Tuesday, April 21, 2026
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राजस्थानी को राजभाषा बनाने की मांग तेज, सीएडी चौराहे से ओम बिड़ला कार्यालय तक निकाला गया जुलूस

कोटा/राजस्थानी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर रविवार को शहर में जोरदार आंदोलन देखने को मिला। “राजस्थानी बणै राजभासा” अभियान के तहत सुबह 11 बजे सीएडी चौराहे से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के कार्यालय तक विशाल जुलूस निकाला गया। इसमें बड़ी संख्या में साहित्यकारों, समाजसेवियों और भाषा प्रेमियों ने भाग लिया।

जुलूस के दौरान प्रतिभागियों ने राजस्थानी भाषा के समर्थन में नारे लगाए और सरकार से शीघ्र संवैधानिक मान्यता देने की मांग की।

लोकसभा अध्यक्ष की भाषा को अब तक नहीं मिला दर्जा

राजस्थानी मोट्यार परिषद के संभागाध्यक्ष दिलीप सिंह हाड़ा ‘हरप्रीत’ ने कहा कि देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की भाषाओं को मान्यता प्राप्त है, लेकिन देश के तीसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर आसीन लोकसभा अध्यक्ष की मातृभाषा राजस्थानी को अब तक न तो राजभाषा का दर्जा मिला है और न ही संवैधानिक पहचान।

उन्होंने इसे राजस्थानी समाज के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बताया और सरकार से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की।

वर्षों से चल रहा है संघर्ष

महाकवि किशन वर्मा ने कहा कि राजस्थानी भाषा के सम्मान और मान्यता के लिए संघर्ष वर्षों से चलता आ रहा है। बावजूद इसके अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, जिससे भाषा प्रेमियों में निराशा है।

वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही ‘बाबा’ ने राजस्थानी को शीघ्र राजभाषा बनाने की मांग करते हुए कहा कि यह भाषा करोड़ों लोगों की पहचान और संस्कृति से जुड़ी हुई है।

जन-जन की भाषा है राजस्थानी

जिलाध्यक्ष राहुल रामरतन ने कहा कि राजस्थानी केवल एक बोली नहीं, बल्कि जन-जन की भाषा और राजस्थान की आत्मा है। उन्होंने कहा कि जब तक इसे संविधान में स्थान नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

बड़ी संख्या में रहे मौजूद

इस अवसर पर रामकरण प्रभाति, सत्येंद्र वर्मा, रूपनारायण संजय, सुनील कुमार, रामेश्वर गोचर, घासीलाल पंकज, अरविंद पालीवाल, सुरेंद्र योगी, राम रतन वर्मा, दुर्गालाल वर्मा, मदनलाल बैरवा, अभिषेक वर्मा सहित अनेक सामाजिक एवं साहित्यिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

सरकार से जल्द निर्णय की मांग

कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने केंद्र सरकार से मांग की कि राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कर संवैधानिक मान्यता दी जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व हो सके।

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