Sunday, August 9, 2026
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पुण्योदय नसियां जी में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योग सागर जी महाराज का भव्य चातुर्मास कलश स्थापना आज 

कोटा। श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य आचार्य भगवन श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में वर्षायोग कलश स्थापना महामहोत्सव का आयोजन आज रविवार को प्रातः 8 बजे किया जाएगा। आयोजन को लेकर सकल दिगम्बर जैन समाज में उत्साह और श्रद्धा का वातावरण है।

चातुर्मास कमेटी के मुख्य संयोजक हुकम जैन काका ने बताया कि जैन परंपरा में चातुर्मास आत्मशुद्धि, संयम, साधना, स्वाध्याय एवं धर्माराधना का पावन पर्व है। कलश स्थापना समारोह इसी आध्यात्मिक यात्रा का मंगल शुभारंभ होगा।

मंदिर अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आयोजन में कोटा सहित देशभर से श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलशिला चालू हो गया है। कार्यकर्म की भव्यता को देक्ते हुए श्रद्धालुओं के रुक्कने पार्किंग की कई जगह वयवस्था की गए हे कार्यक्रम की शुरुआत मंगलाचरण से होगी। इसके बाद चित्र अनावरण, दीप प्रज्ज्वलन, आचार्यश्री की संगीतमय पूजन-अर्चना, पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट तथा मुनिश्री के मंगल प्रवचन होंगे। विभिन्न धार्मिक कलशों की बोलियां एवं घोषणा भी की जाएगी।

महामहोत्सव में अमृत सिद्धि, सर्वार्थ सिद्धि एवं ऋद्धि-सिद्धि के तीन रजतमय कलश विशेष आकर्षण का केंद्र रहेंगे। इनके अलावा ज्ञानाराधना, दर्शनाराधना, चारित्राराधना, तपाराधना सहित सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक्चारित्र भक्ति कलश भी प्रमुख रहेंगे।

संतोष ही सबसे बड़ा धन, धर्म से विमुख न हो श्रावक – योगसागर जी महाराज

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज रने अपने प्रवचनों में त्नकरण्ड श्रावकाचार ग्रंथ की वाचना में आचार्य समन्तभद्र स्वामी के श्लोक नंबर 14 के माध्यम से अमूढ़ दृष्टि अंग पर देशना दी। बताया गया कि अमूढ़ दृष्टि वाला श्रावक परिस्थितियां कैसी भी हों, धर्म और आस्तिक भाव से विमुख नहीं होता तथा विवेकपूर्वक आत्मकल्याण के मार्ग पर चलता है। देशना में कहा कि मनुष्य की इच्छाएं असीमित हैं, जबकि शरीर की भूख सीमित है। लोभ और संग्रह के बजाय संतोष को जीवन का सबसे बड़ा धन मानना चाहिए। चींटी से संग्रह और हाथी से संतोष की सीख लेने का संदेश दिया गया। देव, शास्त्र और गुरु के प्रति दृढ़ आस्था तथा विवेक जागृत रखना ही सच्चे धर्म का आधार है।

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