Wednesday, April 22, 2026
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ग़ज़ल -वेद प्रकाश ‘प्रकाश’

ग़ज़ल

करके उल्फ़त सुकूँ दिल का खोना पड़ा।

उम्र भर ग़म के काॅ॑टों पे सोना पड़ा।।

*

उनकी बर्क़े तबस्सुम* गिरी दिल पे यूॅ॑।

हाथ होशो-ख़िरद* तक से धोना पड़ा।।

*

कैसे बेवक़्त ये याद आई तिरी।

हॅ॑सते-हॅ॑सते मुझे आज रोना पड़ा।।

*

खेलते ही रहे वो मिरे दिल से यूॅ॑।

जैसे बच्चे के हाथों खिलोना पड़ा।।

*

वो ग़मे इश्क़ को है बुलंदी मिली।

ग़म मुक़ाबिल हर इक जिसके बौना* पड़ा।।

*

दास्ताने अलम जब भी की हे रक़म*।

ख़ूने दिल में क़लम को डुबोना पड़ा।।

*

अब के “परकाश” ख़ूॅं रेज़ियाॅ॑* वो हुईं।

हाथ बारिश के पानी से धोना पड़ा।।

*

शब्दार्थ:-

बर्क़े तबस्सुम* हॅ॑सी की बिजली,

होशो-ख़िरद* होश और अक़्ल,

बौना*छोटा,

दास्ताने अलम* ग़म की कहानी,

रक़म* लिखना,

खूॅ॑रेज़ियाॅ॑*ख़ून ख़राबा,

*

वेद प्रकाश “परकाश”

44 बी. शाॅपिंग सेंटर कोटा (राज0)

मो.9352602229-6378759991

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