Tuesday, April 28, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर

ग़ज़ल

शकूर अनवर

तंग-दस्ती* में गुज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं।

रोते-रोते ही बसर* हो ये ज़रूरी तो नहीं।।

*

वही सेहरा* वही सन्नाटा वही ख़ौफ़ो- हिरास*।

ज़हनो-दिल में वही डर हो ये ज़रूरी तो नहीं।।

*

खूब देखा है मेरे दिल का तड़पना लेकिन।

उस सितमगर पे असर हो ये ज़रूरी तो नहीं।।

*

हम तो बस क़ाफ़िला-ए-दिल* के मुसाफ़िर ठहरे।

फिर हमें इज़्ने-सफ़र* हो ये ज़रूरी तो नहीं।।

*

जानता हूँ कि मुहब्बत ने किया है बरबाद।

इसकी दुनिया को ख़बर हो ये ज़रूरी तो नहीं।।

*

राह में कोई शजर* हो ये ज़रूरी है मगर।

वो तेरी राहगुज़र* हो ये ज़रूरी तो नहीं।।

*

जिसमें रहते हों मुहब्बत के तलबगार” “अनवर”।

सब की क़िस्मत में वो घर हो ये ज़रूरी तो नहीं।।

*

शब्दार्थ:-

तंग-दस्ती*हाथ तंग होना परेशानी

बसर*निर्वहन

सेहरा*रेगिस्तान

ख़ौफ़ो-हिरास*डर मायूसी

क़ाफ़िला-ए-दिल*प्रेम का कारवाॉं

इज़्ने-सफ़र*यात्रा का आमंत्रण

शजर*पेड़

राह गुज़र*रास्ता

तलबगार*इच्छुक

शकूर अनवर

9460851271

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