ग़ज़ल
करके उल्फ़त सुकूँ दिल का खोना पड़ा।
उम्र भर ग़म के काॅ॑टों पे सोना पड़ा।।
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उनकी बर्क़े तबस्सुम* गिरी दिल पे यूॅ॑।
हाथ होशो-ख़िरद* तक से धोना पड़ा।।
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कैसे बेवक़्त ये याद आई तिरी।
हॅ॑सते-हॅ॑सते मुझे आज रोना पड़ा।।
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खेलते ही रहे वो मिरे दिल से यूॅ॑।
जैसे बच्चे के हाथों खिलोना पड़ा।।
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वो ग़मे इश्क़ को है बुलंदी मिली।
ग़म मुक़ाबिल हर इक जिसके बौना* पड़ा।।
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दास्ताने अलम जब भी की हे रक़म*।
ख़ूने दिल में क़लम को डुबोना पड़ा।।
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अब के “परकाश” ख़ूॅं रेज़ियाॅ॑* वो हुईं।
हाथ बारिश के पानी से धोना पड़ा।।
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शब्दार्थ:-
बर्क़े तबस्सुम* हॅ॑सी की बिजली,
होशो-ख़िरद* होश और अक़्ल,
बौना*छोटा,
दास्ताने अलम* ग़म की कहानी,
रक़म* लिखना,
खूॅ॑रेज़ियाॅ॑*ख़ून ख़राबा,
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वेद प्रकाश “परकाश”
44 बी. शाॅपिंग सेंटर कोटा (राज0)
मो.9352602229-6378759991
ग़ज़ल -वेद प्रकाश ‘प्रकाश’





