रामनवमी
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अवतरण-दिवस प्रभु श्री राम का चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी ।
हुई मगन है स्वर्ण-धरा वो पर्व पुनीता नवमी ।।
तारनहार जगत के जो माधुर्य-रुप बरसाए ।
आलौकिक उस देख छटा को मन-मन्दिर हर्षाए ।।
नित्य-नियम-संयम-मर्यादा का एक पाठ पढ़ाया ।
नवधा भक्ति कर प्रदान शबरी का मान बढ़ाया ।।
अनमोल उदाहरण प्रेम का शबरी के जूठे बैर यही ।
भाव शुद्ध हों तो प्रभु अपनाने में करते देर नहीं ।।
करुणा-सागर-दीन-बंधु की महिमा अपरंपार है ।
हृदय से जो करें स्मरण हो उसका बेड़ापार है ।।
अकारण ही दुष्टों को जो पहुँचादे निज धाम हैं ।
सरकार राघवेन्द्र की यह लीला लगती ललित ललाम है ।।
मन-मन्दिर ही पुरी अयोध्या मन-मन्दिर त्रेता युग है ।
करें रमण सबके उर में प्रभु डालते चन्ना-चुग हैं ।।
सबका रग़-रग़ रहें राममय भक्ति की रस-धार बहे ।
सर्वान्तर्यामी राघव “पुखराज” तिहाँरी शरण गहे ।।
(स्वरचित/मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित)
(रचनाकार: बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”)
कोटा (राजस्थान)






