Tuesday, April 21, 2026
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श्रीमद्भगवद्‌गीता-कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 13/19 और 13/20

प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनाथ हैं……

भगवान कहते हैं की प्रकृति और पुरुष दोनों को ही तुम अनादि समझो और विकारों को तथा गुणों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न समझो । कार्य और करण के द्वारा होने वाली क्रियायो को उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही गई है और सुख दुखों के भोक्तापन में पुरुष हेतु कहा गया है ।

ज्ञान से मनुष्य शरीर क्षेत्र तथा शरीर के ज्ञाता, जीवात्मा तथा परमात्मा दोनों को जान सकता है । शरीर क्रिया क्षेत्र में क्षेत्र है और प्रकृति से निर्मित है । शरीर के भीतर कार्यों का भोग करने वाला आत्मा ही पुरुष या जीव है। इसके अतिरिक्त भी दूसरा ज्ञात होता है, जो परमात्मा है । यह समझना चाहिए कि परमात्मा तथा आत्मा एक ही भगवान की अभिन्न अभिव्यक्तियां हैं । जीवात्मा उनकी शक्ति है और परमात्मा उनका साक्षात अंश है। प्रकृति और जीव दोनों ही नित्य हैं । वह सृष्टि के पहले से विद्यमान हैं । यह भौतिक अभिव्यक्ति परमात्मा की शक्ति से है । आत्मा की दृष्टि से देखें तो सारे जीव एक समान हैं ।

 

गीता श्लोक 13/21

ऊंच नीच योनियों में जन्म लेने का कारण…

भगवान कहते हैं की प्रकृति में स्थित पुरुष अर्थात जीव ही प्रकृति जन्म गुणों का भोक्ता बनता है और गुणों का संग ही इसके उच्च नीच योनि में जन्म लेने का कारण बनता है।

वास्तव में पुरुष प्रकृति शरीर में स्थित है ही नहीं परंतु जब वह प्रकृति अर्थात शरीर के साथ तादात्म्य में करके शरीर को मैं और मेरा मान लेता है, तब वह प्रकृति में स्थित कहा जाता है । ऐसा प्रकृति में स्थित पुरुष ही अनुकूल परिस्थिति के आने पर सुखी होता है और प्रतिकूल परिस्थिति के आने पर दुखी होता है । यही पुरुष का प्रकृति जन्य गुणों का उपभोक्ता बनाना है ।

जिन योनियों में सुख की बहुलता होती है उसको सत् योनी कहते हैं और जिन योनियों में दुख की बहुलता होती है उसको सत् योनि कहते हैं । पुरुष का सत असत् योनियों में जन्म लेने का कारण संग ही है ।

 

: गीता श्लोक 13/22…

शरीर में भोक्ता कौन ?….

इस शरीर में एक अन्य दिव्य भोक्ता है, जो ईश्वर है, परम स्वामी है और साक्षी तथा अनुमति देने वाले के रूप में विद्यमान है,वही परमात्मा कहलाता है ।

जीवात्मा के साथ रहने वाला परमात्मा परम ईश्वर का प्रतिनिधि है । वह सामान्य जीव नहीं है । क्योंकि अद्वैतवादी चिंतक शरीर के ज्ञाता को एक मानते हैं । अतः उनके विचार से परमात्मा तथा जीवात्मा में कोई अंतर नहीं । भगवान कहते हैं कि वह प्रत्येक शरीर में परमात्मा रूप में विद्यमान है । वह जीवात्मा से भिन्न है और जीवात्मा से “पर” हैं, दिव्य हैं, जीवात्मा किसी विशेष क्षेत्र के कार्यों का भोक्ता है । लेकिन परमात्मा किसी सीमित उपभोक्ता के रूप में या शारीरिक कर्मों में भाग लेने वाले के रूप में विद्यमान नहीं रहता । वह परम भोक्ता के रूप में स्थित रहता है, उसका नाम परमात्मा है । वह दिव्या है । यह बिल्कुल स्पष्ट है कि आत्मा तथा परमात्मा भिन्न-भिन्न हैं ।

 

गीता श्लोक 13/23….

प्रकृति और पुरुष को तत्व से जानने का फल……..

