Monday, March 9, 2026
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श्रीम‌द्भगवद्‌‌गीता- कालीचरन राजपूत

ग्रेता श्लोक – 2/10 (भाग -1)

भगवान को हँसी सी आ गई –

अर्जुन ने तो साफ साफ मना कर दिया कि “मैं युद्ध नहीं करूंगा”। उसके बाद की बात संजय, धृतराष्ट्र को बताते हैं – –

संजय बोले हे भारत वंश के उद्भव धृतराष्ट्र! दोनों सेनाओं के मध्य भाग में विषाद करते हुए उस अर्जुन के प्रति हंसते हुए से भगवान ह्रिषिकेष (सबकी इंद्रियों की बात जानने वाले)… (अगले श्लोक में कहे जाने वाले) वचन बोले….

अर्जुन ने दोनों सेनाओं के मध्य में रथ खड़ा करने के लिए कहा था. अब वहीं पर विषाद मग्न हो गए। होना तो यह चाहिए था, कि जिस उद्देश्य से आए थे, उस उद्देश्य को पूरा करते अर्थात युद्ध के लिए खड़े हो जाते। परंतु ऐसा नहीं हुआ। वह तो उल्टे विषाद मग्न हो गए। तब भगवान ने अर्जुन को उपदेश देना आरंभ किया। अर्जुन के भाव बदलने पर भगवान कृष्ण कुछ विशेषता से हंसते हुए से अपनी बात कहने लगे – –

एक- इस समय अर्जुन के भाव बदल गए।

दो – पहले कहा था मैं आपकी शरण में हूं, मुझे शिक्षा दीजिए। तीन – अब अर्जुन ने स्वयं ही निश्चय कर लिया कि मैं युद्ध नहीं करूंगा।

इन सब बातों को देखकर भगवान को हंसी सी आ गई। शरण में आ जाने पर अब अर्जुन के पास सोचने या निर्णय लेने के लिए कुछ नहीं बचा। अब तो भगवान जो कार्य कराए, शिष्य अर्जुन, वही काम करें। अब अच्छे या बुरे का निर्णय भगवान को लेना है, अर्जुन को नहीं.

गीता श्लोक 2/10 (भाग – 2)

भगवान् को हँसी सी आ गयी

भगवान के हृदय में अर्जुन- शिष्य, भक्त, सखा के प्रति दयालुता उम्र रही है। इस समय भगवान, अर्जुन के वचनों के प्रति ध्यान न देकर, उनके भाव की तरफ ध्यान दे रहे हैं। अतः वे अर्जुन को उपदेश देना शुरू कर देते हैं, जो वचन मात्र से भगवान के शरण हो जाता है। उसे भगवान स्वीकार तो कर ही लेते हैं। भगवान के मन में साधक के प्रति हमेशा दयालुता रहती ही है।

इस श्लोक में भगवान को ऋषिकेश कहकर संबोधित किया गया है। ऋषिकेश पद दो पदों से मिलकर बना है ह्रशीक = इंद्रियां, ईश = स्वामी, भगवान प्रभु अर्थात इंद्रियों की भी बात जाने वाले इस अर्थात भगवान अर्थात इंद्रियों के स्वामी। इंद्रियों के स्वामी कौन हैं? भगवान श्री कृष्ण.

गीता श्लोक 2/11 (भाग -1)

श्रीभागवान द्वारा अर्जुन की शोक निवृत्ति का प्रयास..

 

अर्जुन शोक में डूबे हुए हैं। अतः भगवान उनकी शोक से निवृत होने का उपदेश शुरू करते हैं।

श्रीभगवान बोले -अर्जुन तुमने शोक न करने योग्य का शोक किया है और पंडिताई अर्थात विद्वता की बातें करते हो। परंतु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं अर्थात जो लोग अभी जीवित हैं, उनके लिए, पंडित अर्थात विद्वान लोग भी शौक नहीं करते ।

महाराज धृतराष्ट्र श्लोक 1/1 में पूछते हैं कि मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया अर्थात बात के आरंभ में ही मेरे और पांडु के अर्थात मेरे और पराये की बात होती है। धृतराष्ट्र अपने और अपने भाई के पुत्रों में भेदभाव कर रहे हैं। यह मेरे हैं और यह मेरे भाई के हैं।

धृतराष्ट्र और अर्जुन दोनों में ममता है, परंतु धृतराष्ट्र और अर्जुन की ममता में अंतर है। धृतराष्ट्र केवल अपने पुत्रों को मेरे कहते हैं, परंतु अर्जुन सारे कुटुंबीजनों को “मेरे” कहते हैं। अतः धृतराष्ट्र में पक्षपात है और अर्जुन में पक्षपात नहीं है। अर्जुन के लिए तो सारे कुटुंबीजन “पक्ष और विपक्ष के” मेरे अपने हैं।

गीता श्लोक 2/11 (भाग -1)

श्रीभागवान द्वारा अर्जुन की शोक निवृत्ति का प्रयास..

 

अर्जुन शोक में डूबे हुए हैं। अतः भगवान उनकी शोक से निवृत होने का उपदेश शुरू करते हैं।

श्रीभगवान बोले -अर्जुन तुमने शोक न करने योग्य का शोक किया है और पंडिताई अर्थात विद्वता की बातें करते हो। परंतु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं अर्थात जो लोग अभी जीवित हैं, उनके लिए, पंडित अर्थात विद्वान लोग भी शौक नहीं करते ।

महाराज धृतराष्ट्र श्लोक 1/1 में पूछते हैं कि मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया अर्थात बात के आरंभ में ही मेरे और पांडु के अर्थात मेरे और पराये की बात होती है। धृतराष्ट्र अपने और अपने भाई के पुत्रों में भेदभाव कर रहे हैं। यह मेरे हैं और यह मेरे भाई के हैं।

धृतराष्ट्र और अर्जुन दोनों में ममता है, परंतु धृतराष्ट्र और अर्जुन की ममता में अंतर है। धृतराष्ट्र केवल अपने पुत्रों को मेरे कहते हैं, परंतु अर्जुन सारे कुटुंबीजनों को “मेरे” कहते हैं। अतः धृतराष्ट्र में पक्षपात है और अर्जुन में पक्षपात नहीं है। अर्जुन के लिए तो सारे कुटुंबीजन “पक्ष और विपक्ष के” मेरे अपने हैं।

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