: गीता श्लोक 6/40 ….
कल्याणकारी कार्य से दुर्गति नहीं होती…
भगवान भोले है प्रथम नंदन अर्जुन उसका ना तो इस श्लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है क्योंकि है अर्जुन कल्याणकारी काम करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता
जिसको अंत काल में परमात्मा का स्मरण नहीं होता, उसका कहीं पतन तो नहीं हो जाता? इस बात को लेकर अर्जुन के हृदय में बहुत व्याकुलता है और यह व्याकुलता भगवान से छुपी नहीं है । अतः भगवान अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले ही अर्जुन के प्रश्न ” क्या गति होगी ” के द्वारा हृदय की व्याकुलता दूर करते हैं
भगवान कहते हैं कि हे प्रथा नंदन ! सच्चे हृदय से साधन करने वाले मनुष्य का न तो इस जन्म में पतन होता है और न मरने के बाद ही पतन होता है। तात्पर्य यह है कि योग में उसकी स्थिति इतनी बन चुकी है कि उससे नीचे वह नहीं गिरता । उसकी साधन सामग्री नष्ट नहीं होती । उसका परमार्थिक उद्देश्य नहीं बदलता । इस श्लोक में भगवान ने अर्जुन को पार्थ कहा है । जो आत्मीय संबंध का द्योतक है । अर्जुन के सब नाम में श्री कृष्ण को “पार्थ” नाम अत्यंत प्रिय था । यहां पर आया हुआ पद तात भी अत्यंत प्यार का द्योतक है
गीता श्लोक 6/32..
भक्त का भगवान के साथ व्यवहार ……
भगवान कहते हैं कि है अर्जुन जो भक्त अपने शरीर की उपमा से सब जगह मुझे समान देखता है और सुख तथा दुख को भी सामान देखता है, वह परम योगी माना गया है
मनुष्य चाहता है कि उसके किसी अंग में किसी तरह की पीड़ा ना हो वैसे ही सब प्राणियों में भगवान को देखने वाला भक्त सभी प्राणियों का समान रूप से आराम चाहता है । उसके समान कोई दुखी प्राणी आ जाए तो अपने शरीर के किसी अंग का दुख दूर करने की स्वाभाविक चेष्टा होती है । जैसे साधारण मनुष्य अपने शरीर की पूरी चिंता रखता है, वैसे ही भक्त भी दूसरों के शरीर स्वस्थ रखने की स्वाभाविक चेष्टा करता है
गीता श्लोक 6/31 …
भगवान हर प्राणी में स्थित हैं.. भगवान कहते हैं कि मुझ में एक ही भाव से स्थित जो भक्त योगी संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरा भजन करता है, वह सब कुछ वरताव करता हुआ भी मुझ में ही बर्ताव कर रहा है अर्थात वह नित्य निरंतर मुझ में ही स्थित है
भगवान केवल प्राणियों में ही स्थित है, ऐसी बात नहीं । भगवान तो संसार के कण कण में परिपूर्ण रूप से स्थित हैं । सृष्टि के पहले और सृष्टि के समय और सृष्टि के बाद एक परमात्मा ही परमात्मा है। परंतु लोगों की दृष्टि में प्राणियों और पदार्थ की सत्ता अलग प्रतीत होने के कारण उनको समझने के लिए कहा जाता है कि सब में एक ही परमात्मा है, दूसरा कोई नहीं । भगवान कहते हैं कि जो मेरे को सब में देखा है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता । संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरे साथ उसकी अभिन्नता हो गई है अर्थात मेरे साथ उसका अत्यधिक प्रेम हो गया है
गीता श्लोक 6/35 …..
मन के निग्रह /नियंत्रण करने के उपाय…
भगवान कहते हैं कि हे महाबाहु अर्जुन! यह मन बड़ा चंचल है और उसका निग्रह अर्थात नियंत्रण करना भी बड़ा कठिन है। यह तुम्हारा कहना बिल्कुल ठीक है, परंतु हे कुंती पुत्र !अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसका निग्रह अर्थात नियंत्रण किया जा सकता है
अर्जुन ने पहले चंचलता के कारण मां का निग्रह करना अर्थात बस में करना बड़ा कठिन बताया इस बात पर भगवान कहते हैं कि तुम जो कहते हो वह एकदम ठीक बात है और निस्संदिग्ध बात है क्योंकि मन बड़ा चंचल है और इसका निग्रह करना अर्थात नियंत्रण में करना या बस में करना बड़ा कठिन है
अर्जुन की माता कुंती अर्थात श्री कृष्ण की हुआ बहुत विवेक वती अर्थात ज्ञानवती तथा भोगों से विरक्त रहने वाली थी । कुंती ने भगवान कृष्ण से सदा विपत्ति का वरदान मांगा था । ऐसा वरदान मांगने वाला इतिहास में बहुत कम मिलता है । भगवान इस श्लोक में कौंतेय संबोधन देकर अर्जुन को कुंती माता की याद दिलाते हैं कि जैसे तुम्हारी माता कुंती विरक्त अर्थात साध्वी हैं । ऐसे ही तुम भी संसार से विरक्त होकर अर्थात सन्यासी होकर परमात्मा में लग जाओ और मन को संसार से हटाकर परमात्मा में लगाओ
गीता श्लोक 6/33….
मन की चंचलता से समता नहीं आती…..
अर्जुन बोले हे मधुसूदन ! आपने समता पूर्वक जो यह योग कहा है मन की चंचलता के कारण, मैं इस योग की स्थिति नहीं देखता हूं । मन की चंचलता के कारण योग स्थिर नहीं होता
मनुष्य के कल्याण के लिए भगवान ने खास बात कही है कि सांसारिक पदार्थों की प्राप्ति या अप्राप्ति को लेकर चित्त में समता अर्थात समान भाव रहना चाहिए । इस समता से मनुष्य का कल्याण होता है । अर्जुन पापों से डरते थे, तो उनके लिए भगवान ने कहा की जय _पराजय, लाभ_ हानि,सुख और दुख को समान समझकर युद्ध करो, फिर तुम्हें पाप नहीं लगेगा । ऐसा गीता के श्लोक 2/38 में कहा गया है । सम बुद्धिपूर्वक सांसारिक काम करने से कर्मों से बंधन नहीं होता । एक स्थान पर भगवान ने कहा है कि जो कर्म फल का आश्रय न लेकर कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है । इसी कर्म फल त्याग की सिद्धि को भगवान ने समता बताया है
गीता श्लोक 6/34…
मन की चंचलता….
