Tuesday, April 21, 2026
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ग़ज़ल-वेद प्रकाश ‘प्रकाश’

ग़ज़ल

जो तिरी बज़्म से बा-चश्मे* तर गया है कोई ।

शिकस्ता* दिल कोई थामे जिगर गया है कोई।।

*

ये हादसा भी क्या मुझ पर गुज़र गया है कोई।

नज़र के मिलते ही दिल में उतर गया है कोई।।

*

किसी के हुस्न की अल्लाह रे ये ताबानी*।

जहाँने इश्क़ में इक नूर* भर गया है कोई।।

*

ये इश्क़ है ये किसी रोज़ रंग लाएगा।

हज़ार दिल मिरा ले के मुकर गया है कोई।।

*

उलझ गया यूॅ॑ ही बेकार से ख़यालों में। ज़ुरूर आएगा वादा तो कर गया है कोई।।

*

हो ख़ैर मेरे गुलिस्ताँ की ख़ैर हो या रब।

चमन की सिम्त* वो उड़के शरर* गया है कोई।।

*

हमारे हाल को सुन कर ये किस की याद आई।

के दिल को थामे हुए चश्मेतर गया है कोई।।

*

समझ के ख़्वाब में नागिन ही अपने सीने पर।

तुम्हारी ज़ुल्फ़ जो देखी तो डर गया है कोई।।

*

ये कैसी शह्र में अफ़वाह गर्म है हर सू।

के उनके कूचे* में “परकाश” मर गया है कोई।

। शब्दार्थ:-

चश्मे तर* गीली ऑखें,

शिकस्ता*टूटा हुआ,

ताबानी*चमक,

नूर* रोशनी,

सिम्त*तरफ़,

शरर*चिंगारी,

कूचा*गली,

*

वेद प्रकाश “परकाश”

44 बी. शाॅपिंग सेंटर कोटा (राज0)

मो.9352602229-6378759991

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