Wednesday, April 22, 2026
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ग़ज़ल – शकूर अनवर

ग़ज़ल

शकूर अनवर

फूल शबनम झील झरने।

सब उसी के हैं करिश्मे*।।

*

सबसे गहरा रंगे-उल्फ़त।

और सारे रंग फीके।।

*

अब सियासी है ज़माना।

कोई किसका कोई किसके।।

*

कोई जीता कोई हारा।

बन गये बस हम तो मोहरे।।

*

कर लिये ईजाद* उसने।

ज़ुल्म के सौ-सौ तरीक़े ।।

*

था सदाक़त* जिनका शेवा।

बस वही सूली पे लटके।।

*

ज़िंदगी भर की कमाई।

रह गये जिस्मों पे ढाॅंचे।।

*

आपसी तकरार जो थी।

बन गये संगीन झगड़े।।

*

घर मुहब्बत मुल्क मज़हब।

ज़ीस्त* में कितने झमेले।।

*

गर हराम* “अनवर” न होती।

ख़ुदकुशी भी कर गुज़रते।।

*

शब्दार्थ:-

करिश्मे*चमत्कार

ईजाद*आविष्कृत

सदाकत*सच्चाई

ज़ीस्त*जीवन

हराम*वर्जित

शकूर अनवर

9460851271

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