भगवान कहते हैं कि इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य अलग-अलग जानता है, वह सब तरह का बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता ।

जो साधक इस तरह पुरुष को देह से, प्रकृति से संबंध रहित जान लेता है, वह फिर वर्ण आश्रम, पारिस्थिति आदि के अनुसार प्राप्त कर्तव्य कर्म को करता हुआ भी, पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता । जन्म होने में गुणों का संघ ही कारण है । भगवान साधक को अपना वास्तविक स्वरूप जानने के लिए सावधान करते हैं, जिससे वह अच्छी तरह जानने के लिए सावधान करते हैं । वह अच्छी तरह जान ले कि स्वरूप में कोई भी क्रिया नहीं है । अतः वह किसी भी क्रिया का करता नहीं है और करता न होने के कारण वह भोक्ता भी नहीं है ।

 

गीता श्लोक 13/24…

जन्म मरण से रहित होने के उपाय…….

 

भगवान कहते हैं कि कई मनुष्य ध्यानयोग द्वारा कई लोग सांख्ययोग के द्वारा और कई कर्मयोग के द्वारा अपने आप से, अपने आपमें परमात्म तत्व का अनुभव करते हैं ।

ध्यान में जिसकी जैसी रुचि, श्रद्धा, विश्वास और योग्यता है, उसके अनुसार ध्यान करके कई साधक अपने आप से, अपने आप में, परमात्म तत्व का अनुभव करते हैं । जो संबंध विच्छेद प्रकृति और पुरुष को अलग-अलग जानने से होता है, वह संबंध विच्छेद ध्यान से भी होता है ।

सांख्ययोग का नाम विवेक भी है अर्थात ज्ञान भी है । उस विवेक के द्वारा सत्य_: असत्य का निर्णय हो जाता है कि सत्य नित्य है, अचल है, अव्यक्त है, अचिंत्य है, स्थिर स्वभाव वाला है । जबकि असत्य चल है, अनित्य है, विकारी है, परिवर्तनशील है । ऐसे विवेक विचार से सांख्ययोगी प्रकृति और उसके कार्य में बिल्कुल अलग हो जाता है और अपने आप में परमात्मतत्व का अनुभव कर लेता है ।

 

: गीता श्लोक 13/25…

सद्वचन सुनकर भी मुक्ति पाई जा सकती है……..

भगवान कहते हैं कि दूसरे लोग इस प्रकार ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग आदि साधनों को नहीं जानते, परंतु दूसरों से अर्थात जीवन मुक्त महापुरुषों से सुनकर ही उपासना करते हैं । ऐसे वे, सुनने के अनुसार आचरण करने वाले, मनुष्य भी मृत्यु को तर जाते हैं ।

तत्व प्राप्ति की तीव्र इच्छा वाले कुछ पुरुष तो ऐसे हैं, जो ध्यानयोग, सांख्योग, कर्मयोग, हठयोग आदि साधनों को समझते ही नहीं । अतः वे साधन उनके अनुष्ठान में भी नहीं आते । ऐसे मनुष्य केवल तत्वज्ञ जीवन मुक्त महापुरुषों की आज्ञा का पालन करके मृत्यु को तर जाते हैं अर्थात तत्व ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं । जीवन मुक्त मनुष्यों की आज्ञा का पालन करके तत्व ज्ञान मिलता है । संत महापुरुषों की आज्ञा का पालन करने से उनके मन के, संकेत के, आज्ञा के अनुसार तत्परता पूर्वक चलने से मनुष्य स्वत उस परमात्मा तत्व को प्राप्त हो जाता है । परमात्मा तत्व केवल परमात्मा के अधीन होता है । शरीर के साथ संबंध रखने से ही मृत्यु होती है । जो महापुरुष की आज्ञा के पारायण होते हैं, उनका शरीर से माना हुआ संबंध टूट जाता है । अतः वह मृत्यु को तर जाते हैं ।

 

गीता श्लोक 13/26….

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से पैदा होना ही मृत्यु का कारण है…..

