पत्रकारों पर हमला: भारत में क्या हैं कानूनी प्रावधान, क्या मिलते हैं अधिकार और क्या हो सकती है सजा?
नई दिल्ली। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाने वाली पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य जनता तक निष्पक्ष और सत्य जानकारी पहुंचाना है। जब किसी पत्रकार पर हमला, धमकी, डराने-धमकाने या उसके काम में बाधा डालने की कोशिश की जाती है, तो इसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार पर भी असर डालता है।
भारत में फिलहाल पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कोई अलग राष्ट्रीय कानून लागू नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पत्रकारों पर हमले के मामलों में कार्रवाई नहीं होती। ऐसे मामलों में भारतीय संविधान, भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और अन्य प्रचलित कानूनों के तहत अपराध की प्रकृति के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाती है।
संविधान देता है प्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। यद्यपि संविधान में “प्रेस की स्वतंत्रता” शब्द का अलग से उल्लेख नहीं है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों में स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता इसी मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
इस अधिकार के अंतर्गत पत्रकारों को—
– समाचार एकत्र करने का अधिकार,
– समाचार प्रकाशित एवं प्रसारित करने का अधिकार,
– सरकार और सार्वजनिक संस्थाओं की आलोचना करने का अधिकार,
– जनहित से जुड़े मुद्दों को सामने लाने का अधिकार प्राप्त है।
हालांकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है और संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि, न्यायालय की अवमानना आदि आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
पत्रकार पर हमला होने पर कौन-कौन से अपराध बन सकते हैं?
यदि कोई व्यक्ति पत्रकार को उसके कार्य के दौरान रोकता है, मारपीट करता है, धमकी देता है या जानबूझकर नुकसान पहुंचाता है, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की जा सकती है। अपराध की गंभीरता के आधार पर निम्न प्रकार के मामले दर्ज हो सकते हैं—
– साधारण मारपीट या चोट पहुंचाना।
– गंभीर चोट पहुंचाना।
– जान से मारने की धमकी देना।
– आपराधिक डराना-धमकाना।
– गैरकानूनी जमावड़ा बनाकर हमला करना।
– दंगा या हिंसक भीड़ का हिस्सा बनना।
– सरकारी कार्य या विधि-सम्मत कार्य में बाधा उत्पन्न करना (यदि परिस्थितियां लागू हों)।
– संपत्ति को नुकसान पहुंचाना।
– महिला पत्रकार के मामले में यौन उत्पीड़न या महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े अतिरिक्त अपराध।
इन अपराधों में मामले की गंभीरता के अनुसार जुर्माना, कई वर्षों तक का कारावास और अत्यंत गंभीर मामलों में कठोर दंड का प्रावधान हो सकता है।
यदि कैमरा या उपकरण तोड़े जाएं
पत्रकार के कैमरे, मोबाइल, लैपटॉप, माइक्रोफोन, वाहन या अन्य उपकरणों को नुकसान पहुंचाना भी अलग आपराधिक अपराध हो सकता है। ऐसे मामलों में संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, चोरी, लूट या अन्य संबंधित अपराधों के तहत भी कार्रवाई की जा सकती है।
पत्रकार को धमकी देना भी अपराध
यदि किसी पत्रकार को खबर प्रकाशित या प्रसारित न करने के लिए धमकाया जाता है, जान से मारने की धमकी दी जाती है या दबाव बनाया जाता है, तो यह भी दंडनीय अपराध है। पुलिस ऐसे मामलों में आपराधिक धमकी और अन्य संबंधित प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज कर सकती है।
महाराष्ट्र में पत्रकार सुरक्षा का विशेष कानून
भारत में अभी राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकार सुरक्षा कानून नहीं है, लेकिन महाराष्ट्र उन राज्यों में शामिल है जहां पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून लागू किया गया है।
इस कानून के अनुसार—
– पत्रकार या मीडिया संस्थान पर हमला संज्ञेय अपराध माना जाता है।
– यह गैर-जमानती अपराध हो सकता है।
– दोषी को तीन वर्ष तक की कैद, 50 हजार रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों सजाएं दी जा सकती हैं।
इस कानून का उद्देश्य पत्रकारों को निर्भय होकर अपना कार्य करने का वातावरण उपलब्ध कराना है।
पत्रकार पर हमला होने पर क्या करें?
यदि किसी पत्रकार के साथ हमला या धमकी की घटना होती है तो उसे—
– तत्काल निकटतम पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करानी चाहिए।
– घटना के वीडियो, फोटो और अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने चाहिए।
– प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज कराने चाहिए।
– आवश्यकता होने पर चिकित्सीय परीक्षण (Medical Examination) कराना चाहिए।
– प्रेस संगठनों एवं संबंधित मीडिया संस्थान को सूचित करना चाहिए।
– गंभीर मामलों में उच्च अधिकारियों अथवा न्यायालय का भी सहारा लिया जा सकता है।
प्रेस की सुरक्षा क्यों आवश्यक है?
स्वतंत्र और सुरक्षित पत्रकारिता लोकतंत्र की आधारशिला है। यदि पत्रकार भयमुक्त होकर कार्य नहीं कर पाएंगे तो भ्रष्टाचार, अपराध, प्रशासनिक लापरवाही और जनहित से जुड़े अनेक मुद्दे जनता तक नहीं पहुंच पाएंगे। इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा केवल मीडिया का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के सूचना पाने के संवैधानिक अधिकार से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है।
निष्कर्ष
भारत में भले ही पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अभी तक अलग राष्ट्रीय कानून नहीं बनाया गया है, लेकिन संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा भारतीय न्याय संहिता के विभिन्न प्रावधान पत्रकारों को कानूनी संरक्षण प्रदान करते हैं। किसी पत्रकार पर हमला, धमकी या उसके कार्य में बाधा डालना एक गंभीर अपराध है और दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जा सकती है। विशेषज्ञ लंबे समय से देशभर में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय कानून बनाए जाने की आवश्यकता भी जताते रहे हैं, ताकि लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तंभ को और अधिक प्रभावी सुरक्षा मिल सके।






