन भगवान से कल्याण की बात पूछ रहे हैं, तो सबसे पहले वह अपने को, प्रभु का शिष्य बता रहे हैं। क्योंकि कल्याण की बात तो गुरु जी से ही पूछी जाती है। अतः अपने को शिष्य मानकर, अपने आप को, अपने गुरु जी के समर्पित कर देते हैं। अपने को शिष्य कहने से पहले, अर्जुन का भगवान के प्रति सारथी भाव था। इसी कारण से वह भगवान को आदेश देते हैं कि मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा करो और भगवान ऐसा ही करते हैं।

अब अर्जुन कहते हैं कि “साधि मॉम त्वाम प्रपन्नम” अर्थात “मैं आपकी शरण में हूं”, मुझे शिक्षा दीजिए। परंतु “प्रपंनम” अर्थात आप शिक्षा दीजिए। इससे यह लग रहा है कि अभी अर्जुन पूरी तरह से भगवान के समर्पित नहीं है। अगर अपने आप को समर्पित कर देते हैं तो वह भगवान से यह नहीं कहते कि मुझे शिक्षा दीजिए। समर्पित हो जाने पर तो पूरी जिम्मेदारी भगवान की हो जाती है। शिष्य का अपना कोई कर्तव्य नहीं रह जाता। जो कुछ करना है, अब भगवान ही करेंगे।

गीता श्लोक 2/7 (भाग – 3)

… निधिश्चित कल्याण की बात..

अब अच्छा और बुरा भगवान को ही तय करना है। शिष्य को तो बस आदेश का पालन करना है, फिर परिणाम अच्छा हो या फिर खराब। शरण देने वाले भगवान जैसा शिष्य से कराएंगे, वैसा शिष्य को करना पड़ेगा।

अब तक अर्जुन ने चार बातें कही हैं –

एक – कायरता रूप दोष से तिरस्कृत स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित अन्तःकरण वाला, मैं अर्जुन.

दूसरा – जो निश्चित कल्याण करने वाली बात हो, हे प्रभु! वही बात कहिए

तीसरा – “शिष्य ते अहम” अर्थात मैं आपका शिष्य हूं और

चौथी बात- मैं आपकी शरण में हूं, मुझे शिक्षा अर्थात उचित ज्ञान दीजिए। मेरा उचित मार्गदर्शन कीजिए।

पहली लाइन – में अर्जुन अपनी बात कहते हैं.

दूसरी लाइन- में प्रार्थना करते हैं.

तीसरी लाइन- में भगवान के शिष्य बन जाते हैं।

चौथी लाइन – में “स्वयं” भगवान के शरणागत हो जाते हैं

अब तो जो कुछ करना है, वह सब भगवान को ही करना है।

गीता श्लोक 2/8..

हे प्रभु! मेरा शोक दूर नहीं होगा

भगवान की शरण हो जाने के बाद अर्जुन जान रहे हैं कि भगवान की इच्छा तो अभी भी युद्ध करने की है, परंतु मैं युद्ध करना धर्म समझ नहीं मानता। यहां अर्जुन एक बार फिर अपने हृदय की बात भगवान के समक्ष रखते हैं—-

हे प्रभु कारण यह है कि पृथ्वी पर धन – धान्य, समृद्ध और शत्रु रहित राज्य तथा स्वर्ग में देवताओं का आधिपत्य मिल जाए तो भी, इंद्रियों को सुखाने वाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाए, ऐसा में नहीं देख पा रहा हूं।

अर्जुन यह सोच रहे हैं कि भगवान यह समझते हैं कि अर्जुन युद्ध करेगा और उसकी विजय होगी, उसे राज्य मिल जाएगा, इससे उसके सारे शौक संताप मिट जाएंगे , परंतु मेरी तो ऐसी दशा हो गई है कि विजय मिलने पर भी, मेरा अशोक दूर नहीं होगा। अगर धन-धान्य से संपन्न राज्य मिल जाए, प्रजा सब सुखी हो जाए, राज्य में कोई कहीं वेरी ना हो, इस तरह का राज्य मिल जाए, फिर भी मेरी चिंता, शोक दूर नहीं होंगे। पृथ्वी का राज्य तो तुच्छ भोगो वाला है। अगर मुझे इंद्र का दिव्य भोगो वाला राज्य भी मिल जाए तो भी, मेरा शोक दूर नहीं होगा ।

वास्तव में शोक का कारण क्या है?

