क्षमावाणी पर्व आत्ममंथन और आत्मशुद्धि का पावन अवसर : अर्चना जैन
कोटा। क्षमावाणी पर्व जैन धर्म की महत्वपूर्ण आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है, जो व्यक्ति को आत्ममंथन, आत्मशुद्धि और आपसी सद्भाव का संदेश देता है। इस अवसर पर सुधासागर बालिका छात्रावास की अध्यक्ष अर्चना जैन ने सभी से वर्षभर में जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगने और मन में किसी के प्रति वैर-विरोध नहीं रखने का आह्वान किया।
अर्चना जैन ने कहा कि “क्षमावाणी पर्व आत्ममंथन और आत्मशुद्धि का पावन अवसर है।” जीवन की भागदौड़ में व्यक्ति से कई बार जाने-अनजाने ऐसी भूल हो जाती है, जिससे किसी के मन को ठेस पहुंच सकती है। ऐसे में क्षमावाणी पर्व हमें अपनी गलतियों को स्वीकार करने, आत्मचिंतन करने और संबंधों में आई दूरी को प्रेम एवं सद्भाव से दूर करने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि वर्षभर में हमारे मन, वचन या कर्म से किसी भी व्यक्ति को दुख पहुंचा हो, उसके लिए हृदय से क्षमा प्रार्थी होना चाहिए। क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और विनम्रता का प्रतीक है। यह पर्व हमें अपने भीतर झांकने और यह विचार करने का अवसर देता है कि हमारे व्यवहार से किसी व्यक्ति को कष्ट तो नहीं पहुंचा।
‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ में छिपा है मैत्री और सद्भाव का संदेश
अर्चना जैन ने कहा कि ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ केवल शब्द नहीं है, बल्कि यह आपसी प्रेम, सद्भाव, मैत्री और भाईचारे को मजबूत करने का संकल्प है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने द्वारा हुई भूलों के लिए क्षमा मांगता है और दूसरों को भी हृदय से क्षमा करने की भावना रखता है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में आपसी मतभेद और मनमुटाव को लंबे समय तक बनाए रखने के बजाय क्षमा और संवाद के माध्यम से रिश्तों को मजबूत किया जाना चाहिए। क्षमा की भावना परिवार, समाज और संस्थाओं में सकारात्मक वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वैर-विरोध छोड़कर करुणा और मानवता को अपनाएं
अर्चना जैन ने कहा कि क्षमावाणी पर्व हमें मन के सभी वैर-विरोध मिटाकर क्षमा, करुणा और मानवता को जीवन का आधार बनाने की प्रेरणा देता है। यदि हम अपनी गलतियों को स्वीकार करना और दूसरों की गलतियों को क्षमा करना सीख लें तो समाज में प्रेम, शांति और सौहार्द की भावना और मजबूत हो सकती है।
उन्होंने सभी से आह्वान किया कि क्षमावाणी पर्व की भावना को केवल एक दिन तक सीमित न रखते हुए इसे अपने दैनिक जीवन के व्यवहार में भी अपनाएं। एक-दूसरे के प्रति सम्मान, विनम्रता, प्रेम और क्षमा की भावना ही समाज को अधिक मानवीय और सौहार्दपूर्ण बना सकती है।




