बारां ।सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्च-स्तरीय समिति ने 21 जुलाई को एक PIB विज्ञप्ति जारी कर अरावली पर्वतमाला से जुड़े मामलों पर जनता से लिखित सुझाव आमंत्रित किए हैं। इसके जवाब में, 700 किलोमीटर लंबी अरावली के पर्यावरणविदों और ज़मीनी लोगों ने जन-परामर्श की इस प्रक्रिया पर गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि ईमेल और गूगल फॉर्म पर आधारित यह तंत्र उन ग्रामीण समुदायों को व्यावहारिक रूप से बाहर कर देता है जो अरावली से जुड़े निर्णयों से सबसे अधिक प्रभावित हैं — लेकिन जो ना पढ़े-लिखे हैं, ना ऑनलाइन तकनीक से परिचित हैं । साथ ही, 21 दिनों की समय-सीमा उनकी चिंताओं को अर्थपूर्ण तरीके से दर्ज कराने के लिए नितांत अपर्याप्त है।
दीवान सिंह, दिल्ली स्थित पर्यावरणविद और रिज बचाओ आंदोलन के संयोजक, ने कहा,
“ईमेल और गूगल फॉर्म पर आधारित यह प्रक्रिया संरचनात्मक रूप से शहरी और शिक्षित आवाज़ों के पक्ष में झुकी है — ना कि उन ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के, जो 700 किलोमीटर लंबी अरावली की गोद में रहते हैं और अपनी पहाड़ियों, जंगलों, जलस्रोतों, ओरणों, खेतों और चरागाहों की रोज़ होती तबाही देख रहे हैं। उच्च-स्तरीय समिति को अरावली के ग्रामीण समुदायों में जाना चाहिए और ज़मीनी हकीकत खुद देखनी चाहिए । हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में आज जितने भी अनुमति प्राप्त खनन पट्टे चल रहे हैं, उनमें से अधिकांश खुलेआम नियमों और मानदंडों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं — और इससे स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य और आजीविका को गहरी चोट पहुँच रही है। यह नुकसान सिर्फ ज़मीन पर जाकर और खनन-प्रभावित लोगों से मिलकर ही समझा जा सकता है। कोई लिखित प्रस्तुति उन लोगों की रोज़ की पीड़ा को दर्ज नहीं कर सकती जिनका वजूद अरावली की अच्छी सेहत पर टिका है।”
कुसुम रावत, राजस्थान की युवा भील आदिवासी नेत्री और अखिल भारतीय आदिवासी समन्वय मंच भारत की सदस्य, ने कहा,
“उच्च-स्तरीय समिति की यह ऑनलाइन प्रक्रिया ग्रामीण लोगों के लिए बनी ही नहीं है। अरावली की किसी बस्ती का आम इंसान ना तो एक जटिल ईमेल पता भर सकता है, न गूगल फॉर्म समझ सकता है — टाइपिंग की गलती के बिना सही जगह पहुँचाने की तो बात ही अलग है। और यह न्योता पहले गाँव तक पहुँचेगा कैसे? अगर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त यह समिति सच में ज़मीनी आवाज़ें सुनना चाहती है, तो पहले यह सुनिश्चित करे कि 5 राज्यों के 64 अरावली ज़िलों में स्थानीय भाषाओं में सार्वजनिक नोटिस — पंचायत भवनों, सामुदायिक केंद्रों, सरकारी स्कूलों और आँगनबाड़ियों में चिपकाए जाएँ, और रेडियो तथा ई-मित्र नेटवर्क के ज़रिए जानकारी फैलाई जाए, ताकि समुदाय के लोग अपनी बात दर्ज कराने की कोशिश कर सकें।”
लोकेश भिवानी, हरियाणा के पर्यावरणविद और स्टैंड विद नेचर के संस्थापक, ने कहा,
“अरावली क्षेत्र की गहराई में बसे विविध समुदायों की आवाज़ सुनने के लिए 21 दिन बिल्कुल अनुकूल नहीं हैं। इन समुदायों को किसी भी अर्थपूर्ण तरीके से इस प्रक्रिया में शामिल करना एक मैनुअल और समय-साध्य काम है — कोई शॉर्टकट नहीं है, और इस समय-सीमा में पर्याप्त आवाज़ें जुटा पाना सीधे असंभव है। उच्च-स्तरीय समिति को माननीय सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध करना चाहिए कि अपनी अंतिम रिपोर्ट जमा करने की समय-सीमा को 31 अगस्त 2026 से आगे बढ़ाया जाए। इससे समिति को ईमेल प्रस्तुतियों से आगे जाकर उन लोगों से समृद्ध, प्रामाणिक ज़मीनी डेटा जुटाने का मौका मिलेगा जो पीढ़ियों से इन पहाड़ियों के बीच रहते आए हैं। वरना समिति की रिपोर्ट, पिछली समिति की तरह, विश्वसनीयता से खाली रह जाएगी।”
प्रशांत पटनी, शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति के संयोजक, बारां ज़िला, दक्षिण-पूर्व राजस्थान, ने कहा,
“अरावली कभी अपरिभाषित नहीं थी। पीढ़ियों से यहाँ के स्थानीय समुदाय इस पर्वतमाला को उस सटीकता से जानते और पहचानते आए हैं जिसे कोई ऊँचाई-आधारित फॉर्मूला हासिल नहीं कर सकता। उच्च-स्तरीय समिति को किसी ज्यामितीय परिभाषा में उलझने के बजाय इन समुदायों के पास जाना चाहिए — उनकी सदियों पुरानी जानकारी और ज़मीनी सच्चाई के आधार पर अरावली की असली सीमाएँ समझनी चाहिए। अक्टूबर 2025 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के हलफनामे में सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी गई सूची से जो 27 ज़िले बाहर रखे गए हैं — उन ज़िलों के गाँव के लोग भी आपको वहाँ अरावली की मौजूदगी दिखा सकते हैं, जो आधिकारिक नक्शों में पूरी तरह गायब है। इन दौरों से समिति को पर्वतमाला के भीतर सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की भी पहचान होगी — ताकि उन्हें माननीय सर्वोच्च न्यायालय को दी जाने वाली अंतिम सिफारिशों में उचित संरक्षण दिया जा सके।”






