बाराँ,26 अगस्त ।भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक धरोहर न्यास (INTACH – वराह नगरी बाराँ अध्याय) के तत्वावधान में रविवार, को एक दिवसीय “विरासत यात्रा, सेमिनार एवं सावन की गोठ” कार्यक्रम का भव्य एवं गरिमामय आयोजन शेरगढ़ दुर्ग परिसर में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम की शुरुआत प्रातः 9:00 बजे बाराँ के झालावाड़ रोड स्थित श्री रामजानकी मंदिर से शेरगढ़ के लिए आयोजित विरासत यात्रा के साथ हुई। इस यात्रा में बाराँ के प्रबुद्ध नागरिकों, इतिहास प्रेमियों, समाजसेवियों एवं इंटेक सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। शेरगढ़ पहुँचने पर प्रातः 11:15 बजे दुर्ग परिसर में “शेरगढ़: इतिहास और पुरातत्व” विषय पर एक विचारोत्तेजक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में
मुख्य अतिथि श्री विष्णु कुमार साबू (चेयरमैन, इंटेक एडवाइजरी कमेटी एवं वरिष्ठ उद्योगपति) ने सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि
“हाड़ौती और विशेषकर बाराँ जिले का इतिहास अत्यंत समृद्ध और वैभवशाली रहा है। परवन नदी के तट पर स्थित शेरगढ़ दुर्ग केवल पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि हमारी सदियों पुरानी संस्कृति, वास्तुकला और सामरिक शक्ति का जीवंत प्रमाण है। इस अमूल्य धरोहर को पर्यटन के अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर स्थापित करना और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना हम सभी का नैतिक दायित्व है। उद्योग जगत और सामाजिक संगठनों को मिलकर विरासत संरक्षण के क्षेत्र में आगे आना होगा।”
सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए श्री प्रशांत पाटनी प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता एवं इंटेक सदस्य ने कहा कि
“विरासतें हमारे पूर्वजों का दिया हुआ अनमोल उपहार हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इतिहास और संस्कृति के प्रति जन-जागरूकता फैलाना अत्यंत आवश्यक है। जब तक स्थानीय समुदाय और समाज अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति सजग नहीं होगा, तब तक इनका वास्तविक संरक्षण संभव नहीं है। इंटेक द्वारा आयोजित यह विरासत यात्रा और सावन की गोठ सांस्कृतिक समरसता और ऐतिहासिक चेतना का एक अद्भुत संगम है।”सेमिनार में
वरिष्ठ इतिहासकार एवं पुरातत्वविद् राकेश कुमार शर्मा ने
मुख्य वक्ता के रूप में विषय पर पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से विस्तृत प्रकाश डालते हुए शेरगढ़ के ऐतिहासिक, पुरातात्विक और स्थापत्य महत्व पर शोधपरक व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि
“शेरगढ़ (प्राचीन कोषवर्धन) का इतिहास सदियों पुराना है। यहाँ मिले गुप्तकालीन और पूर्व-मध्यकालीन शिलालेख, जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं, प्राचीन मंदिर, बौद्ध गुफाएं और जल-दुर्ग का अद्वितीय स्वरूप इसे पुरातत्व के क्षेत्र में एक अद्वितीय स्थान बनाते हैं। शेरशाह सूरी के समय इसका नाम शेरगढ़ पड़ा, लेकिन इसके प्राचीन पुरातात्विक अवशेष यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र सनातन, बौद्ध और जैन धर्म-संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ व्यापक पुरातात्विक शोध और उत्खनन की अपार संभावनाएं हैं।”
विशिष्ठ अतिथि और एडवाइजरी कमेटी सदस्य श्री ओमप्रकाश शर्मा ने कहा कि
