Wednesday, February 25, 2026
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ग़ज़ल -शकूर अनवर 

ग़ज़ल

शकूर अनवर

सितारों भरी कहकशाँ* कुछ नहीं है।

मुक़ाबिल* तेरे आसमाॅं कुछ नहीं है।।

*

जहाँ मालो-ज़र* हो वहाँ चैन कैसा।

वहीं पर सुकूँ है जहाँ कुछ नहीं है।

*

कहाँ से लिखूँ शेर हम्दो-सना* के।

न ताक़त क़लम में, ज़ुबाॅं* कुछ नहीं है।

*

करूँ पार कैसे ॲंधेरों का जंगल।

कोई रास्ता कारवाॅं कुछ नहीं है।।

*

अब आंखों में ऑंसू भी सूखे पड़े हैं।

इधर देख ज़ालिम यहाँ कुछ नहीं है।।

*

मैं ज़ाहिर* में जो हूंँ वही मेरा बातिन*।

अयाॅं* मेरा सब कुछ निहाॅं” कुछ नहीं है।।

*

न तेशा* न पर्बत न सेहरा* की ख़्वाइश।

यहाँ दिल में अब दास्ताँ कुछ नहीं है।।

*

ये मन्दिर ये मस्जिद के झगड़ों को छोड़ो।

कि खाओ कमाओ मियाँ कुछ नहीं है।।

गले से मिले लोग धोका हैं जैसे।

ज़मीं से मिला आसमाॅं कुछ नहीं है।।

*

सियासत के मारो यहाँ क्या मिलेगा।

यहाँ बस ग़ज़ल है यहां कुछ नहीं है।।

*

मेरी आरज़ू इससे आगे है “अनवर”।

वतन के लिये जिस्मो-जाॅं कुछ नहीं है।।

*

शब्दार्थ:-

कहकशाँ*आकाश गंगा

मुक़ाबिल*समक्ष

मालो-ज़र*धन दौलत

हम्दो-सना*ईश्वर की तारीफ में लिखा गया काव्य

जुबाॅं*भाषा

ज़ाहिर*प्रकट में

बातिन*अंतर्मन

अयाॅं*सामने

निहाँ* छुपा हुआ

तेशा*पत्थर तोड़ने का औजार

सहरा*रेगिस्तान

*

शकूर अनवर

9460851271

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