******ग़ज़ल******
शकूर अनवर
रंगे-सियासत* उखड़ा-उखड़ा।
नज़्मे-हुकूमत* बिखरा-बिखरा।।
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मद्धम-मद्धम चाॅंद-सितारे।
रात का चेहरा उतरा-उतरा।।
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सूरज का वो क़हर* बपा है।
हर कोई है सहमा-सहमा।।
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सुलझी हुई है उसकी ज़ुल्फ़ें।
अपना मुक़द्दर उलझा-उलझा।।
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हिज्र* में ऑंखें भीगी-भीगी।
इश्क़ का दरिया सूखा-सूखा।।
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ख़त्म हुआ है चलो इलेक्शन।
नेताओं ने पल्ला झाड़ा।।
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मैखाने पर उतरे पंछी।
रास न आये काशी-काबा।।
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मेरे ही तो नक़्श* मिलेंगे।
जंगल-जंगल सेहरा-सेहरा*।।
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जीवन की इस जंग को “अनवर”।
मर जाऊॅंगा लड़ता-लड़ता।।
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शब्दार्थ:-
रंगे-सियासत*राजनीति का रंग
नज़्मे-हुकूमत*शासन व्यवस्था
क़हर*प्रकोप
हिज्र*वियोग जुदाई
नक्श*चिन्ह निशान
सेहरा*रेगिस्तान
शकूर अनवर
9460851271
********ग़ज़ल *******
शकूर अनवर
सितारों भरी कहकशाँ* कुछ नहीं है।
मुक़ाबिल* तेरे आसमाॅं कुछ नहीं है।।
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जहाँ मालो-ज़र* हो वहाँ चैन कैसा।
वहीं पर सुकूँ है जहाँ कुछ नहीं है।
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कहाँ से लिखूँ शेर हम्दो-सना* के।
न ताक़त क़लम में, ज़ुबाॅं* कुछ नहीं है।
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करूँ पार कैसे ॲंधेरों का जंगल।
कोई रास्ता कारवाॅं कुछ नहीं है।।
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अब आंखों में ऑंसू भी सूखे पड़े हैं।
इधर देख ज़ालिम यहाँ कुछ नहीं है।।
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मैं ज़ाहिर* में जो हूंँ वही मेरा बातिन*।
अयाॅं* मेरा सब कुछ निहाॅं” कुछ नहीं है।।
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न तेशा* न पर्बत न सेहरा* की ख़्वाइश।
यहाँ दिल में अब दास्ताँ कुछ नहीं है।।
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ये मन्दिर ये मस्जिद के झगड़ों को छोड़ो।
कि खाओ कमाओ मियाँ कुछ नहीं है।।
”
गले से मिले लोग धोका हैं जैसे।
ज़मीं से मिला आसमाॅं कुछ नहीं है।।
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सियासत के मारो यहाँ क्या मिलेगा।
यहाँ बस ग़ज़ल है यहां कुछ नहीं है।।
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मेरी आरज़ू इससे आगे है “अनवर”।
वतन के लिये जिस्मो-जाॅं कुछ नहीं है।।
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शब्दार्थ:-
कहकशाँ*आकाश गंगा
मुक़ाबिल*समक्ष
मालो-ज़र*धन दौलत
हम्दो-सना*ईश्वर की तारीफ में लिखा गया काव्य
जुबाॅं*भाषा
ज़ाहिर*प्रकट में
बातिन*अंतर्मन
अयाॅं*सामने
निहाँ* छुपा हुआ
तेशा*पत्थर तोड़ने का औजार
सहरा*रेगिस्तान
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शकूर अनवर
9460851271
*********ग़ज़ल ********
शकूर अनवर
फिर कामयाब देखिये शैतान हो गया।
फिर अपना देश हिन्दू-मुसलमान हो गया।।
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ये वो ज़मीन है जहाँ “मोहन” के इश्क़ में।
“मीरा” बनी कोई, कोई “रसख़ान” हो गया।।
चलिये किसी के ख़ूॅं से बुझी तो किसी की प्यास।
चलिये किसी की मौत का सामान हो गया।।
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अब तो घरों में भूख ग़रीबी मुक़ीम* है।
इफ़लास* मुस्तक़िल* यहाँ मेहमान हो गया।।
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सौ फ़ायदे हुए हों मेरे क़त्ल से तुम्हें।
लेकिन यहाँ तो जान का नुक़सान हो गया।।
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अब तो हुकूमतों की सियासत अजीब है।
कल तक जो राहज़न* था वो सुल्तान हो गया।।
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जीने का इक हुनर भी मयस्सर* नहीं हुआ।
अलबत्ता मरना अब हमें आसान हो गया।।
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रंगों में जानवर में भी अब धर्म बॅंट गये।
“अनवर” ये कैसा लोगों का ईमान हो गया।।
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शब्दार्थ:-
मुक़ीम होना*रहना बसना
इफ़लास* दरिद्रता ग़रीबी
मुस्तकि़ल*स्थाई
राहज़न*लुटेरा डाकू
मयस्सर होना*प्राप्त होना
शकूर अनवर
9460851271






