क्राइम स्टोरी | वृंदावन
वृंदावन… जहां आस्था के साथ-साथ सराफा कारोबार भी वर्षों से भरोसे की नींव पर खड़ा रहा है। लेकिन इसी भरोसे को गहरी चोट पहुंचाने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। सर्राफा कारोबार के नाम से मशहूर बनवारी अग्रवाल और दिनेश अग्रवाल अचानक ऐसे गायब हुए कि पूरा बाजार सन्न रह गया।
दोनों कारोबारी यह कहकर घर से निकले थे कि वे देश की दूसरी मंडियों में चांदी से बने जेवरात बेचने जा रहे हैं। यह बात सराफा बाजार के लिए कोई नई नहीं थी। वर्षों से यही तरीका रहा, यही परंपरा चली आ रही थी। लेकिन इस बार कहानी ने खतरनाक मोड़ ले लिया।
दिन बीते… फिर हफ्ते।
ना वापसी हुई, ना किसी व्यापारी से संपर्क।
मोबाइल फोन स्विच ऑफ।
घर और दुकानें बंद।
धीरे-धीरे अफवाहों ने सच का रूप ले लिया।
1500 किलो चांदी और 35 करोड़ की गुमशुदगी
व्यापारियों के मुताबिक, बनवारी और दिनेश अग्रवाल करीब 1500 किलो चांदी, जिसकी बाजार कीमत लगभग 35 करोड़ रुपये आंकी जा रही है, अपने साथ लेकर निकले थे। इस चांदी में करीब दो दर्जन सराफा व्यापारियों की पूंजी लगी हुई थी। किसी ने माल दिया था, किसी ने पैसा—सबने भरोसा किया था।
लेकिन अब वही भरोसा सबसे बड़ा जख्म बन गया है।
व्यापारियों में हड़कंप, पुलिस के दरवाज़े तक मामला
घबराए और आहत व्यापारियों ने पहले नगर उद्योग व्यापार मंडल के महामंत्री शशिभानु गर्ग से मुलाकात की। जब कोई सुराग नहीं मिला, तो सभी व्यापारी एकजुट होकर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के आवास पहुंचे और पूरे मामले की जानकारी दी।
शशिभानु गर्ग के अनुसार, पुलिस कप्तान ने भरोसा दिलाया है कि आरोपियों को जल्द पकड़ लिया जाएगा। एसपी सिटी के नेतृत्व में एक विशेष जांच टीम गठित कर दी गई है। जैसे-जैसे और पीड़ित व्यापारी सामने आ रहे हैं, वैसे-वैसे तहरीरें भी दर्ज की जा रही हैं।
आस्था की नगरी में भरोसे पर सबसे बड़ा वार
मथुरा-वृंदावन की पहचान सिर्फ मंदिरों और भक्ति से नहीं, बल्कि आपसी विश्वास से भी जुड़ी रही है। सराफा बाजार में लेन-देन अक्सर कागज़ से ज़्यादा ज़ुबान और रिश्तों पर चलता है। लेकिन 35 करोड़ की इस चांदी की ठगी ने पूरे बाजार की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है।
अब सवालों के घेरे में…
क्या पुलिस फरार कारोबारियों तक पहुंच पाएगी?
क्या 35 करोड़ की चांदी बरामद हो सकेगी?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या सराफा बाजार का टूटा भरोसा फिर से जुड़ पाएगा?
फिलहाल वृंदावन का सराफा बाजार डर, आक्रोश और अनिश्चितता के साए में है। हर दुकान पर यही चर्चा है—
“भरोसा टूटा है… अब इंसाफ कब मिलेगा?”




