Tuesday, September 1, 2026
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पुस्तक समीक्षा ‘जंगल में फाग’ ( बाल काव्य संग्रह )

ऐसा देश है मेरा/ साहित्य…………811

पुस्तक समीक्षा

जंगल में फाग ( बाल काव्य संग्रह )

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जंगल में एक धूम मची है आया है फागुन मास

फाग खेलने चले जानवर हिलमिल आज रचाने रास

रंगा सियार चला इठलाता खरहा लाया लाल गुलाल

मला शेरनी के गालों पर चुपके से कर दिया कमाल

 

” जंगल में फाग ” की इस पहली बाल कविता के नाम पर पुस्तक के शीर्षक ” जंगल में फाग ” में 62 मनभावन, गुदगुदाने और हंसाने वाली कविताओं का संग्रह आज अचानक हाथ लगा। लेखिका डॉ. कृष्णा कुमारी के बाल मन से स्वस्फूर्त छोटी – छोटी कविताएं बहुत छोटी उम्र के बच्चों के मनोरंजन के साथ – साथ उनके ज्ञानवर्धन का खज़ाना हैं। कविताओं की भाषा मनोवैज्ञानिक रूप से बाल मन के स्तर की हैं।

अधिकांश कविताएं आसानी से पढ़े जाने वाले बड़े अक्षरों में और एक पेज पर कविता भाव के रेखा चित्र के साथ प्रस्तुत की गई हैं। चित्र के साथ कविता से पुस्तक बच्चों के लिए बेहद मनोरंजक बन गई है।

अच्छी कविता बच्चों को खेल खेल में अंक गणित समझते नज़र आती है……

 

एक दूनी दो दो दूनी चार, ये सब बातें हैं बेकार

चार लिए छ: , छः चौके आठ, जो यह कहते उनके ठाठ

 

रोबोट की दुनिया में भी बच्चों को चंदा मामा और बंदर वाली कहानियां ही भाती हैं, यही संदेश दिया है रोबोटों की चाल निराली कविता में। ” चींटी ” कविता में बच्चों को मेहनत और मिलजुल कर काम करने का संदेश बहुत सरलता से दिया गया है…….

 

श्रम से कभी ना आंख, चुराती सतत परिश्रम करती चींटी

मिल जुल कर हर काम सरल है, सबको यह समझती चींटी

कड़वापन कई न सुहाता, चीनी की दीवानी चींटी

हाथी भी इस से घबराए, ऐसी है नन्हीं से चींटी

 

गर्मी के दिनों में क्या हाल होता है, ताल तलैया सूख जाते हैं, जंगल प्यासा हो जाता है, हवा गर्म लू के तौर चलाती है, पेड़ों ने भी बरसात आने तक छाया से कुट्टी करली , मनुष्य और पशु – पक्षी सभी बेहाल हो जाते हैं का सटीक संदेश ” गर्मी आई ! दईया ! दईया !! ” कविता में बच्चों तक पहुंचाने का अच्छा प्रयास किया गया है। ” ऊंट जी ” कविता बच्चों को ऊंट की खूबियां बताती नज़र आती है। ” सुंदर जीवन “कविता में बच्चों को पढ़ने, इंसान बनने, अपना रास्ता स्वयं बनाओ, नए नए बहाने बनाने और झूठ बोलने से बचने की नैतिक शिक्षा प्रदान करती है………

 

बच्चों समय है पढ़ने का, सुंदर जीवन गढ़ने का।

लिख – पढ़ कर इंसान बनी तुम, ऊंचा अपना नाम करो तुम,

कठिन परिश्रम और अनुशासन, गुरुजन की आज्ञा का पालन,

नए – नए सोपान प्रगति के, यही मंत्र है चढ़ने का।

 

