Monday, April 20, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर 

 

****ग़ज़ल****

शकूर अनवर

रंगे-सियासत* उखड़ा-उखड़ा।

नज़्मे-हुकूमत* बिखरा-बिखरा।।

*

मद्धम-मद्धम चाॅंद-सितारे।

रात का चेहरा उतरा-उतरा।।

*

सूरज का वो क़हर* बपा है।

हर कोई है सहमा-सहमा।।

*

सुलझी हुई है उसकी ज़ुल्फ़ें।

अपना मुक़द्दर उलझा-उलझा।।

*

हिज्र* में ऑंखें भीगी-भीगी।

इश्क़ का दरिया सूखा-सूखा।।

*

ख़त्म हुआ है चलो इलेक्शन।

नेताओं ने पल्ला झाड़ा।।

*

मैखाने पर उतरे पंछी।

रास न आये काशी-काबा।।

*

मेरे ही तो नक़्श* मिलेंगे।

जंगल-जंगल सेहरा-सेहरा*।।

*

जीवन की इस जंग को “अनवर”।

मर जाऊॅंगा लड़ता-लड़ता।।

*

शब्दार्थ:-

रंगे-सियासत*राजनीति का रंग

नज़्मे-हुकूमत*शासन व्यवस्था

क़हर*प्रकोप

हिज्र*वियोग जुदाई

नक्श*चिन्ह निशान

सेहरा*रेगिस्तान

शकूर अनवर

9460851271

 

*****ग़ज़ल* *****

शकूर अनवर

 

कब कहा मैंने चमन का फूल होना था मुझे।

चलते-चलते राह की बस धूल होना था मुझे।।

*

आपको क़ातिल ही बनना था इसी में शान थी।

फिर मुक़ाबिल*आपके मक़तूल* होना था मुझे।।

*

ये ज़माना गुल की नरमी,रंगो-ख़ुशबू का नहीं।

इस ज़माने में तो कोई शूल होना था मुझे।।

*

मेरी फ़ितरत* में तो गुमनामी भी है,तन्हाई भी।

मेरी क़िस्मत में मगर मक़बूल* होना था मुझे।।

*

शायरी में फ़ाइलुन-मफ़ऊल बन कर रह गया।

इस हुनर में कम से कम माक़ूल होना था मुझे।।

*

सुस्त-रफ़्तारी से “अनवर” कितना पीछे रह गया।

ज़िंदगी की दौड़ में मशग़ूल* होना था मुझे।।

*

शब्दार्थ:-

मुक़ाबिल”समक्ष,सामने

मक़तूल*जिसका कत्ल हुआ हो

फ़ितरत*स्वभाव

मक़बूल*प्रसिद्ध

मशग़ूल* व्यस्त

*

शकूर अनवर

 

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