भगवान कहते हैं कि हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! स्थावर और जंगल जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सहयोग से उत्पन्न हुआ समझो ।

भगवान कहते हैं कि स्थिर रहने वाले लता, वृक्ष, पहाड़, आदि जितने भी स्थावर प्राणी हैं और चलने फिरने वाले मनुष्य,देवता, पशु, पक्षी, कीट, मछली, कछुआ आदि जितने भी जंगम प्राणी हैं, जैसे जलचर, थलचर, नभचर वे सबके सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से पैदा होते हैं ।

क्षेत्र तो उत्पत्ति और विनाशशील होता है और जो इस क्षेत्र को जानने वाला उत्पत्ति विनाशसील एवं सदा एक रस अर्थात एक समान रहने वाला है, वह क्षेत्रज्ञ है । उस क्षेत्रज्ञ का जो शरीर के साथ “मैं” और “मेरेपन” का संबंध मानना है, यही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का संयोग है । इस माने हुए संयोग के कारण ही इस जीव को स्थावर और जंगम योनियों में जन्म लेना पड़ता है । किसी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सहयोग को पहले भी गुणसंग पद से कहा गया है । तात्पर्य यह हुआ कि निरंतर परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृति के कार्य शरीर आदि के साथ तालमेल करने से स्वयं जीवात्मा भी अपने को जन्मने मरने वाला मान लेता है ।

 

गीता श्लोक 12/27…

जन्म मरण के चक्कर से छूटने का उपाय….

भगवान कहते हैं कि जो नष्ट होते हुए संपूर्ण प्राणियों में परमेश्वर को नाश रहित और समरूप से स्थित देखता है, वह वास्तव में सही देखता है ।

परमात्मा को सभी प्राणियों में सम कहने का तात्पर्य है कि सभी प्राणी विषम अर्थात स्थावर और जंगम हैं । सात्विक, राजस, तामस हैं, आकृति में छोटे बड़े, लंबे चौड़े हैं, नाना वर्ण वाले हैं,l । इन सब प्राणियों में परमात्मा समरूप से स्थित हैं । भगवान ने स्वयं कहा था कि अर्जुन तू सभी प्राणियों में क्षेत्रज्ञ मेरे को समझ । इसी कारण से यह कहा जा सकता है कि सभी प्राणियों में परमात्मा समरूप से विद्यमान हैं । प्रतीक्षण विनाश की तरफ जाने वाले प्राणियों में विनाश रहित सदा एक रूप से रहने वाले परमात्मा को सही देखा है । संसार में जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, वह सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से पैदा होते हैं । परंतु उन दोनों में, क्षेत्र हर समय बदलता रहता है । क्षेत्रज्ञ तो हमेशा एकसा रहता है । अतः क्षेत्रज्ञ से क्षेत्र का जो निरंतर वियोग हो रहा है, साधक या पुरुष उसका अनुभव कर ले अर्थात उसके साथ अपनी एकात्मता अनुभव कर ले ।

 

गीता श्लोक 13/28

तू केवल अविनाशी परमात्मा को देख………..

भगवान कहते हैं कि…. क्योंकि सब जगह समरूप से स्थित, ईश्वर को समरूप से देखने वाला, मनुष्य अपने आप से, अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिए वह परम गति को प्राप्त होता है ।

जो मनुष्य स्थावर जंगम, जड़ चेतन, प्राणियों में, उच्च नीच योनियों में, तीनों लोकों में, सामान रूप से परिपूर्ण परमात्मा को देखता है, वह अपने द्वारा, अपनी हत्या नहीं करता । वह तो परमात्मा के साथ अपनी अभिन्नता महसूस करता है अर्थात भगवान का सानिध्य महसूस करता है ।

शरीर के साथ तालमेल करके जो ऊंच नीच योनियों में भटकता था, बार-बार जनमत मरता था, वह परमात्मा के साथ अपनी अभिन्नता अर्थात लगाव अर्थात सानिध्य का अनुभव कर लेता है, तब वह परम गति को अर्थात नित्य प्राप्त भगवान को प्राप्त कर लेता है । मोह नहीं होगा तो संसार नहीं दिखेगा वरन एक परमात्मा तत्व ही दिखेगा अर्थात वासुदेव ही सब जगह हैं ऐसा दिखेगा ।

 

गीता श्लोक 13/29…

ऐसा लगता है सब कुछ प्रकृति ही कर रही है….