संसार में मॉ का महत्व समझती कविता ” मॉ” में सीख दी है है , जग से अच्छी मेरी मॉ,प्यारी लगती मेरी मॉ, प्रथम पूज्य गुरु है मेरी, ज्ञानी ध्यानी मेरी मॉ। छोटे बच्चे पर पापा बात बात पर बरसते हैं, दीदी आंख दिखती है, मम्मी डांटती है, बच्चा ” हे भगवान ” कविता में कहता है , छोटा हूं मैं तुम्ही बोलो, किस से करने जाऊ शिकायत। ” फूल” कविता की ये पंक्तियाँ देखिए………

 

भीनी – भीनी से मनभावन, खुशबू खूब लुटाते फूल

छोटी – सी टहनी पर खिल कर, जग – भर को महकाते फूल

कांटों वाला ताज पहन कर, हंसते और हंसाते फूल

बच्चों भी फूलों जैसे ही, होते हैं समझते फूल।

 

बाल काव्य संग्रह की कुछ और बानगी देखिए..

 

होली

रंग अबीर लिए हमजोली, आए आज बना कर टोली

लो डरने वाले बच्चों की, धूल उड़ाती शामत आई

रंग रंगीली होली आई।

मन – पलाश खिल उठे अचानक,भू – आकाश लगे मनमोहक,

रंगों और उमंगों में जब ,भीग गया मौसम हरजाई,

रंग रंगीली होली आई

 

मोर

ठुमक ठुमक कर नाच रहा, देखो बच्चों बन में मोर

सतरंगी पाखें फैलाए, कैसा लगता है चितचोर

टेर – टेर कर मेघ बुलाता, रिमझिम सावन जल बरसाए

भारत का गौरव यह पक्षी, सब के मन को खूब लुभाए।

 

मेरी गुड़िया

नन्हीं – मुन्नी मेरी गुड़िया, लेकिन है आफत की पुड़िया

दिन भर करती है शैतानी, सब कहते हैं उसको नानी

 

काश हम बच्चे ही……

काश कि हम बच्चे ही रहते, सैर सपाटा करते दिन भर

खूब नाचते हंसते गाते, हंसी ठिठोली, आंख मिचौली

उधम करते शोर मचाते,झूठ मूठ के नाटक करते

कभी मचलते, कभी चहकते, मुस्कानों के फूल खिलते

कभी रूठते, हंसते – रोते, मम्मी को भी खूब सताते

पापा से हूं कुछ कुछ डरते।

 

ऐसे ही मनभावन कविताएं भैया तू जल्दी आना, चंदामामा, खुश है मुन्ना, तितली और बिल्ली, हाथी दादा, मेरी नानी, मेरा बस्ता, मिठ्ठू राम, धूप, गुब्बारा, इम्तिहान के दिन, लंच, भारत देश महान आदि कविताएं भी संग्रह में शामिल हैं। पुस्तक का आवरण और पृष्ठ कवर पेज जंगल में फाग शीर्षक के अनुरूप सुंदर बना है, जिसे स्वयं लेखिका ने अपने कला मन से साकार कर चित्रकला प्रेम का परिचय दिया है। लेखकीय में बच्चों के नाम पाती में आशा जताई है , बच्चें और उनके मित्र बार – बार पढ़ेंगे, अपने मम्मी पापा को सुनाएंगे , गायेंगे मुस्कुराएंगे…। उन्होंने यह पुस्तक अपनी बेटी स्वप्निल और बेटे नवनीत की बाल सुलभ नटखटताओ, चंचलताओं,मनमोहक शरारतों, को समर्पित कर उनसे प्रेरित होकर ही बच्चों के लिए लिखी है।

 

लेखिका : डॉ. कृष्णा कुमारी, कोटा

प्रकाशक : अनिल प्रकाशन, दिल्ली

प्रथम प्रकाशन : 2014

कवर : हार्ड बाउंड

पृष्ठ : 76

मूल्य : 200 ₹

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समीक्षक

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

लेखक एवं पत्रकार, कोटा

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