“शेरगढ़ का हर एक पत्थर इतिहास की एक अनकही कहानी कहता है। इस क्षेत्र के प्राचीन मंदिरों, शिलाखंडों और महलों के शिल्पकला को सुरक्षित रखना आज समय की सबसे बड़ी मांग है। हमें दस्तावेजीकरण के जरिए इस इतिहास को संजोना होगा ताकि भविष्य की पीढ़ियां अपने गौरवशाली अतीत पर गर्व कर सकें।”
विशिष्ठ अतिथि श्री कुंजबिहारी नागर ने कहा कि
“ऐसी विरासत यात्राएं लोगों को केवल इतिहास से ही नहीं जोड़तीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के प्रति भी सम्मान पैदा करती हैं। शेरगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता और परवन नदी का विहंगम दृश्य पर्यटकों को आकर्षित करने की पूरी क्षमता रखता है।”
अन्य विशिष्ठ अतिथि डॉ. देवीशंकर नागर अध्यक्ष, लायंस क्लब बाराँ श्री जी ने अपने विचार रखते हुए कहा”सामाजिक संस्थाओं और क्लबों को भी सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए। लायंस क्लब बाराँ श्री जी इस प्रकार के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अभियानों में इंटेक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करने के लिए सदैव तत्पर है।
कार्यक्रम के अंत में इंटेक बाराँ चैप्टर के संयोजक जितेन्द्र कुमार शर्मा ने सभी अतिथियों एवं आगंतुकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा “इंटेक बाराँ चैप्टर का मुख्य उद्देश्य जिले की उपेक्षित और विस्मृत हो रही सांस्कृतिक व पुरातात्विक धरोहरों को मुख्यधारा में लाना और उनका संरक्षण सुनिश्चित करना है। आज का यह आयोजन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक धरोहरों को पुनर्जीवित करने का एक सतत प्रयास है। हम आगे भी बाराँ जिले के अन्य ऐतिहासिक स्थलों जैसे अटरू, विलासगढ़, काकूनी और रामगढ़ के संरक्षण हेतु ऐसे जन-जागरूकता कार्यक्रम निरंतर आयोजित करते रहेंगे।”
सेमिनार के पश्चात दोपहर 1:00 बजे इतिहासकार राकेश कुमार शर्मा के निर्देशन में सभी अतिथियों एवं सदस्यों ने शेरगढ़ दुर्ग, प्राचीन बावड़ियों, जैन प्रतिमाओं,सोमनाथ मंदिर,श्री कल्याणराय जी की हवेली ,पालकियां हवेली,लक्ष्मी नारायण मंदिर, झाला हवेली, जैन मंदिर,परिसरों और परवन नदी के तट का विस्तृत पुरातात्विक भ्रमण किया और दुर्ग की वास्तुकला की बारीकियों को समझा।
तदुपरांत दोपहर 2:30 बजे प्रकृति की गोद में पारंपरिक ‘सावन की गोठ’ का आयोजन हुआ, जिसमें सभी सदस्यों और अतिथियों ने हाड़ौती के पारंपरिक व्यंजनों (दाल-बाटी-चूरमा) का आनंद लिया और आपसी सांस्कृतिक विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, पत्रकार, इतिहास प्रेमी एवं जिले के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में इतिहास कार राकेश शर्मा और इंटेक सदस्य नरेंद्र सिंह सोलंकी, आदित्य पांडे के नेतृत्व में आवासीय किला -बरखेड़ी दरवाजा,सन 790 का नागवंशी सामन्त देवदत्त का शिलालेख,तोपखाना , चतुर्भुज मन्दिर ,गोपालरायजी का मन्दिर
एक खम्भा मन्दिर ,लक्ष्मीनाथ मन्दिर , परमारकालीन शिलालेख,नाव दरवाजा ,झाला हवेली,रामशिला , हनुमान मंदिर,
बल्लभ सम्प्रदाय की षष्ठपीठ की निर्माणाधीन कल्याणरायजी की हवेली,जैन मंदिर जैन त्रिमूर्ति मन्दिर व छतरी,तमिल रामानुजकोट का प्राचीन मंदिर व छतरी,प्राचीन खंडहर हवेलियां पिछले किला गेट सैन्य किला
गेट बावड़ी , बुर्ज,प्राचीन बावड़ी
किलेदार का आवास,नदी का सुरक्षा बुर्ज , व्यू प्वाइंट
जलापूर्ति ढाना व नहर,चारभुजानाथ मंदिर,बैरक , घुड़साल , बारुदखाना आदि भवन,प्राचीन तोप, बाहरी सुरक्षा दीवार , चौकियां , बुर्ज , तोप ऊपर चढ़ाने के रेम्प,बाहर,जैन चरनचौकी,मनसा माता मंदिर
सैन्य किले का पिछला गुप्त दरवाजा, किले का 300 फिट ऊंचा चट्टानी सुरक्षा व ऊपर दीवार का गहनता के साथ अवलोकन किया।