अर्जुन कहते हैं कि है कृष्ण ! मन बड़ा ही चंचल,प्रमथनशील, दृढ़ अर्थात जिद्दी और बलवान है । उसको रोकना, मैं आकाश में स्थित वायु को रोकने की तरह अत्यंत कठिन मानता हूं
इस श्लोक में एक विशेषता नजर आ रही है कि यहां अर्जुन भगवान को उनका नाम लेकर संबोधित कर रहे हैं, कि “हे कृष्ण” आप ही कृपा करके मेरे मन को खींचकर अपने में लगा लें, तब तो यह मन लग सकता है । मेरे से तो इसका बस में होना कठिन है, क्योंकि यह मन बड़ा ही चंचल है । चंचलता के साथ-साथ यह प्रमाथी अर्थात जिद्दी ही है अर्थात यह साधक को अपनी स्थिति से विचलित कर देता है । यह मन बड़ा चंचल है, जिद्दी है और बलवान भी है
कृष्ण__ कृष्ण पद या शब्द का अर्थ होता है, कर्षण करने वाला या खींचने वाला या आकर्षित करने वाला । अर्जुन यहां यह कहना चाहते हैं कि हे प्रभु मेरे मन को आप अपनी ओर आकर्षित कर लीजिए अपनी ओर खींच लीजिए तभी यह मन स्थिर रह सकता है, अन्यथा नहीं
गीता श्लोक 6/38 …
क्या साधक कभी छिन्न _भिन्न हो जाता है
अर्जुन कहते हैं कि हे महाबाहो संसार के आश्रय से रहित और परमात्मा प्राप्ति के मार्ग में मोहित अर्थात विचलित, इस तरह दोनों और से भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न_ भिन्न बादल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता?
वह साधक सांसारिक प्रतिष्ठा से तो रहित हुआ है अर्थात उसने संसार की सुख आराम आदर सत्कार यश प्रतिष्ठा आदि की कामना छोड़ दी है । इनको प्राप्त करने का उसका उद्देश्य है ही नहीं। इस तरह संसार का आश्रय छोड़कर वह परमात्मा प्राप्ति के मार्ग पर चला, पर जीवित अवस्था में साधन से विचलित हो गया अर्थात् परमात्मा की स्मृति नहीं रही । ऐसा वह दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ अर्थात सांसारिक और परमार्थिक दोनों उन्नतियों से रहित हुआ सड़क छिन्न-भिन्न बादल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? यदि साधक ने संसार के आश्रय को छोड़ दिया,फिर वह साधक नष्ट तो नहीं हो जाता? उसका पतन तो नहीं हो जाता? जिस सड़क ने संसार छोड़ा है, वह संसार और जिसकी प्राप्ति के लिए चला, वह परमात्मा तथा साधक स्वयं चेतन है, उसने संसार छोड़ दिया और ईश्वर प्राप्त नहीं हुआ, तब साधक का क्या होगा
गीता श्लोक 6/36 …
मन बस में करने से योग प्राप्त होता है……..
भगवान कहते हैं कि जिसका मन पूरा बस में नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है । परंतु उपाय पूर्वक यत्न करने वाले तथा वश में किए हुए मन वाले साधक को योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है
भगवान कहते हैं कि मेरे मत में जिसका मन वश में नहीं है, उसके द्वारा योग सिद्ध होना कठिन है । क्योंकि योग की सिद्ध में मन का वश में होना जितना वाधक है उतनी मन की चंचलता बाधक नहीं है । ध्यान योगी को अपना मन बस में करना चाहिए । मन बस में होने पर वह मन को जहां लगाना है, वहां लगा सकता है । जितनी देर लगाना चाहे, उतनी देर लगा सकता है । इसके अलावा जहां से हटाना चाहता वहां से हटा सकता है
गीता श्लोक 6/37 …
अर्जुन का प्रश्न……….
अर्जुन कहते हैं कि हे कृष्ण ! जिसकी साधन में श्रद्धा है, परंतु जिसका साधन शिथिल है, वह अंत समय में अगर योग से विचलित मन अर्थात जिसका मन योग से विचलित हो जाए, तो वह योग सिद्ध को प्राप्त न करके किस गति को चला जाता है ? अर्थात उसकी क्या गति होती है
जिसकी साधन में अर्थात जप, ध्यान, सत्संग,स्वाध्याय आदि में रुचि है, श्रद्धा है और उसको करता भी है, परंतु अंतहकरण और वहिकरण बस में न होने से, साधन में शिथिलता है अर्थात तत्परता नहीं है । ऐसा साधक अंत समय में संसार में राग रहने से, विषयों में राग रहने से,अपने साधन से विचलित हो जाए अर्थात अपने स्वाध्याय पर स्थिर न रहे तो फिर उसकी क्या गति होगी
गीता श्लोक 6/40 …
कल्याणकारी कार्य से दुर्गति नहीं होती…
भगवान भोले है प्रथम नंदन अर्जुन उसका ना तो इस श्लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है क्योंकि है अर्जुन कल्याणकारी काम करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता
जिसको अंत काल में परमात्मा का स्मरण नहीं होता, उसका कहीं पतन तो नहीं हो जाता? इस बात को लेकर अर्जुन के हृदय में बहुत व्याकुलता है और यह व्याकुलता भगवान से छुपी नहीं है । अतः भगवान अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले ही अर्जुन के प्रश्न ” क्या गति होगी ” के द्वारा हृदय की व्याकुलता दूर करते हैं
भगवान कहते हैं कि हे प्रथा नंदन ! सच्चे हृदय से साधन करने वाले मनुष्य का न तो इस जन्म में पतन होता है और न मरने के बाद ही पतन होता है। तात्पर्य यह है कि योग में उसकी स्थिति इतनी बन चुकी है कि उससे नीचे वह नहीं गिरता । उसकी साधन सामग्री नष्ट नहीं होती । उसका परमार्थिक उद्देश्य नहीं बदलता । इस श्लोक में भगवान ने अर्जुन को पार्थ कहा है । जो आत्मीय संबंध का द्योतक है । अर्जुन के सब नाम में श्री कृष्ण को “पार्थ” नाम अत्यंत प्रिय था । यहां पर आया हुआ पद तात भी अत्यंत प्यार का द्योतक है
गीता श्लोक 6/39…
संसार का छेदन आप ही कर सकते हो केशव …
अर्जुन कहते हैं कि हे कृष्ण ! मेरे इस संदेह का सर्वथा छेदन करने के लिए आप ही योग्य हैं । क्योंकि इस संसार का छेदन करने वाला आपके सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं और हो ही नहीं सकता
परमात्मा प्राप्ति का उद्देश्य होने से साधक पाप कर्मों से तो सर्वथा रहित हो गया, इसलिए वह नरक में तो जा ही नहीं सकता । मनुष्य योनि में आने का उसका उद्देश्य नहीं । इसलिए वह उसमें भी नहीं आ सकता और परमात्मा प्राप्ति के साधन से भी विचलित हो गया । ऐसा साधक क्या छिन्न-भिन्न बादल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? प्रभु ऐसा मेरा संशय है । अर्जुन भगवान से यही कहना चाहते हैं कि वह योगी जो अभ्यास करके बना है अर्थात युंजान योगी है, वहीं तक जान सकता है, जहां तक उसके जाने की हद है । अर्जुन कहते हैं कि भगवान आप तो युक्त योगी हैं और आप तो बिना अभ्यास के बिना परिश्रम के सब कुछ जानने वाले हैं । आपके समान अन्य कोई जानकार नहीं है । आप तो साक्षात भगवान हैं और संपूर्ण प्राणियों की गति को जानने वाले हैं अतः इस योग भ्रष्ट के गति विषयक प्रश्न का उत्तर केवल आप ही दे सकते हैं । आप ही मेरे संदेह को दूर कर सकते हैं
गीता श्लोक 6/41…
योग भ्रष्ट पुरुष की दुर्गति तो नहीं हो जाती……
ज्ञान योग, भक्ति योग, ध्यान योग और कर्म योग आदि का साधन करने वाले जिस पुरुष का मन विक्षेप आदि विषयों से या रोग आदि के कारण अंत काल में लक्ष्य से विचलित हो जाता है, उसे योग भ्रष्ट कहा गया है
मृत्यु लोक से ऊपर ब्रह्म लोकतक जितने भी लोक हैं, सभी पुण्यवानों के लोक हैं, उनमें से योग भ्रष्ट पुरुष, योग रूपी महान पुण्य से प्रभाव से ऐसे लोकों में नहीं जाते, जहां वे भोगों में फंसकर दुर्गति को प्राप्त हो जाएं और न ऐसे अपवित्र धनवानों के घरों में ही जन्म लेते हैं, जो उनकी दुर्गति में हेतु बन सकें । वे पुण्यवाणों के घरों में जन्म लेते हैं । ताकि उनका जीवन वहीं से शुरू हो, जहां उन्होंने मृत्यु के समय छोड़ा था
: गीता श्लोक 6/42 ….