अर्जुन कहते हैं कि जब कुटुंबियों के मरने की आशंका से ही मुझे इतना शक हो रहा है, तब उनके मरने पर कितना दुख होगा। अतः दुख का मिटना तो दूर रहा, उल्टा दुःख और बढ़ेगा, क्योंकि युद्ध में सब मारे जाएंगे तो राज्य का सुख भोगेगा कौन?

गीता श्लोक 2/9…

अर्जुन का निर्णय – “मैं युद्ध नहीं करूंगा”.

संजय और महाराज धृतराष्ट्र आपस में बातें कर रहे हैं – संजय अर्जुन की मनोव्यथा का वर्णन करते हुए धृतराष्ट्र से कहते हैं कि —

हे शत्रुतापन (धृतराष्ट्र)! ऐसा कह कर अर्जुन, जो निद्रा विजई हैं, बोले कि हे अंतर्यामी गोविंद! मैं युद्ध नहीं करूंगा। ऐसा साफ-साफ कहकर चुप हो गए।

अर्जुन ने अपने पक्ष और भगवान के पक्ष पर विचार किया, तब अंततः इस निर्णय पर पहुंचे कि युद्ध करने से राज्य मिल जाएगा, मान, सम्मान, यश मिल जाएगा। परंतु मेरे अंदर जो शोक और चिंता है, दुख है, वे सब दूर नहीं होंगे। अतः अर्जुन को युद्ध न करना ही अधिक उचित लगा। अर्जुन भगवान की प्रत्येक बात का आदर करते हैं। फिर भी भगवान की युद्ध वाली बात अर्जुन को सही नहीं जान पड़ रही। इसलिए जो उनके मन की बात है, उसे ही स्पष्ट रूप से भगवान के सामने रख देते हैं कि- हे प्रभु! मैं युद्ध नहीं करूंगा। अपने मन की बात साफ-साफ कहकर भगवान को बता दी और चुप हो गए ! क्योंकि अब कहने को शेष रहा ही क्या है?

 

ग्रेता श्लोक – 2/10 (भाग -1)

भगवान को हँसी सी आगई –

अर्जुन ने तो साफ साफ मना कर दिया कि “मैं युद्ध नहीं करूंगा”। उसके बाद की बात संजय, धृतराष्ट्र को बताते हैं – –

संजय बोले हे भारत वंश के उद्भव धृतराष्ट्र! दोनों सेनाओं के मध्य भाग में विषाद करते हुए उस अर्जुन के प्रति हंसते हुए से भगवान ह्रिषिकेष (सबकी इंद्रियों की बात जानने वाले)… (अगले श्लोक में कहे जाने वाले) वचन बोले….

अर्जुन ने दोनों सेनाओं के मध्य में रथ खड़ा करने के लिए कहा था. अब वहीं पर विषाद मग्न हो गए। होना तो यह चाहिए था, कि जिस उद्देश्य से आए थे, उस उद्देश्य को पूरा करते अर्थात युद्ध के लिए खड़े हो जाते। परंतु ऐसा नहीं हुआ। वह तो उल्टे विषाद मग्न हो गए। तब भगवान ने अर्जुन को उपदेश देना आरंभ किया। अर्जुन के भाव बदलने पर भगवान कृष्ण कुछ विशेषता से हंसते हुए से अपनी बात कहने लगे – –

एक- इस समय अर्जुन के भाव बदल गए।

दो – पहले कहा था मैं आपकी शरण में हूं, मुझे शिक्षा दीजिए। तीन – अब अर्जुन ने स्वयं ही निश्चय कर लिया कि मैं युद्ध नहीं करूंगा।

इन सब बातों को देखकर भगवान को हंसी सी आ गई। शरण में आ जाने पर अब अर्जुन के पास सोचने या निर्णय लेने के लिए कुछ नहीं बचा। अब तो भगवान जो कार्य कराए, शिष्य अर्जुन, वही काम करें। अब अच्छे या बुरे का निर्णय भगवान को लेना है, अर्जुन को नहीं.

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