Friday, August 28, 2026
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तकनीक तेज हुई, रिश्ते नहीं—ढलती उम्र को चाहिए थोड़ा ठहराव

तकनीक तेज हुई, रिश्ते नहीं—ढलती उम्र को चाहिए थोड़ा ठहराव

✍️लेखक : परमानन्द गोयल, कोटा (राजस्थान)

“जब घर का कोई ढलती उम्र का व्यक्ति पूछता है—‘बेटा, यह कैसे होगा?’ तो वह केवल मोबाइल का कोई बटन दबाना नहीं सीख रहा होता, बल्कि तेजी से बदलती दुनिया में अपनी जगह तलाश रहा होता है।”

एक पिता मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियां फेरते हुए उलझन में थे। उन्होंने बेटे से पूछा—“बेटा, जरा देखना, यह कैसे होगा?” बेटे ने बिना सिर उठाए कह दिया —“पापा, छोड़िए… आपको समझ नहीं आएगा।” न कोई झगड़ा हुआ, न आवाज ऊंची हुई, लेकिन उस एक वाक्य में पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी साफ दिखाई देती है।

तकनीक ने हमारी जिंदगी को तेज, सुविधाजनक और आसान बनाया है, लेकिन कहीं-कहीं इस तेज रफ्तार ने रिश्तों में धैर्य कम कर दिया है।

जब उन्होंने हमें सीखने का धैर्य दिया था

हम भूल जाते हैं कि कभी हम भी हर छोटी-बड़ी चीज के लिए अपने माता-पिता पर निर्भर थे। उन्होंने हमें चम्मच पकड़ना, पेंसिल पकड़ना, बोलना, चलना और फिर जीवन की राह पर संभलकर आगे बढ़ना सिखाया। हमने एक ही बात बार-बार पूछी, गलतियां कीं, गिरे और उठे—लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि “तुमसे नहीं होगा।”

आज वही माता-पिता जब स्मार्टफोन, ऑनलाइन भुगतान, वीडियो कॉल, डिजिटल बैंकिंग या ऑनलाइन डॉक्टर की अपॉइंटमेंट लेना सीखना चाहते हैं, तो उन्हें हमारी झुंझलाहट नहीं, उसी धैर्य की जरूरत है।

रिवर्स पैरेंटिंग का दौर

जीवन के एक पड़ाव पर भूमिकाएं बदलने लगती हैं। इसे ‘रिवर्स पैरेंटिंग’ कहा जाता है। जिन कंधों ने कभी हमें संभाला था, आज उन्हें हमारे सहारे की आवश्यकता होती है।

ढलती उम्र केवल शरीर की गति धीमी नहीं करती, बल्कि आत्मविश्वास को भी प्रभावित कर सकती है। इसलिए ढलती उम्र के व्यक्ति जब तकनीक के बारे में हमसे पूछते हैं, तो वे केवल जानकारी नहीं मांग रहे होते; वे अपने बच्चों का साथ, भरोसा और अपनापन तलाश रहे होते हैं।

तीन छोटी बातें, बड़ा असर

पहला—सिखाएं, झुंझलाएं नहीं। तकनीक धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से समझाएं।

दूसरा—उनके सवाल का सम्मान करें। वे इंटरनेट / गूगल से सीख सकते हैं, लेकिन आपसे पूछना उनके भरोसे का प्रतीक है।

तीसरा—काम करके देने के बजाय साथ मिलकर सिखाएं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे आत्मनिर्भर बनेंगे।

बचपन में जिन्होंने हमारे लड़खड़ाते कदमों को थामकर चलना सिखाया था, अब हमारी बारी है कि हम उनके साथ थोड़ा धीरे चलें।

उन्हें हमारी रफ्तार नहीं, हमारा समय, धैर्य, सम्मान और संवेदना चाहिए।

तकनीक चाहे कितनी भी तेज क्यों न हो जाए, रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए आज भी सबसे जरूरी तकनीक वही है—थोड़ा ठहरना और अपनों को समझना।

              

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