योग भ्रष्ट की राह किधर है ? भगवान कहते हैं कि वैराग्यवान योग भ्रष्ट ज्ञान योगियों के कुल में ही जन्म लेता है । इस प्रकार का जो यह जन्म है, यह संसार में निःसंदेह बहुत ही दुर्लभ है
साधन करने वाले दो प्रकार के होते हैं वासना रहित और वासना सहित जिनको साधन अच्छा लगता है जिनकी साधना में रुचि है और जो परमात्मा प्राप्त का लक्ष्य बनाकर साधन में लग भी जाता है । परंतु उसकी अभी भोगों में वासना सर्वथा मिटी नहीं है, वह अंत समय में साधन से विचलित होकर योग भ्रष्ट हो जाता है, तो वह स्वर्ग आदि लोकों में बहुत वर्षों तक रहकर शुद्ध श्रीमानों के घर में जन्म लेता है
दूसरा साधन जिसके भीतर वासना नहीं है, वरन् तीव्र वैराग्य है और जो परमात्मा का उद्देश्य रखकर तेजी से साधन में लगा है, परंतु अभी पूर्णता प्राप्त नहीं हुई है, आज ही वह किसी विशेष कारण से योग भ्रष्ट हो जाता है, तो उसको स्वर्ग आदि में जाना नहीं पड़ता, वरन् वह सीधा ही योगियों के कुल में जन्म लेता है
गीता श्लोक 6/43 ….
जन्म होने के बाद क्या होता है,?
भगवान कहते हैं कि हे कुरु नंदन! हे कुरु के वंशज ! हे अर्जुन ! वहां पर उसको पहले मनुष्य जन्म की साधन संपत्ती अनायास ही प्राप्त हो जाती है, फिर उससे वह साधन की सिद्धि के विषय में विशेषता से यत्न करता है
तत्वज्ञ जीवन मुक्त महापुरुषों के कुल में जन्म लेने के बाद उसे वैराग्यवान साधक की क्या दशा या स्थित होती है , इस बात को बताने के लिए “तत्र” पद का प्रयोग किया गया है । तत्र का तात्पर्य उस स्थिति में क्या दशा होती है, ऐसा बताता है । संसार से विरक्त उस साधक को स्वर्ग आदि लोगों में नहीं जाना पड़ता । उसका तो सीधे योगियों के कुल में जन्म होता है । वहां उसको अनायास, बिना प्रयास के पुनर्जन्म की साधन सामग्री मिल जाती है । पूर्व जन्म में उसका जितना साधन हो चुका है, जितने अच्छे संस्कार पढ़ चुके हैं, वे सभी इस जन्म में प्राप्त हो जाते हैं अथवा जागृत हो जाते हैं
गीता श्लोक 6/44 …
योग भ्रष्ट की क्या दशा होती है?
भगवान कहते हैं कि वह श्रीमानो के घर में जन्म लेने वाला योग भ्रष्ट मनुष्य भोगों के परवश होता हुआ भी, उस पहले मनुष्य जन्म में किए हुए अभ्यास अर्थात साधन के कारण ही परमात्मा की तरफ खिंच जाता है । क्योंकि योग समता का जिज्ञासु भी, वेदों में कहे हुए सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर जाता है अर्थात उन्हें लांघ जाता है
योगियों के कुल में जन्म लेने वाले योग भ्रष्ट को जैसे साधन की सुविधा मिलती है,जैसा वायुमंडल मिलता है, जैसा संग मिलता है, जैसी शिक्षा मिलती है, वैसी साधन की सुविधा, वायुमंडल, संग, शिक्षा आदि श्रीमानो के घर में जन्म लेने वालों के घर में नहीं मिलती । परंतु स्वर्ग आदि लोकों में जाने से पहले मनुष्य जन्म में जितना योग का साधन किया है, सांसारिक भोगों का त्याग किया है, उसके अंतःकरण में जितने अच्छे संस्कार पड़े हैं, उसे मनुष्य जन्म में किए हुए अभ्यास के कारण ही भोगों में आसक्त होता हुआ भी, वह परमात्मा की तरफ जबरदस्ती खिंच जाता है
गीता श्लोक 6/45 …
परमात्मा की तरफ खींचने पर क्या दशा होती है
भगवान कहते हैं कि परंतु जो योगी प्रयत्न पूर्वक यतन या प्रयास करता है और इसके पाप नष्ट हो गए हैं, तथा जो अनेक जन्मों से सिद्ध हुआ है, वह योगी फिर परम गति को प्राप्त होता है
1_ वैराग्यवान योग भ्रष्ट तो तत्वज्ञ जीवन मुक्त जोगियो के कुल में जन्म लेने और वहां विशेषता से यत्न करने के कारण सुगमता से परमात्मा को प्राप्त हो जाता है
2_ परंतु श्रीमाणों के घर में जन्म लेने वाला योग भ्रष्ट परमात्मा को कैसे प्राप्त कर सकता है ? योग का जिज्ञासु भी जब वेदों में कहे हुए सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर जाता है, तब जो योग में लगा हुआ है और तत्परता से यत्न करता है, वह वेदों से ऊंचा उठ जाए और परम गति को प्राप्त हो जाए, इसमें कोई संदेह नहीं । जो प्रयास पूर्वक यत्न कर रहा है, इसका तात्पर्य है कि उसके भीतर परमात्मा की तरफ चलने की जो उत्कंठा है, लगन है, चाह है, उत्साह है, तत्परता है, वह दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है और साधन में उसकी निरंतर सजगता रहती है, अंत में वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है
गीता श्लोक 6/46….
अर्जुन, तू योगी हो जा…..
