प्रेरणादायक स्टोरी
मयूर टाइम्स न्यूज़ विशेष ✍️
मुंबई/दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल उनकी फिल्मों और किरदारों से नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और जिद से भी बनती है। अभिनेता कंवरजीत सिंह पेंटल, जिन्हें फिल्मी दुनिया में सिर्फ पेंटल के नाम से जाना जाता है, ऐसी ही शख्सियत हैं। हास्य और चरित्र भूमिकाओं में अपनी अलग पहचान बनाने वाले पेंटल ने अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले बेहद संघर्षपूर्ण दौर देखा।
22 अगस्त 1948 को जन्मे पेंटल आज हिंदी सिनेमा और टेलीविजन के जाने-पहचाने नाम हैं। उपलब्ध जीवनी स्रोतों के अनुसार उनका जन्म तरन तारन, पंजाब में हुआ था और उनका बचपन दिल्ली के सदर बाजार में बीता। उन्होंने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से अभिनय का प्रशिक्षण लिया और बाद में इसी संस्थान में अभिनय सिखाने की जिम्मेदारी भी संभाली।
अभिनय का सपना, लेकिन परिवार की आर्थिक हालत बड़ी चुनौती
पेंटल के लिए अभिनय केवल मनोरंजन की दुनिया में प्रवेश करने का माध्यम नहीं था, बल्कि यह उनका सपना था। FTII में चयन होना उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि पुणे में पढ़ाई, हॉस्टल और रोजमर्रा के खर्च आसानी से उठाए जा सकें।
पेंटल के परिवार के बारे में उपलब्ध सामग्री में उनके पिता के कैमरा और फोटोग्राफी से जुड़े होने का उल्लेख मिलता है। उनके बड़े भाई गूफी पेंटल भी आगे चलकर अभिनय की दुनिया में चर्चित हुए और ‘महाभारत’ में शकुनि के किरदार से घर-घर पहचाने गए।
पेंटल के FTII में दाखिले के बाद परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि उनकी पढ़ाई और पुणे में रहने का खर्च कैसे चलेगा। परिवार के एक रिश्तेदार ने आगे बढ़कर मदद का भरोसा दिया और इसी सहारे पेंटल अपने अभिनय के सपने को पूरा करने पुणे पहुंच सके।
लेकिन संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था।
पिता की नौकरी गई तो सामने आया पढ़ाई छोड़ने का संकट
FTII में कुछ समय बीतने के बाद पेंटल को अपने पिता की ओर से एक ऐसी खबर मिली जिसने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी।
परिवार की आर्थिक स्थिति और खराब हो चुकी थी। पिता की नौकरी चली गई थी और अब उनके लिए बेटे की पढ़ाई का खर्च उठाना संभव नहीं था। ऐसे हालात में पेंटल के सामने सवाल था—क्या वह अपना सपना अधूरा छोड़कर वापस दिल्ली लौट जाएं?
एक तरफ अभिनय का सपना था और दूसरी तरफ घर की मजबूरी।
ऐसे समय में पेंटल ने हार मानने के बजाय रास्ता तलाशने का फैसला किया।
पढ़ाई में अव्वल आए और मिली छात्रवृत्ति
इसी मुश्किल दौर में उन्हें पता चला कि FTII में हुए तिमाही परीक्षा परिणाम में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया है और वह प्रथम स्थान पर रहे हैं। इसके आधार पर उन्हें मासिक छात्रवृत्ति मिलने लगी।
बताया जाता है कि छात्रवृत्ति की राशि करीब 85 रुपये प्रतिमाह थी। इसके अलावा पेंटल ने संस्थान में एक माइम शो भी किया, जिसके बदले उन्हें कुछ पारिश्रमिक मिला।
उस दौर में यह रकम आज की तुलना में बहुत छोटी लग सकती है, लेकिन पेंटल के लिए यह सिर्फ पैसा नहीं था। यह उनके सपने को बचाने का सहारा था।
उन्होंने अपने पिता को संदेश दिया कि अब वह अपनी पढ़ाई और रहने का खर्च किसी हद तक स्वयं संभालने की कोशिश करेंगे। इस तरह उन्होंने FTII छोड़ने के बजाय अपनी पढ़ाई जारी रखी।
जब अपनी कमाई से खाना खरीदना भी लक्ष्य बन गया
पेंटल के संघर्ष की सबसे दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानियों में एक किस्सा उनके खान-पान से जुड़ा बताया जाता है।
कहा जाता है कि आर्थिक तंगी के दौर में उन्होंने खुद से एक संकल्प लिया था—
“जब तक मैं अपनी कमाई से मटन-चिकन खरीदने के काबिल नहीं हो जाता, तब तक मटन-चिकन नहीं खाऊंगा।”
पेंटल को मांसाहारी खाना पसंद था, लेकिन उस समय उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे अपनी पसंद का खाना नियमित रूप से खरीद सकें।
