गीता श्लोक 5 /4..
सांख्य योग और कर्म योग दोनों के द्वारा प्रभु प्राप्त हैं …..
वेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोग को अलग-अलग फल वाले कहते हैं, न कि पंडित जन अर्थात विद्वंजन । क्योंकि इन दोनों में से एक साधन में भी अच्छी तरह से स्थित मनुष्य दोनों के फल स्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
भगवान ने अर्जुन को ज्ञान प्राप्त करने हेतु किसी तत्वदर्शी महापुरुष के पास जाने को कहा था । उसी pज्ञान को प्राप्त करने का साधन जो है उसे अर्जुन ने कर्मसन्यास कहा । इस वस्तु को भगवान यहां सांख्य नाम से कह रहे हैं । भगवान के मत में सांख्य और सन्यास दोनों आपस में पर्यायवाची हैं । अर्जुन जिसे कर्म सन्यास नाम से कह रहे हैं, वह भी निःसंदेह भगवान के द्वारा कहे गए सांख्य का ही एक अवतार है । जिन महापुरुषों ने सांख्ययोग और कर्मयोग के तत्व को ठीक-ठीक समझा है, वही पंडित अर्थात विद्वान जन है । वे लोग दोनों को अलग-अलग फल वाले नहीं कहते । क्योंकि वे दोनों साधनों की प्रणालियों को न देखकर उन दोनों के वास्तविक परिणाम को देखते हैं ।
: गीता श्लोक 5/5 ….
कर्म योग और सांख्य योग दोनों का फल एक ही है ।…….
भगवान कहते हैं की सांख्य योगियो के द्वारा जो तत्व प्राप्त किया जाता है कर्मयोगियो के द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोग को फल रूप में देखता है वही ठीक देखता है ।
भगवान ने कहा कि एक साधन में भी अच्छी तरह से स्थित होकर मनुष्य दोनों साधनों के फल रूप परमात्मा तत्व को प्राप्त कर लेता है । इस बात की पुष्टि भगवान अन्य प्रकार भी करते हैं । जो तत्व सांख्ययोगी प्राप्त करते हैं, वही तत्व कर्मयोगी भी प्राप्त करते हैं । संसार विषम है, परंतु घनिष्ठ से घनिष्ठ सांसारिक संबंध में भी विषमता रहती है । परंतु परमात्मा सम है, अतः समरूप परमात्मा की प्राप्ति संसार से सर्वथा संबंध विच्छेद होने पर होती है । संसार से संबंध विच्छेद के दो मार्ग हैं_ एक _ज्ञानमार्ग (सांख्य योग)और
दो _कर्म योग
भगवान सांख्ययोग और कर्मयोग दोनों को स्वतंत्र साधन मानते हैं और दोनों का फल, एक परमात्मा की प्राप्ति ही मानते हैं । इनको न जानने वाले को भगवान ना समझ कहते हैं और इसे जानने वाले को बुद्धिमान कहते हैं ।
गीता श्लोक 5/6….
मननशील कर्मयोगी प्रभु को प्राप्त करता है..
भगवान कहते हैं कि हे महाबाहु अर्जुन! कर्मयोग के बिना सांख्ययोग सिद्ध होना कठिन है । मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।
सांख्ययोगी का लक्ष्य परमात्म तत्व का अनुभव करना होता है । परंतु राग अर्थात आकर्षण या लगाव रहते हुए इस साधन के द्वारा परमात्मतत्व के अनुभव की बात तो बात ही क्या है? इस साधन का समझ में आना भी कठिन है । राग मिटाने का सुगम उपाय है_ कर्म योग का अनुष्ठान करना । कर्मयोग में प्रत्येक क्रिया दूसरों के हित के लिए ही की जाती है । दूसरों के हित का भाव होने से अपना राग स्वत मिट जाता है । इसलिए कर्म योग के आचरण द्वारा राग मिटाकर सांख्य योग का साधन करना सम पड़ता है । कर्म योग का साधन किए बिना, सांख्य योग का सिद्ध होना कठिन है । भगवान कहते हैं कि कर्म योगी को तत्काल ही शांति प्राप्त हो जाती है। वह संसार बंधन से सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है। अतः कर्म योग का साधन सम,शीघ्र,सिद्धिदायक और किसी अन्य साधन के बिना परमात्मा की प्राप्त करने वाला स्वतंत्र साधन है ।
गीता श्लोक 5/7…
कर्म योगी के लक्षण…
भगवान कहते हैं कि जिसकी इंद्रियां अपने बस में हैं, जिसका अंत करण निर्मल है, जिसका शरीर अपने बस में है और संपूर्ण प्राणियों की आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता ।
इंद्रियों का बस में होने का तात्पर्य है, इंद्रियों का राग द्वेष से रहित होना । राग द्वेष से रहित होने पर इंद्रियों में मन को विचलित करने की शक्ति नहीं रहती । साधक उनको अपने मन के अनुकूल, चाहे जहां लगा सकता है ।
कर्मयोग के साधक के लिए इंद्रियों का बस में होना आवश्यक है । इसलिए भगवान कर्मयोग के प्रकरण में इंद्रियों को बस में करने की बात विशेष रूप से कहते हैं । कर्मयोगी का कर्मों के साथ अधिक संबंध रहता है, इसलिए इंद्रियां बस में न होने से उसके विचलित होने की संभावना बनी रहती है । कर्मयोग के साधन में दूसरों के हित के लिए सेवा रूप से कर्तव्य कर्म करना आवश्यक है । जिसके लिए इंद्रियों का बस में होना बहुत जरूरी है । इंद्रियां बस में किए बिना कर्म योग का साधन होना कठिन है ।
गीता श्लोक 5/8 और 5/9..
सांख्य योग के साधन….
भगवान कहते हैं कि _तत्वों को जानने वाला सांख्ययोगी देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ, मल मूत्र त्याग करता हुआ, सोता हुआ, सांस लेता हुआ तथा आंखें खोलता हुआ और मूदता हुआ भी संपूर्ण इंद्रियां _ इंद्रियों के विषयों में बरत रही हैं, ऐसा समझ कर, मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूं, ऐसा मानें ।
तत्वविद_ इसका तात्पर्य होता है की जो वास्तविकता को जानता है, जो अपने में कभी किंचिन्मात्र भी किसी क्रिया के कर्तापन को नहीं देखता। वह तत्व वित्त है, वही वास्तविकता को जानने वाला है । उसमें नित्य निरंतर स्वाभाविक ही यह सावधानी रहती है कि स्वरूप में कर्तापन है ही नहीं ।
क्रियाएं _ देखना, सुनना, स्पर्श करना, सुनना और खाना, यह पांच क्रियाएं हैं ।
ज्ञानेंद्रियां _नेत्र, स्तोत्र, त्वचा, घ्राण और रसना, यह पांच ज्ञानेंद्रिय हैं ।
गीता में स्वयं को करता मानने वाले की निंदा की गई है । इसी प्रकार शुद्ध स्वरूप को करता न मानने वाले को मलिन अंतःकारण वाला और दुरमति कहा जाता है । परंतु स्वरूप को अकर्ता मानने वाले की प्रशंसा की गई है ।