भगवान बोले हे अर्जुन! सकाम भाव वाले तपस्वियों से भी योगी श्रेष्ठ है,ज्ञानियों से भी योगी श्रेष्ठ है, और कर्मियों से भी योगी श्रेष्ठ है । भगवान कहते हैं कि ऐसा मेरा मत है, अतः अर्जुन, तू योगी हो जा
भगवान कहते हैं कि रिद्धि सिद्धि आदि को पाने के लिए जो भूख प्यास सर्दी गर्मी यदि का कष्ट कहते हैं वह तपस्वी हैं लेकिन इन सा काम तपस्वियों से परमार्थिक रुचि वाला योगी श्रेष्ठ है । शास्त्रों को जानने वाले पढ़े-लिखे विद्वान ज्ञानी की श्रेणी में आते हैं । जो शास्त्रों का विवेचन करते हैं, ज्ञान योग कर्म योग,भक्ति योग, लय योग आदि बहुत सी बातें जानते हैं और कहते भी हैं । परंतु जिनका उद्देश्य सांसारिक भोग और ऐश्वर्या से है ऐसे सकाम शब्द ज्ञानियों में योगी श्रेष्ठ है । इस लोक में राज्य मिल जाए, धन सुख संपदा मिल जाए, ऐसा उद्देश्य रखकर जो कर्मी कार्य करते हैं, उन कर्मियों से योगी श्रेष्ठ है । भगवान कहते हैं कि अर्जुन तू भी योगी होजा या फिर अर्जुन तू योग युक्त हो जा
गीता श्लोक 6/45 …
परमात्मा की तरफ खींचने पर क्या दशा होती है
भगवान कहते हैं कि परंतु जो योगी प्रयत्न पूर्वक यतन या प्रयास करता है और इसके पाप नष्ट हो गए हैं, तथा जो अनेक जन्मों से सिद्ध हुआ है, वह योगी फिर परम गति को प्राप्त होता है
1_ वैराग्यवान योग भ्रष्ट तो तत्वज्ञ जीवन मुक्त जोगियो के कुल में जन्म लेने और वहां विशेषता से यत्न करने के कारण सुगमता से परमात्मा को प्राप्त हो जाता है
2_ परंतु श्रीमाणों के घर में जन्म लेने वाला योग भ्रष्ट परमात्मा को कैसे प्राप्त कर सकता है ? योग का जिज्ञासु भी जब वेदों में कहे हुए सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर जाता है, तब जो योग में लगा हुआ है और तत्परता से यत्न करता है, वह वेदों से ऊंचा उठ जाए और परम गति को प्राप्त हो जाए, इसमें कोई संदेह नहीं । जो प्रयास पूर्वक यत्न कर रहा है, इसका तात्पर्य है कि उसके भीतर परमात्मा की तरफ चलने की जो उत्कंठा है, लगन है, चाह है, उत्साह है, तत्परता है, वह दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है और साधन में उसकी निरंतर सजगता रहती है, अंत में वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है
गीता श्लोक 6/47 …
अर्जुन तू कौन सा जोगी बन जा ? भगवान कहते हैं कि है अर्जुन संपूर्ण योगों में जो श्रद्धावान भक्त मुझ में तल्लीन हुए मन से मेरा भजन करता है, वह मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी है
जिन में जड़ता से संबंध विच्छेद करने की मुख्यता है, जो कर्म योग, सांख्य योग, मंत्र योग, लय योग आदि साधनों के द्वारा अपने स्वरूप की प्राप्त अनुभव में लगे हुए हैं वे योगी सकाम तपस्वियों ज्ञानियों और कर्मियों में श्रेष्ठ हैं ग्रंथ पूर्ण संपूर्ण योगों में भी केवल मेरे साथ संबंध जोड़ने वाला भक्ति योगी श्रेष्ठ है
अध्याय 7.
ज्ञान विज्ञान योग…
गीता श्लोक 7/
अर्जुन तू मेरे समग्र रूप को जानेगा ……
श्री भगवान बोले है प्रथानंदन मुझ में आसक्त मन वाला मेरे आश्रित होकर योग का अभ्यास करता हुआ, तू मेरे जिस समग्र रूप को निसंदेह जिस प्रकार से जानेगा उसको उसी प्रकार से सुन
हे अर्जुन मेरे में ही जिसका मन आसक्त हो गया है अथवा अधिक स्नेह के कारण जिसका मन स्वाभाविक ही मेरे में लग गया है, उसको मेरी याद करनी नहीं पड़ती, वरण स्वाभाविक रूप से मेरी याद आती है और विस्मृति कभी होती ही नहीं । ऐसा ही तू वही मेरे में मन वाला हो जा । जिसका मन उत्पत्ति, बिना सील वस्तुओं और शब्द, स्पर्श, रस, गंध से हट गया है, जिसका खिंचाव पूरी तरह मेरी ओर है, ऐसे पुरुष को मेरे में मन वाला कहा जाता है
गीता श्लोक 7 /2 …
अब मैं विज्ञान सहित ज्ञान कहूंगा
भगवान कहते हैं कि अर्जुन तेरे लिए मैं यह विज्ञान सहित ज्ञान संपूर्णता से कहूंगा । जिसको जानने के बाद फिर इस विषय में जानने योग्य अन्य कुछ भी शेष नहीं बचेगा अर्थात शेष नहीं रहेगा
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन अब मैं विज्ञान अर्थात तर्क सहित ज्ञान कहूंगा । यह ज्ञान तुम्हें कहूंगा और स्वयं ही कहूंगा तथा इसे संपूर्णता से भी कहूंगा । वह कहते हैं कि मेरे में न तो अनजानापन है, ना कभी था और होगा भी नहीं । ऐसा होना भी संभव नहीं है, इसलिए मैं तेरे लिए उसे तत्व का वर्णन करूंगा, जिनको जान ने के बाद जानना कुछ भी शेष नहीं रहेगा । सगुण भगवान का जो प्रभाव है, ऐश्वर्या है, उसका अंत नहीं आता । जब अंत ही नहीं आता तो उसका जानना मनुष्य की बुद्धि के बाहर की बात है । परंतु वास्तविक तत्व है, उसको मनुष्य सुगमता से समझ सकता है
परमात्मा की परमात्मा की संपूर्ण विभूतियां और सामर्थ्य को कोई जान नहीं सकता परंतु उन सब में तत्व से एक ही परमात्मा है इनको तो मनुष्य तत्व से जान सकता है । परमात्मा को तत्व से जानने पर उसकी समझ, तत्व से परिपूर्ण हो जाती है
गीता श्लोक 7/ 3 ..
सब साधक मनुष्य तत्व को क्यों नहीं जान पाते
भगवान कहते हैं कि हजारों मनुष्यों में कोई एक सिद्ध कल्याण के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले सिद्धों अर्थात मुक्त पुरुषों में कोई एक ही मुझे यथार्थ रूप से जानता है
हे अर्जुन ! हजारों मनुष्यों में कोई एक ही मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है । मनुष्यों में जो नीति और धर्म पर चलने वाले हैं, ऐसे मनुष्य हजारों हैं । उन हजारों मनुष्यों में भी कोई एक ही सिद्धि के लिए यत्न करने वाला है । ऐसे बहुत कम मनुष्य होते हैं, इसलिए सब मनुष्य उस तत्व को ही नहीं जान पाते । मनुष्य परमात्मा प्राप्ति की तरफ न लगने के कारण हैं_भोग और संग्रह में लगाना । सांसारिक भोग पदार्थ में केवल आरंभ में ही सुख दिखाई देता है । मनुष्य तो प्रायः तत्काल सुख देने वाले साधन में ही मन लगाते हैं । परमात्म तत्व की प्राप्ति करना कठिन या दुर्लभ नहीं है, वरन सच्ची लगन से तत्परता पूर्वक लगने वाले बहुत कम हैं
गीता श्लोक 7/4 और 7/5..
ज्ञान विज्ञान……….
