Friday, August 28, 2026
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श्रमण संस्कृति की रक्षा, संतों की सेवा और जीव मात्र में वात्सल्य ही सच्ची धर्मसाधना — मुनि श्री योगसागर जी महाराज

कोटा। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा अर्थात रक्षाबंधन के पावन अवसर पर श्रमण संस्कृति रक्षक दिवस एवं वात्सल्य दिवस के रूप में श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी, दादाबाड़ी में धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण में आयोजन हुआ। यहां चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि शिरोमणि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि श्रमण संस्कृति केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि त्याग, तप, संयम, अहिंसा और आत्मकल्याण की जीवंत संस्कृति है। इसकी रक्षा करना प्रत्येक श्रावक का परम कर्तव्य है।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर की परंपरा हमें बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि अंतरात्मा की शुद्धता का मार्ग दिखाती है। श्रमण का जीवन यह संदेश देता है कि इच्छाओं को बढ़ाना नहीं, बल्कि इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना ही सच्ची स्वतंत्रता है। जिस समाज में संतों के प्रति श्रद्धा और उनकी चर्या के प्रति सम्मान होता है, वही समाज अपनी धर्मपरंपरा, संस्कृति और संस्कारों को सुरक्षित रख सकता है।

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1. श्रमण संस्कृति केवल परंपरा नहीं, आत्मकल्याण की जीवंत साधना है

संत संस्कृति के प्रहरी हैं और श्रावक उसके संरक्षक

मुनिश्री ने कहा कि श्रमण संस्कृति त्याग, तप, संयम, अहिंसा, अपरिग्रह और आत्मसाधना पर आधारित है। संत स्वयं अपने जीवन से धर्म का आदर्श प्रस्तुत करते हैं, जबकि श्रावकों का दायित्व है कि वे इस संस्कृति की रक्षा, संतों की सेवा और धर्म की प्रभावना में अपना योगदान दें।

उन्होंने कहा कि संतों के चरणों में बैठकर केवल प्रवचन सुन लेना पर्याप्त नहीं है। संतों की साधना से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में परिवर्तन लाना ही प्रवचन की वास्तविक सार्थकता है।

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2. वात्सल्य केवल परिवार तक सीमित नहीं, जीव मात्र के प्रति हो आत्मीयता

प्रेम, क्षमा, करुणा और सहयोग से मजबूत होती है समाज की धर्मधारा

वात्सल्य दिवस का संदेश देते हुए मुनिश्री ने कहा कि वात्सल्य का अर्थ केवल अपने परिवार से प्रेम करना नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति आत्मीयता, करुणा और मैत्री का भाव रखना है।

जब मनुष्य के हृदय में परस्पर प्रेम, क्षमा, सहयोग और सद्भावना का भाव जागता है, तभी समाज में एकता आती है और धर्म की प्रभावना होती है। इसलिए रक्षाबंधन का यह पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व न रहकर जीव मात्र के प्रति वात्सल्य और धर्म-संस्कृति की रक्षा का संकल्प पर्व बने।

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3. अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनिराजों को अर्घ्य समर्पित

श्रमण संस्कृति की रक्षा के गौरवशाली प्रसंग का किया भावपूर्ण स्मरण

इस पावन अवसर पर सामूहिक विधान का आयोजन किया गया, जिसमें पूज्य अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनिराजों को श्रद्धापूर्वक अर्घ्य समर्पित किए गए।

मुनिश्री ने कहा कि ऐसे ऐतिहासिक एवं प्रेरणादायी प्रसंग हमें यह स्मरण कराते हैं कि श्रमण संस्कृति की रक्षा केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है। आने वाली पीढ़ियां जैन धर्म के सिद्धांतों को जानें, समझें और जीवन में उतारें—इसके लिए समाज को स्वयं आदर्श प्रस्तुत करना होगा।

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4. एक दिन का त्याग भी बने श्रमण संस्कृति के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि

बुराई का त्याग, क्षमा, सेवा और धर्मकार्य में सहयोग—यही संस्कृति संरक्षण का मार्ग

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि श्रमणों की चर्या को केवल देखने तक सीमित न रखें, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर जीवन में छोटे-छोटे संकल्प धारण करें।

एक दिन का त्याग, एक बुराई का त्याग, किसी के प्रति क्षमा, किसी जरूरतमंद की सहायता अथवा धर्मकार्य में सहयोग—ये सभी श्रमण संस्कृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि बन सकते हैं।

उन्होंने कहा कि धर्म के कार्य में किया गया प्रत्येक छोटा प्रयास भी आत्मकल्याण का कारण बन सकता है।

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5. राखी बनी श्रमण संस्कृति, जिनालय और शास्त्र-गुरु संरक्षण का संकल्प

मंदिरों में लगाए गए विशेष राखी काउंटर; श्रद्धालुओं ने संरक्षण की भावना से बंधवाई राखी

रक्षाबंधन के पावन अवसर पर अध्यक्ष, मंत्री एवं समिति के पदाधिकारियों द्वारा मंदिरों में विशेष राखी काउंटर की व्यवस्था की गई। श्रद्धालुओं ने इन काउंटरों से राखी प्राप्त कर श्रमण संस्कृति, जिनालय, शास्त्र एवं गुरु की रक्षा की भावना के साथ राखी बंधवाई।

मुनिश्री ने आह्वान किया कि श्रावक तन-मन-धन से श्रमण संस्कृति की रक्षा, संतों की सेवा, धर्म की प्रभावना और समाज में वात्सल्य की भावना को बढ़ाने में अपना योगदान दें

🌺 आज के प्रमुख पुण्यार्जक

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर अर्जित किया धर्मलाभ

 

अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री हुकमचंद सोगानी परिवार, हसित के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में; मनोज मंडी, बमोरा; श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार तथा श्री राजेन्द्र जी, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

इसी अवसर पर भगवान श्रेयांसनाथ के मोक्ष कल्याणक दिवस के उपलक्ष्य में निर्वाण लाडू (मोक्ष लड्डू) का पुण्यार्जन श्री गोपाल जी एडवोकेट परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ एवं उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन ब्रह्मचारिणी मेना दीदी, मोना दीदी, श्रीमती मुन्नी जी अयाना एवं श्रीमती प्रेमलता जैन, धर्मपत्नी श्री चंद्रप्रकाश जैन (केकड़ी वाले), के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में ऋषभ-मोनिका सोनी परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उषा दीदी, कविता जी एवं विधा जैन को प्राप्त हुआ।

श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती मंजू जी एवं श्री विनोद जी पाटनी को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर सुश्री सौम्या जैन ‘सुर नूर’ उपाधि से विभूषित, बांसुरी वादन में स्वर्ण पदक प्राप्तकर्ता, एवं सुनीता हरसोरा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

गुरुवाणी का अमृत संदेश

“राखी केवल कलाई पर नहीं, धर्म और संस्कृति की रक्षा के संकल्प में बंधे”

श्रमण संस्कृति हमारी पहचान है,

संत उसके प्रकाश हैं और श्रावक उसके प्रहरी।

राखी का यह पावन सूत्र

केवल प्रेम का बंधन नहीं,

बल्कि धर्म, जिनालय, शास्त्र और गुरु की रक्षा का संकल्प बने।

हृदय में वात्सल्य, जीवन में संयम

और कर्मों में धर्म हो—

यही रक्षाबंधन की सच्ची सार्थकता है।

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