Wednesday, April 22, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर✍

ग़ज़ल

शकूर अनवर

लोग अक्सर डूब जाते हैं नदी में।

इससे बेहतर डूबना है शायरी में।।

*

खो भी जाओ चन्द लम्हों की ख़ुशी में।

वर्ना ग़म ही ग़म मिलेंगे ज़िंदगी में।।

*

अब जबीनों* पर निशाॅं बनते नहीं हैं।

अब मज़ा आता नहीं है बंदगी* में।।

*

वो भी मुझ में अक्स* अपना देखते हैं।

मैं भी ख़ुद को ढूॅंढता हूँ हर किसी में।।

*

आओ इस मंज़र*को ऑंखों में बसालें।

आओ थोड़ी देर बैठें चाॅंदनी में।।

*

उसके हक़* में रात भर माॅंगी दुआऍं।

ये मेरा पहला क़दम था दुश्मनी में।।

*

कुछ तो अंदाज़े-सुख़न* बदले हमारा।

कुछ तो तब्दीली* हो “अनवर शायरी”में।।

*

शब्दार्थ:-

जबीनोंं*माथों ललाटों

बंदगी*इबादत प्रार्थना

अक्स*परछाई

मंज़र*दृश्य

हक़ में*पक्ष में

अंदाज़े-सुख़न*काव्य शैली

तब्दीली*बदलाव

📞9460851271

✍शकूर अनवर

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