ग़ज़ल
जो तिरी बज़्म से बा-चश्मे* तर गया है कोई ।
शिकस्ता* दिल कोई थामे जिगर गया है कोई।।
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ये हादसा भी क्या मुझ पर गुज़र गया है कोई।
नज़र के मिलते ही दिल में उतर गया है कोई।।
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किसी के हुस्न की अल्लाह रे ये ताबानी*।
जहाँने इश्क़ में इक नूर* भर गया है कोई।।
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ये इश्क़ है ये किसी रोज़ रंग लाएगा।
हज़ार दिल मिरा ले के मुकर गया है कोई।।
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उलझ गया यूॅ॑ ही बेकार से ख़यालों में। ज़ुरूर आएगा वादा तो कर गया है कोई।।
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हो ख़ैर मेरे गुलिस्ताँ की ख़ैर हो या रब।
चमन की सिम्त* वो उड़के शरर* गया है कोई।।
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हमारे हाल को सुन कर ये किस की याद आई।
के दिल को थामे हुए चश्मेतर गया है कोई।।
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समझ के ख़्वाब में नागिन ही अपने सीने पर।
तुम्हारी ज़ुल्फ़ जो देखी तो डर गया है कोई।।
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ये कैसी शह्र में अफ़वाह गर्म है हर सू।
के उनके कूचे* में “परकाश” मर गया है कोई।
। शब्दार्थ:-
चश्मे तर* गीली ऑखें,
शिकस्ता*टूटा हुआ,
ताबानी*चमक,
नूर* रोशनी,
सिम्त*तरफ़,
शरर*चिंगारी,
कूचा*गली,
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वेद प्रकाश “परकाश”
44 बी. शाॅपिंग सेंटर कोटा (राज0)
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ग़ज़ल-वेद प्रकाश ‘प्रकाश’