भगवान कहते हैं कि पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, यह पंच महाभूत है और मन बुद्धि तथा अहंकार इस प्रकार यह आठ प्रकार के भेद वाली मेरी अपरा प्रकृति है और हे महाबाहु ! इस अपरा प्रकृति से भिन्न जीव रूप बनी हुई मेरी परा प्रकृति को जान, जिसके द्वारा यह जगत धारण किया जाता है
भगवान कहते हैं कि जो परिवर्तनशील है, वह कई एक रूप में है अर्थात एक समान नहीं रहता । भगवान ने इसी को क्षर अर्थात क्षरनशील और धीरे-धीरे परिवर्तित होने वाला कहा है । परमात्मा सब के कारण हैं । वह प्रकृति को लेकर प्रकृति की रचना करते हैं । उसका नाम अपरा प्रकृति है और भगवान का अंश अर्थात जीव है, उसको भगवान परा प्रकृति कहते हैं
अपरा प्रकृति निकृष्ट जड़ और परिवर्तनशील है तथा परा प्रकृति श्रेष्ठ चेतन और परिवर्तन रहित है । प्रत्येक मनुष्य भिन्न-भिन्न स्वभाव का होता है । जिस प्रकार स्वभाव को मनुष्य से अलग नहीं सिद्ध कर सकते, ऐसे ही परमात्मा से अलग सिद्ध नहीं कर सकते । यह प्रकृति प्रभु का ही एक स्वभाव है, इसलिए इसका नाम प्रकृति है । इसी प्रकार परमात्मा का अंश होने से जीव को परमात्मा से भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते, क्योंकि यह परमात्मा का स्वरूप है । परमात्मा का स्वरूप होने पर भी केवल अपरा प्रकृति के साथ संबंध जोड़ने के कारण इस जीवात्मा को प्रकृति कहा गया है ।
गीता श्लोक 7/6…
परा और अपरा प्रकृति…
भगवान कहते हैं की संपूर्ण प्राणियों के उत्पन्न होने में अपरा और परा इन दोनों प्रकृतियों का सहयोग ही कारण है, ऐसा तुम समझो । मैं संपूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूं
भगवान कहते हैं कि जितने भी जीव जंतु हैं,वह मेरे अपरा या परा प्रकृति के संबंध से ही उत्पन्न होते हैं । स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक, पाताल लोक आदि संपूर्ण लोगों के जितने भी स्थावर जंगम प्राणी है वह सब के सब अपरा और परा प्रकृति के सहयोग से ही उत्पन्न होते हैं । परा प्रकृति ने अपरा प्रकृति को अपना मान लिया है । इसी से सब प्राणी परा होते हैं । इसको तुम ठीक तरह से मान लो । वस्तुओं को सत्तासफूर्ति भगवान से मिलती है इसलिए भगवान कहते हैं कि मैं संपूर्ण जगत का उत्पन्न करने वाला अर्थात प्रभव हूं
प्रभव _ इस जगत का संपूर्ण निमित्त कारण भीमैं ही हूं । क्योंकि संपूर्ण सृष्टि मेरे संकल्प से ही पैदा हुई है
प्रलय_ प्रलय इस उपादान कारण से उत्पन्न होता है जगत का उपादान कारण भी मैं ही हूं क्योंकि कार्य मात्र उपादान कारण से उत्पन्न होता है उपादान कारण रूप से रहता है और अंत में उपादान कारण में लीन हो जाता है
गीता श्लोक 7/7 …
यह सारा जगत मेरे में ही पिरोया हुआ है ………
भगवान कहते हैं कि हे धनंजय! मेरे सिवाय इस जगत का दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी कारण तथा कार्य नहीं है जैसे सूत की मनियां सुत के धागे में पिरोई हुई होती है, ऐसे ही यह संपूर्ण जगत मेरे में ही उत्प्रोत है अर्थात व्याप्त है
हे धनंजय ! मेरे सिवाय कोई दूसरा कारण नहीं है । मैं ही सब संसार का महा कारण हूं जैसे वायु आकाश में उत्पन्न होती है, आकाश में ही रहती है और आकाश में ही ली हो जाती है अर्थात् आकाश के अतिरिक्त वायु की कोई अलग स्वतंत्र सत्ता नहीं है, ऐसे ही संसार भगवान से उत्पन्न होता है,भगवान में स्थित रहता है और भगवान में ही ली हो जाता है अर्थात भगवान के सिवाय संसार की कोई पृथक स्वतंत्र सट्टा नहीं है
गीता श्लोक 7/8…
हे अर्जुन जल में मैं रस हूं…
भगवान कहते हैं कि हे कुंती नंदन! जलों में मैं रस हूं, चंद्रमा और सूर्य में प्रभाव अर्थात चमक हो अथवा प्रकाश हूं । संपूर्ण वेदों में प्रणव अर्थात ओमकार, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषार्थ हूं
भगवान कहते हैं कि मैं संपूर्ण संसार का कारण हूं । मेरे से ही संपूर्ण संसार की उत्पत्ति होती है । ऐसा समझ कर बुद्धिमान मनुष्य मेरा भजन करते हैं । परमात्मा से संपूर्ण जगत की प्रवृत्ति होती है और जिससे सारा संसार व्याप्त है, उसी परमात्मा का अपने कर्मों के द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है । उसका कारण मैं हूं ।जलों अर्थात तरल पदार्थ,फलों के रस,गन्ना आदि रस हूं । अगर इनमें से रस निकाल दिया जाए, तो इन पदार्थों का कोई तात्पर्य नहीं रहेगा । अतः रस ही जल रूप में है, वह रस में ही हूं । ऐसा भगवान कहते हैं । सूर्य और चंद्रमा में जो चमक अर्थात प्रकाश है, वह भी मैं ही हूं । अगर चंद्रमा और सूर्य से प्रकाश निकाल दिया जाता है, तो इन दोनों का कोई महत्व नहीं रहेगा । संपूर्ण वेदों में प्रणव अर्थात ओमकार शब्द में ही हूं । प्रणव अर्थात ओमकार के बिना वेदों की महत्ता भी नहीं रहेगी
गीता श्लोक 7/8…
हे अर्जुन जल में मैं रस हूं…
भगवान कहते हैं कि हे कुंती नंदन! जलों में मैं रस हूं, चंद्रमा और सूर्य में प्रभाव अर्थात चमक हो अथवा प्रकाश हूं । संपूर्ण वेदों में प्रणव अर्थात ओमकार, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषार्थ हूं
भगवान कहते हैं कि मैं संपूर्ण संसार का कारण हूं । मेरे से ही संपूर्ण संसार की उत्पत्ति होती है । ऐसा समझ कर बुद्धिमान मनुष्य मेरा भजन करते हैं । परमात्मा से संपूर्ण जगत की प्रवृत्ति होती है और जिससे सारा संसार व्याप्त है, उसी परमात्मा का अपने कर्मों के द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है । उसका कारण मैं हूं ।जलों अर्थात तरल पदार्थ,फलों के रस,गन्ना आदि रस हूं । अगर इनमें से रस निकाल दिया जाए, तो इन पदार्थों का कोई तात्पर्य नहीं रहेगा । अतः रस ही जल रूप में है, वह रस में ही हूं । ऐसा भगवान कहते हैं । सूर्य और चंद्रमा में जो चमक अर्थात प्रकाश है, वह भी मैं ही हूं । अगर चंद्रमा और सूर्य से प्रकाश निकाल दिया जाता है, तो इन दोनों का कोई महत्व नहीं रहेगा । संपूर्ण वेदों में प्रणव अर्थात ओमकार शब्द में ही हूं । प्रणव अर्थात ओमकार के बिना वेदों की महत्ता भी नहीं रहेगी
गीता श्लोक 7/9 …
अग्नि में तेज में हूं ..
