ग़ज़ल
शकूर अनवर
सितारों भरी कहकशाँ* कुछ नहीं है।
मुक़ाबिल* तेरे आसमाॅं कुछ नहीं है।।
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जहाँ मालो-ज़र* हो वहाँ चैन कैसा।
वहीं पर सुकूँ है जहाँ कुछ नहीं है।
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कहाँ से लिखूँ शेर हम्दो-सना* के।
न ताक़त क़लम में, ज़ुबाॅं* कुछ नहीं है।
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करूँ पार कैसे ॲंधेरों का जंगल।
कोई रास्ता कारवाॅं कुछ नहीं है।।
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अब आंखों में ऑंसू भी सूखे पड़े हैं।
इधर देख ज़ालिम यहाँ कुछ नहीं है।।
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मैं ज़ाहिर* में जो हूंँ वही मेरा बातिन*।
अयाॅं* मेरा सब कुछ निहाॅं” कुछ नहीं है।।
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न तेशा* न पर्बत न सेहरा* की ख़्वाइश।
यहाँ दिल में अब दास्ताँ कुछ नहीं है।।
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ये मन्दिर ये मस्जिद के झगड़ों को छोड़ो।
कि खाओ कमाओ मियाँ कुछ नहीं है।।
”
गले से मिले लोग धोका हैं जैसे।
ज़मीं से मिला आसमाॅं कुछ नहीं है।।
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सियासत के मारो यहाँ क्या मिलेगा।
यहाँ बस ग़ज़ल है यहां कुछ नहीं है।।
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मेरी आरज़ू इससे आगे है “अनवर”।
वतन के लिये जिस्मो-जाॅं कुछ नहीं है।।
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शब्दार्थ:-
कहकशाँ*आकाश गंगा
मुक़ाबिल*समक्ष
मालो-ज़र*धन दौलत
हम्दो-सना*ईश्वर की तारीफ में लिखा गया काव्य
जुबाॅं*भाषा
ज़ाहिर*प्रकट में
बातिन*अंतर्मन
अयाॅं*सामने
निहाँ* छुपा हुआ
तेशा*पत्थर तोड़ने का औजार
सहरा*रेगिस्तान
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शकूर अनवर
9460851271
ग़ज़ल -शकूर अनवर