दोस्तों को जब उनकी इस स्थिति का पता चलता तो वे कभी-कभी उन्हें अपनी तरफ से चिकन खिलाने की पेशकश करते। लेकिन पेंटल कथित तौर पर अपनी बात पर कायम रहते।
उनका तर्क सीधा था—अगर खाना है तो अपनी कमाई से।
यह सिर्फ मटन या चिकन से जुड़ा फैसला नहीं था। यह उस युवा कलाकार की आत्मनिर्भर बनने की जिद थी, जो आर्थिक मुश्किलों के बावजूद किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था।
संघर्ष ने बनाया जमीन से जुड़ा कलाकार
FTII से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद पेंटल 1969 में मुंबई पहुंचे और हिंदी फिल्म उद्योग में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश शुरू की। उपलब्ध फिल्म-जीवनी स्रोतों के अनुसार उन्होंने 1970 की फिल्म ‘उमंग’ से फिल्मी करियर की शुरुआत की।
सके बाद उन्होंने ‘बावर्ची’, ‘पिया का घर’, ‘परिचय’, ‘जंगल में मंगल’, ‘हीरा पन्ना’, ‘आज की ताजा खबर’, ‘रफू चक्कर’ और ‘सत्ते पे सत्ता’ जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाएं निभाईं।
उनकी कॉमिक टाइमिंग और संवाद अदायगी ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। ‘आज की ताजा खबर’ में चंपक भूमिया जैसे किरदारों ने उनकी लोकप्रियता को और मजबूत किया।
लेकिन पेंटल की प्रतिभा केवल कॉमेडी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने समय के साथ गंभीर और चरित्र भूमिकाएं भी निभाईं।
‘महाभारत’ से घर-घर पहुंचा चेहरा
टेलीविजन के दौर में भी पेंटल लगातार सक्रिय रहे। बी.आर. चोपड़ा के लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’ में उन्होंने शिखंडी और सुदामा जैसे किरदार निभाए। वहीं उनके भाई गूफी पेंटल ने इसी धारावाहिक में शकुनि की भूमिका निभाकर जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की।
इस तरह पेंटल परिवार का नाम भारतीय टेलीविजन के इतिहास में भी दर्ज हो गया।
जिस संस्थान ने कलाकार बनाया, वहीं शिक्षक भी बने
पेंटल की कहानी का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि जिस FTII ने उन्हें अभिनेता बनने की राह दिखाई, बाद में उन्होंने उसी संस्थान में नई पीढ़ी के कलाकारों को अभिनय सिखाने का काम किया।
उपलब्ध स्रोतों के अनुसार वह FTII में लंबे समय तक फैकल्टी से जुड़े रहे और बाद के वर्षों में अभिनय विभाग के प्रमुख की जिम्मेदारी भी संभाली।
यानी जिस संस्थान में कभी वह आर्थिक परेशानियों से जूझते हुए अपने भविष्य को बचाने की कोशिश कर रहे थे, समय ने उन्हें उसी संस्थान में दूसरों के भविष्य को संवारने की भूमिका दे दी।
पेंटल की कहानी में छिपा बड़ा संदेश
पेंटल के संघर्ष की कहानी सिर्फ एक अभिनेता के फिल्मी सफर की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जिसमें इंसान अपनी परिस्थितियों को अपनी मंजिल के रास्ते की दीवार नहीं बनने देता।
पिता की आर्थिक परेशानी, पढ़ाई छूटने का खतरा, सीमित साधन, छोटी-सी छात्रवृत्ति और अपने खर्च खुद निकालने की कोशिश—इन सबके बीच उन्होंने अभिनय का रास्ता नहीं छोड़ा।
और शायद यही वजह है कि मटन-चिकन से जुड़ा उनका कथित संकल्प भी इतना यादगार बन गया।
क्योंकि उस संकल्प का असली मतलब मटन या चिकन नहीं था।
असल बात थी—“जब तक अपनी मेहनत और अपनी कमाई से सक्षम नहीं बनूंगा, अपनी इच्छाओं को खुद पर हावी नहीं होने दूंगा।”
आज पेंटल का नाम हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में लिया जाता है जिन्होंने छोटे-बड़े, हास्य और चरित्र—हर तरह के किरदारों में अपनी छाप छोड़ी। उन्होंने फिल्मों और टेलीविजन के साथ-साथ अभिनय प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी योगदान दिया।
उनकी जिंदगी यह बताती है कि शुरुआत कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, अगर इंसान अपने लक्ष्य को लेकर ईमानदार है और परिस्थितियों से लड़ने का साहस रखता है, तो वही संघर्ष आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी पहचान बन सकता है।