भगवान कहते हैं कि पृथ्वी में पवित्र गंध मैं हूं, अग्नि में तेज मैं हूं और संपूर्ण प्राणियों में जीवन शक्ति मैं हूं और तपसियों में तपस्या में हूं
भगवान कहते हैं कि पृथ्वी में गंध मैं ही हूं ।गंध के बिना पृथ्वी कुछ भी नहीं । जो अग्नि तत्व है, वह भी मैं ही हूं । तेज के बिना कुछ भी नहीं है ।सभी प्राणियों में एक जीवन शक्ति है, प्राण शक्ति है, जिससे सब जी रहे हैं, उसी प्राण शक्ति से वह प्राणी कहलाते हैं । उसी प्राण तत्व के बिना वह कुछ भी नहीं । वह प्राण शक्ति मैं ही हूं ।सहिष्णुता को तप कहते हैं, परंतु वास्तव में परमात्मा तत्व की प्राप्ति के लिए कितने ही कष्ट आए, उनमें निर्विकार रहना ही तप है । यही तपस्वियों का तप है और उसी कारण से वे तपस्वी कहलाते हैं । इसी तप को भगवान अपना स्वरूप मानते हैं
गीता श्लोक 7/11..
धर्म युक्त काम “मैं” हूं….
भगवान कहते हैं कि हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! बलवानों में काम और राग से रहित बल में हूं और प्राणियों में धर्म से अविरुद्ध अर्थात धर्म युक्त काम में हूं
भगवान कहते हैं कि कठिन से कठिन काम करते हुए भी अपने भीतर एक कामना या आवश्यकता रहित शुद्ध निर्मल उत्साह रहता है काम पूरा होने पर भी मेरा कार्य शास्त्र और धर्म के अनुकूल है तथा लोक मर्यादा के अनुसार संत जनों से अनुमोदित है ऐसे विचार से मन में एक उत्साह रहता है इसका नाम बोल है यह बोल भगवान का ही स्वरुप है अतः यह बोल ग्रहण करने योग्य है हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन मनुष्यों में धर्म से अविरुद्ध अर्थात धर्म युक्त काम मेरा ही स्वरुप है ।कारण है कि शास्त्र और लोक मर्यादा के अनुसार शुभ भाव से केवल संतान उत्पत्ति के लिए जो काम होता है, वह काम मनुष्य के अधीन होता है । परंतु आसक्त कामना सुख भोग आदि के लिए जो काम होता है, उस काम में मनुष्य पराधीन हो जाता है और उसके बस में होकर वह, तो करने योग्य शास्त्र विरुद्ध काम पतन और संपूर्ण दुखो का कारण हो जाता है
गीता श्लोक 7 12 राजस और तमस भाव मुझसे है …..
भगवान कहते हैं कि जितने भी सात्विक भाव हैं और जितने भी राजस तथा तमस भाव हैं, वह सब मुझसे ही होते हैं,ऐसा उनका समझो । परंतु मैं उनमें और वह मुझ में नहीं
भगवान कहते हैं कि यह जो सात्विक, राजस और तमस भाव हैं,वह भी मेरे से ही उत्पन्न होते हैं। सृष्टि में जो कुछ हो रहा है, मूल में सबका आश्रय आधार और प्रकाशक भगवान ही हैं । सात्विक राजस भाव जो है, मैं उनमें नहीं हूं और वह मेरे में नहीं है । उन गुणों की मेरे सिवाय कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है अर्थात मैं ही _ मैं हूं । मेरे सिवाय और कुछ है ही नहीं । वह सात्विक, राजस, तमस जितने भी प्राकृतिक पदार्थ हैं और क्रियाएं हैं, वह सबके सब उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं । परंतु मैं ईश्वर उत्पन्न भी नहीं होता और नष्ट भी नहीं होता
गीता श्लोक 7/13…
अविनाशी मुझे ही जानो …
भगवान कहते हैं कि इन तीनों गुण रूप भावों से मोहित यह संपूर्ण जगत प्राणी इन गुणों से अतीत अविनाशी मुझे नहीं जानता
सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तीनों गुणों की वृत्तियां उत्पन्न और लीन होती रहती है ।उनके साथ तालमेल करके मनुष्य अपने को सात्विक, राजस्व और तामस मान लेता है । इस प्रकार तीनों गुणों से मोहित मनुष्य ऐसा मान ही नहीं सकता कि मैं परमात्मा का अंश हूं । वह अपने अंशी परमात्मा की तरफ न देख कर उत्पन्न और नष्ट होने वाली वृत्तियों के साथ अपना संबंध मान लेता है । यही उसका मोहित होना है । इस प्रकार मोहित होने के कारण परमात्मा के साथ नित्य संबंध है । इस बात को वह नहीं समझ पाता
गुणों की भगवान के सिवाय अलग सत्ता मानने से ही प्राणी मोहित होता है । अगर वह गुणों को भगवत स्वरूप माने तो कभी मोहित हो ही नहीं सकते । यदि यह सोचा जाए कि जीव पहले परमात्मा से सम्मुख हुआ या पहले संसार के सम्मुख हुआ । इसमें दार्शनिक लोग कहते हैं कि परमात्मा से विमुख होना और संसार से संबंध जोड़ना दोनों अनादि हैं, इनका आदि यानी आरंभ है ही नहीं
गीता श्लोक 7/14 ….
माया से तरना है, तो मेरे पास आओ
भगवान कहते हैं कि यह मेरे गुण मय देवीय माया दुरत्य है अर्थात इसे पार पाना कठिन है । जो केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वह इस माया को उतर जाते हैं अर्थात इस माया की स्थिति को पार कर जाते हैं
सत्य,रज और तम तीन प्रकार की देवीय माया है अर्थात देव अर्थात् परमात्मा की माया बड़ी दुरत्य है । भोग और संग्रह की इच्छा रखने वाले मनुष्य इस माया से संबंध तोड़ देते हैं । यह गुण मई माया तभी दुरत्य होती है, जब भगवान के सिवाय गुण की अलग सत्ता और महत्ता मानी जाए । अगर मनुष्य भगवान के सिवाय गुण की अलग सत्ता और महत्व नहीं मानेगा, तो वह इस गुनुमई माया से तर जाएगा अर्थात गुण वही माया उसको प्रभावित नहीं करेगी । मनुष्यों में केवल जो मेरी ही शरण लेते हैं, वह इस माया को तर जाते हैं अर्थात माया को पार कर जाते हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि केवल मेरी ही तरफ रहती है, तीनों गुना की तरफ नहीं । भगवान कहते हैं कि यह तीनों गुण सत्य,राज और तम तीनों ही मेरे नहीं है और मैं भी इन तीनों का नहीं हूं । मैं तो इन तीनों में निर्मित रहकर सभी कार्य करता हूं
गीता श्लोक 7:15
मेरी शरण आने वाले सभी माया से तर जाते हैं
भगवान कहते हैं की माया के द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया है, वह असुर भाव का आश्रय लेने वाले और मनुष्यों में महान नीच तथा पाप कर्म करने वाले मूढ़ मनुष्य मेरी शरण नहीं होते
जो दुष्कृत और नीच पुरुष होते हैं,वह भगवान की शरण नहीं होते । जो नाशवान परिवर्तनशील तथा प्राप्त पदार्थ में ममता और प्राप्त पदार्थ की कामना रखते हैं, कामना पूरी होने पर लोक और कामना की पूर्ति में बाधा लगने पर क्रोध पैदा होता है । इस तरह जो कामना में फंसकर व्यभिचार आदि शास्त्र निषिद्ध विषयों का सेवन करते हैं और क्रोध के वसी भूत होकर द्वेष और दुर्भावना पूर्वक हिंसा पूर्वक पाप करते हैं, वह दुष्कृति हैं
गीता श्लोक 7/16…
मनुष्य मेरी शरण होते हैं..
