ग़ज़ल
शकूर अनवर
लोग अक्सर डूब जाते हैं नदी में।
इससे बेहतर डूबना है शायरी में।।
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खो भी जाओ चन्द लम्हों की ख़ुशी में।
वर्ना ग़म ही ग़म मिलेंगे ज़िंदगी में।।
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अब जबीनों* पर निशाॅं बनते नहीं हैं।
अब मज़ा आता नहीं है बंदगी* में।।
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वो भी मुझ में अक्स* अपना देखते हैं।
मैं भी ख़ुद को ढूॅंढता हूँ हर किसी में।।
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आओ इस मंज़र*को ऑंखों में बसालें।
आओ थोड़ी देर बैठें चाॅंदनी में।।
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उसके हक़* में रात भर माॅंगी दुआऍं।
ये मेरा पहला क़दम था दुश्मनी में।।
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कुछ तो अंदाज़े-सुख़न* बदले हमारा।
कुछ तो तब्दीली* हो “अनवर शायरी”में।।
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शब्दार्थ:-
जबीनोंं*माथों ललाटों
बंदगी*इबादत प्रार्थना
अक्स*परछाई
मंज़र*दृश्य
हक़ में*पक्ष में
अंदाज़े-सुख़न*काव्य शैली
तब्दीली*बदलाव
📞9460851271
✍शकूर अनवर






