ग़ज़ल
शकूर अनवर
फूल शबनम झील झरने।
सब उसी के हैं करिश्मे*।।
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सबसे गहरा रंगे-उल्फ़त।
और सारे रंग फीके।।
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अब सियासी है ज़माना।
कोई किसका कोई किसके।।
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कोई जीता कोई हारा।
बन गये बस हम तो मोहरे।।
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कर लिये ईजाद* उसने।
ज़ुल्म के सौ-सौ तरीक़े ।।
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था सदाक़त* जिनका शेवा।
बस वही सूली पे लटके।।
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ज़िंदगी भर की कमाई।
रह गये जिस्मों पे ढाॅंचे।।
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आपसी तकरार जो थी।
बन गये संगीन झगड़े।।
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घर मुहब्बत मुल्क मज़हब।
ज़ीस्त* में कितने झमेले।।
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गर हराम* “अनवर” न होती।
ख़ुदकुशी भी कर गुज़रते।।
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शब्दार्थ:-
करिश्मे*चमत्कार
ईजाद*आविष्कृत
सदाकत*सच्चाई
ज़ीस्त*जीवन
हराम*वर्जित
शकूर अनवर
9460851271