भगवान कहते हैं कि है भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! पवित्र कर्म करने वाले अर्थात जिनकी धन की चाह होती है अर्थार्थी,जिज्ञासु, ज्ञानी, भागवत प्रेमी यह चार प्रकार के मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात मेरी शरण होते हैं
सुकृति अर्थात पवित्र आत्मा वाले मनुष्य चार प्रकार के होते हैं। यह चारों प्रकार के मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात मेरी शरण होते हैं । भगवान में लगने वाले पुरुषों को सुकृति और भगवान में न लगने वाले पुरुषों को दुष्कृति कहते हैं । भगवान के भक्त चार प्रकार के होते हैं.
एक _अर्थांथी भक्त
दो _ आर्त
तीसरा _जिज्ञासु भक्त और चौथा_ ज्ञानी अथवा प्रेमी भक्त
गीता श्लोक 7/17…
ज्ञानी भक्त की विशेषता…
भगवान कहते हैं कि उन चार भक्तों में, मुझ में निरंतर लगा हुआ, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी अर्थात प्रेमी भक्ति श्रेष्ठ है । ज्ञानी भक्तों को मैं अत्यंत प्रिय हूं और वह मुझे अत्यंत प्रिय है
भगवान कहते हैं कि उन अर्थ अर्थात धन को चाहने वाले अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी भक्तों में ज्ञानी भक्त श्रेष्ठ होता है । क्योंकि यह नित्य युक्त है अर्थात वह नित्य प्रति केवल भगवान में ही लगा हुआ है । भगवान के सिवाय दूसरे किसी में वह किंचिन्मात्र भी नहीं लगता । जैसे गोपियां भगवान में लीन रहती हैं, वैसे ही वह ज्ञानी भक्त लौकिक और परमार्थिक सब क्रियाएं करते समय, सदा सर्वदा भगवान से ही जुड़ा रहता है
उस ज्ञानी भक्त का आकर्षण केवल भगवान में होता है । उसकी अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं होती, इसलिए वह श्रेष्ठ है । धन को महत्व देने वाले भक्तों में पूर्व संस्कारों के कारण जब तक व्यक्तिगत इच्छाएं उत्पन्न होती रहती है, तब तक उनकी एक भक्ति नहीं होती
गीता श्लोक 7/18 ..
ज्ञानी और प्रेमी मेरा स्वरूप हैं.
भगवान कहते हैं कि पहले कहे हुए सब के सब भक्त अर्थात चारों प्रकार के भक्त बड़े उदार श्रेष्ठ भाव वाले हैं । परंतु ज्ञानी, प्रेमी तो मेरा स्वरूप ही है । ऐसा मेरा मत है । कारण है कि वह मुझसे अभिन्न और जिस श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है । ऐसे मुझ में ही दृढ़ता से स्थित है
भगवान ने कहा है कि भक्त जिस प्रकार मेरे शरण होते हैं उसी प्रकार में उनका भजन करता हूं अर्थात मैं उनको याद करता हूं । भक्त भगवान को चाहते हैं । जो पहले संबंध जोड़ता है वह उदार भक्त होता है। भक्त भगवान की ओर नहीं देखता । वह तो अपनी तरफ से ही संबंध जोड़ लेता है। इसलिए वह उदार है । देवताओं के भक्त सकाम भाव से विधिपूर्वक यज्ञ, दान, तप,यज्ञ कर्म करते हैं । देवताओं को उनकी कामनाओं के अनुसार वह वस्तु देनी ही पड़ती है । क्योंकि देवता लोग उनका अहित नहीं देखते । परंतु भगवान का हित चाहने वाले को वरदान अर्थात वस्तु ही देते हैं अगर भक्ति का हित ना हो तो वह वस्तु नहीं देते क्योंकि भगवान तो केवल हितकारी हैं
गीता श्लोक 7/19…
मेरी शरण में आया पुरुष महात्मा है …..
भगवान कहते हैं की बहुत जन्मों के अंतिम जन्म में सब कुछ परमात्मा ही है _ इस प्रकार जो ज्ञानवान मेरी शरण होता है, वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है
भगवान कहते हैं कि मनुष्य जन्म सभी जन्मों का अंतिम जन्म है । भगवान ने जीव को मनुष्य शरीर देकर उसे जन्म मरण के प्रवाह से अलग होकर अपनी प्राप्ति का पूरा अधिकार दिया है । परंतु यह मनुष्य भगवान को प्राप्त न करके राग अर्थात लगाव, आकर्षण, खिंचाव के कारण फिर पुराने प्रवाह में अर्थात जन्म मरण के चक्कर में चला जाता है । संत जन और भगवान कहते हैं या शास्त्रों में आता है कि मनुष्य जन्म लेकर कल्याण करने के लिए बोला है विषयों का सुख भोगने के लिए और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए नहीं । यह मनुष्य जन्म संपूर्ण जन्मों का आदि जन्म भी है सभी जनों का आरंभ मनुष्य जन्म से ही होता है । मनुष्य जन्म में संपूर्ण वासनाओं का नाश करके अपना कल्याण कर सकते हैं अर्थात भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए यह संपूर्ण जन्मों का अंतिम जन्म है
गीता श्लोक 7/19…
मेरी शरण में आया पुरुष महात्मा है …..
भगवान कहते हैं की बहुत जन्मों के अंतिम जन्म में सब कुछ परमात्मा ही है _ इस प्रकार जो ज्ञानवान मेरी शरण होता है, वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है
भगवान कहते हैं कि मनुष्य जन्म सभी जन्मों का अंतिम जन्म है । भगवान ने जीव को मनुष्य शरीर देकर उसे जन्म मरण के प्रवाह से अलग होकर अपनी प्राप्ति का पूरा अधिकार दिया है । परंतु यह मनुष्य भगवान को प्राप्त न करके राग अर्थात लगाव, आकर्षण, खिंचाव के कारण फिर पुराने प्रवाह में अर्थात जन्म मरण के चक्कर में चला जाता है । संत जन और भगवान कहते हैं या शास्त्रों में आता है कि मनुष्य जन्म लेकर कल्याण करने के लिए बोला है विषयों का सुख भोगने के लिए और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए नहीं । यह मनुष्य जन्म संपूर्ण जन्मों का आदि जन्म भी है सभी जनों का आरंभ मनुष्य जन्म से ही होता है । मनुष्य जन्म में संपूर्ण वासनाओं का नाश करके अपना कल्याण कर सकते हैं अर्थात भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए यह संपूर्ण जन्मों का अंतिम जन्म है
गीता श्लोक 7/20..
