संगति का प्रभाव : स्वाति की एक बूंद से जीवन तक
लेखक : परमानन्द गोयल कोटा (राजस्थान)
कदली, सीप, भुजंग-मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन॥ -रहीम
यह दोहा जीवन का शाश्वत सत्य है।
स्वाति नक्षत्र में बरसने वाली वर्षा की जल की एक ही बूंद जब केले के पत्ते पर गिरती है तो कपूर बनकर शीतलता देती है, वही बूंद जब सीप के मुख में जाती है तो कठोर साधना के बाद बहुमूल्य मोती बन जाती है, और यदि वही बूंद सर्प के मुख में गिर जाए तो प्राणघातक विष बन जाती है।
बूंद एक, गुण एक, पर परिणाम तीन। दोष बूंद का नहीं, संगति का है।
मनुष्य का मूल स्वभाव भी उस स्वाति की बूंद जैसा ही निर्मल है। हम क्या बनेंगे – शीतलता देने वाला कपूर, मूल्यवान मोती या विनाशक विष – यह हमारी संगति ही तय करती है।
इतिहास साक्षी है
रामायण में कैकेयी का राम के प्रति प्रेम मातृत्व की पराकाष्ठा था। पर मंथरा की कुसंगति ने उसी प्रेम में विष घोल दिया और एक आदर्श परिवार कलह की अग्नि में झुलस गया। वहीं निषादराज गुह की निश्छल संगति ने राम को सच्ची मित्रता का अर्थ समझाया।
महाभारत में दुर्योधन जन्मजात दुष्ट नहीं था। शकुनि की निरंतर कुसंगति ने उसे अहंकार, ईर्ष्या और छल का प्रतीक बना दिया। इसके विपरीत, किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को जब श्रीकृष्ण जैसी सत्संगति मिली, तो वही गीता का अधिकारी बन गया।
आधुनिक विज्ञान भी यही कहता है
आज मनोविज्ञान इसे पीयर इन्फ़्लुएंस (Peer Influence) कहता है। प्रसिद्ध विचारक जिम रॉन कहते हैं – आप उन 5 लोगों का औसत हैं, जिनके साथ आप सबसे अधिक समय बिताते हैं।
1. विद्यार्थी जीवन में: एक मेधावी छात्र भी यदि व्यसनी मित्रों की संगति में पड़ जाए तो उसकी प्रतिभा धीरे-धीरे विष बनने लगती है। और एक औसत छात्र भी विद्वानों की संगति में मोती सा चमक उठता है।
2. कार्यक्षेत्र में: सकारात्मक और परिश्रमी सहकर्मियों के बीच व्यक्ति की क्षमता दोगुनी हो जाती है, जबकि नकारात्मक माहौल में वही व्यक्ति कुंठित हो जाता है।
3. डिजिटल संगति: आज संगति केवल भौतिक नहीं रही। हम दिन भर जिन पेजों को फॉलो करते हैं, जो रील देखते हैं, वही हमारी मानसिक संगति है। दिन भर नफरत, दिखावा और तुलना परोसने वाला फ़ीड मन को विषैला बना देगा, जबकि ज्ञान, प्रेरणा और करुणा वाली सामग्री वही मन को कपूर सा शीतल बना देगी।
बुरी संगति को पहचानें
बुरी संगति कभी कुरूप नहीं होती, वह सदा आकर्षक होती है। क्योंकि सर्प का मुख चमकदार होता है। वह पहले सुविधा देती है, फिर धीरे-धीरे स्वभाव बदल देती है। झूठ, आलस्य, परनिंदा, व्यसन और दूसरों को नीचा दिखाने में आनंद – ये सब विष बनने के प्रारंभिक लक्षण हैं।
तुलसीदास जी ने लिखा है – सठ सुधरहिं सतसंगति पाई।
सत्संगति का अर्थ केवल मंदिर या प्रवचन नहीं है। एक अच्छी किताब, एक ईमानदार मित्र, एक परिश्रमी शिक्षक और अपने से श्रेष्ठ विचार – ये सब सत्संग ही हैं।
तो हम क्या करें?
1. जांचें: महीने में एक बार स्वयं से पूछें – मेरे सबसे निकट के 5 लोग कौन हैं? क्या मैं सच में उनके जैसा बनना चाहता हूँ?
2. दूरी बनाएं: विषैली संगति से बहस नहीं, दूरी बनानी चाहिए। सांप को समझाने से अच्छा है, अपना रास्ता बदल लेना।
3. सीप बनें: सीप की तरह बनें। अच्छी बात को सुनकर बंद हो जाएं और तब तक मनन करें जब तक वह आपके भीतर मोती न बन जाए।
4. कदली बनें: अपने संपर्क में आने वालों को शीतलता दें। ऐसा व्यक्तित्व गढ़ें कि आपकी संगति में कोई दूसरा कपूर बन सके।
स्वाति की बूंद निर्दोष है, मनुष्य का मूल स्वभाव भी निर्दोष है। सारा खेल संगति का है। इसलिए शास्त्रों ने कहा – संगति ही प्रगति है।
आइए, हम स्वयं मोती बनें और मोती बनाने वाली संगति को चुनें। क्योंकि अंत में इस समाज को विष नहीं, कपूर और मोतियों की ही आवश्यकता है।