कुछ पुरुष देवताओं की शरण हो जाते हैं..
भगवान कहते हैं कि उन्होंने कामनाओं से जिनके ज्ञान हर लिया गया है ऐसे मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृति अर्थात स्वभाव से नियंत्रित होकर उसे उसे अर्थात देवताओं के उन्होंने नियमों को धारण करते हुए अन्य देवताओं के शरण हो जाते हैं
इस लोक के और परलोक के भोगों की कामनाओं से जिनके ज्ञान ढक गया है अक्षादित हो गया है अर्थात् परमात्मा की प्राप्ति के लिए जो विवेक युक्त मनुष्य शरीर मिला है उसे शरीर में आकर परमात्मा की प्राप्ति ना करके वह अपनी कामनाओं की पूर्ति करने में लगे रहते हैं संयुक्त सुख की इच्छा को कामना कहते हैं कामना दो तरह की होती है_
एक_ पहले कामना चाहे जैसे भोगों में चाहे जब चाहे जहां और चाहे जितना धन खर्च करें अर्थात संयुक्त जनन सुख के लिए धन संग्रह की कामना होती है
दो__ दूसरी कामना में धनी हो जाऊं धन से मैं बड़ा बन जाऊं अर्थात अभियान सुख के लिए धन संग्रह की कामना होती है
कामना पूर्ति के लिए अनेक उपाय और नियमों को धारण करके मनुष्य अन्य देवताओं की शरण लेते हैं भगवान की शरण नहीं लेते
गीता श्लोक 7/21.
मैं देवताओं को दृढ़ करता हूं.
भगवान कहते हैं कि जो _जो जिस _जिस देवता का श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है उस_ उस देवता में ही में उसकी श्रद्धा को दृढ़ कर देता हूं
जो मनुष्य जिस_ जिस देवता का भक्ति होकर श्रद्धापूर्वक यजन पूजन करना चाहता है उस उस मनुष्य की श्रद्धा उस उस देवता के प्रति मैं अचल अर्थात दृढ़ कर देता हूं । वह दूसरों में लगकर मेरे में ही लग जाए ऐसा में नहीं करता, यद्यपि उन्होंने देवताओं में लगाने से कामना के कारण उनका कल्याण नहीं होता फिर भी मैं उनको उनमें लगा देता हूं तो, जो मेरे में श्रद्धा प्रेम रखते हैं, अपना कल्याण करना चाहते हैं, उनकी श्रद्धा को मैं अपने प्रति दृढ़ कैसे नहीं करूंगा ? क्योंकि मैं प्रत्येक प्राणी का शुभ हृदय हूं
जो जो मनुष्य जिस जिस देवता का भक्ति होकर श्रद्धापूर्वक यजन पूजन करना चाहता है, उस उस मनुष्य की श्रद्धा उस उस देवता के प्रति मैं अचल अर्थात दृढ़ कर देता हूं । वह दूसरों में न लगकर, मेरे में ही लग जाएं, ऐसा मैं नहीं करता । यद्यपि उन्होंने देवताओं में लगने से कामना के कारण उनका कल्याण नहीं होता । फिर भी मैं उनको उनमें लगा देता हूं, तो जो मेरे में श्रद्धा प्रेम रखते हैं अपना कल्याण चाहते हैं उनकी श्रद्धा को मैं अपने प्रति दृढ़ कैसे नहीं करूंगा,क्योंकि मैं प्रत्येक प्राणी का हृदय हूं
भगवान कहते हैं कि सब मनुष्यों की श्रद्धा मैं अपने में ही दृढ़ क्यों नहीं करता इस पर भगवान कहते हैं कि अगर मैं, सब की श्रद्धा को, अपने प्रति दृढ़ करूं तो, मनुष्य जन्म की स्वतंत्रता और सार्थकता कहां है अतः मैं उनको, उनके देवताओं की पूजा करने से नहीं रोकता, उन्हें पूरी आजादी देता हूं
गीता श्लोक 7/22…
मनुष्य की कामना पूर्ति मेरे द्वारा होती है_
भगवान कहते हैं कि उसे मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धा से युक्त होकर, वह मनुष्य उसे देवता की सकाम भाव पूर्वक उपासना करता है और उसकी यह कामना पूरी भी होती है । परंतु वह कामना पूर्ति मेरे द्वारा ही विहित की हुई होती है
भगवान कहते हैं कि मेरे द्वारा दृढ़ की हुई श्रद्धा से संपन्न हुआ वह मनुष्य उस देवता की आराधना की चेष्टा करता है और उस देवता से जिस कामना पूर्ति की आशा रखता है, उस कामना की पूर्ति होती है । यद्यपि वास्तव में उस कामना की पूर्ति मेरे द्वारा ही की हुई होती है । परंतु वह उस देवता से ही पूरी की हुई मानता है । वास्तव में देवताओं में मेरी शक्ति है और मेरे ही विधान से वे उनकी कामना पूर्ति करते हैं
यहां पर भगवान यह कहना चाहते हैं कि जो कुछ संचालन हो रहा है वह सब का सब मेरा ही किया हुआ हो रहा है अतः जिस किसी को भी जो कुछ मिलता है वह सब मेरे द्वारा विधान किया हुआ ही मिलता है अगर कोई मनुष्य यह रहस्य समझ ले तो निश्चित रूप से वह मेरी और ही खींचेगा
गीता श्लोक 7/23..
उपासना के अनुसार फल मिलता है..
भगवान कहते हैं कि परंतु उन तुच्छ बुद्धि वाले मनुष्यों को उन देवताओं की आराधना का फल अंत वाला मिलता है । देवताओं का पूजन करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं
भगवान कहते हैं कि देवताओं की उपासना करने वाले अल्प बुद्धि युक्त मनुष्यों को अंत वाला अर्थात सीमित और नाश वाला फल मिलता है। वास्तव में भगवान के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य अर्थात सदा रहने वाला ही होना चाहिए, फिर उसको अनित्य, जो नित्य न रह सके या विनाशी हो, फल क्यों मिलता है
1_ अनित्य फल प्राप्त करने वालों में नाश वाले पदार्थ की कामना है
2_ वे देवताओं को भगवान से अलग मानते हैं, परंतु देवता भगवान से अलग नहीं हैं । इसलिए उनका नाश वाला फल मिलता है
परंतु उनका दो उपाय से अविनाशी सदा रहने वाला फल मिल सकता है__
1_ एक तो कामना न रख कर अर्थात निष्काम भाव से देवताओं की उपासना करें, तो उनको अविनाशिफल मिल जाएगा
2_ वे देवताओं को भगवान से अलग न समझ कर अर्थात देवताओं को भी भगवान स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें, तो यदि कामना रह भी जाएगी तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है । उनको भगवत प्राप्ति हो सकती है । भगवान का कहना है कि फल तो मेरा विधान किया हुआ ही मिलता है, परंतु कामना यानी की इच्छा और आकर्षण तथा मांग होने से वह नाशवान हो जाता है, कहना है कि फल तो मेरा विधान किया हुआ ही मिलता है, परंतु कामना यानी की इच्छा और आकर्षण तथा मांग होने से वह नाशवान हो जाता है ।