भगवान कहते हैं कि जो संपूर्ण क्रियाओ को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपने आप को करता देखता है, वही यथार्थ देखता है ।

यद्यपि प्रकृति के सक्रिय और अक्रिय दो अवस्थाओं वाली (अर्थात सर्ग अवस्था में सक्रिय और प्रलय अवस्था में अक्रिय) कहते हैं । फिर भी सूक्ष्म रूप से विचार करें तो, प्रलय अवस्था में भी उसकी क्रियाशीलता मिटती नहीं है । क्योंकि जब प्रलय का आरंभ होता है तब, प्रकृति सर्ग अवस्था की तरफ चलती है । इस प्रकार प्रकृति में सूक्ष्म क्रिया चलती रहती है । प्रकृति की सूक्ष्म क्रिया को अक्रिय अवस्था कहते हैं । क्योंकि इस अवस्था में सृष्टि की रचना नहीं होती । परंतु महा सर्ग में जब सृष्टि की रचना होती है तब, सर्ग आरंभ से सर्ग के मध्य तक, प्रकृति सर्ग अवस्था की तरफ चलती है और स्वर्ग का मध्य भाग आने पर, प्रकृति प्रलय की तरफ चलती है ।

इस प्रकार प्रकृति की स्थल क्रिया को सक्रिय अवस्था कहते हैं । अगर प्रलय और महाप्रलय में प्रकृति को अक्रिय माना जाए तो, प्रलय महाप्रलय का आदि, मध्य और अंत कैसे होगा । यह तीनों प्रकृति में सूक्ष्म क्रिया होने से ही होते हैं । अतः सर्ग की अपेक्षा प्रलय अवस्था में अपेक्षाकृत अक्रियता है । सर्वथा पूरी तरह अक्रिय नहीं है । क्रियाशील प्रकृति के साथ जब यह पुरुष संबंध बना लेता है तब, शरीर द्वारा होने वाली स्वाभाविक क्रियाएं, तालमेल के कारण अपने में प्रतीत होने लगती हैं ।

 

गीता श्लोक 13/30…

साधक भी ब्रह्म को प्राप्त होता है

 

भगवान कहते हैं कि जिस काल में साधक प्राणियों के अलग-अलग भावों को एक प्रकृति में ही स्थित देखता है और उस प्रकृति से विस्तार देखता है उस काल में, वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।

जिस काल में साधक संपूर्ण प्राणियों के अलग-अलग भावों को अर्थात त्रिलोक में जितने जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज प्राणी पैदा होते हैं, उन प्राणियों के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को एक प्रकृति में ही स्थित देखता है, उस काल में वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।

त्रिलोक में स्थावर, जंगम प्राणियों के शरीर, नाम, रूप, आकृति आदि सब, एक प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं । सभी प्राणियों के शरीर प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृति में ही स्थित रहते हैं, और प्रकृति में ही विलीन हो जाते हैं । इस प्रकार देखने वाला, ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है अर्थात वह अपने स्वरूप परमात्मा तत्व को प्राप्त हो जाता है ।

 

गीता श्लोक 13/31…

पुरुष भी परमात्मा स्वरूप ही है..

 

भगवान कहते हैं कि हे कुंती नंदन अर्जुन! यह पुरुष स्वयं अनादि होने से और गुणों से रहित होने से अविनाशी परमात्मा स्वरुप ही है । यह शरीर में रहता हुआ भी न करता है और ना लिप्त होता है ।

प्रकृति अनादि तो है, परंतु वह गुणों से रहित नहीं है । वरन गुणों और विकारों वाली है । उसे सात्विक, राजस और तामस यह तीनों गुण तथा विकार पैदा होते हैं । परंतु इन तीनों गुणों और विकारों से सर्वथा रहित निर्गुण और निर्विकार है । ऐसा यह पुरुष साक्षात अविनाशी परमात्मा स्वरुप ही है अर्थात पुरुष विनाश रहित परम शुद्ध आत्मा है ।

 

गीता श्लोक 13/32

आत्मा किसी भी देह में लिप्त नहीं होता ..

 

भगवान कहते हैं कि जैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यंत सूक्ष्म होने से कहीं भी लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह पर पूर्ण आत्मा किसी भी देह में लिप्त नहीं होता ।

कर्म करने के बाद ही उस कर्म के फल का भोग होता है । फिर भी मनुष्य जो कुछ भी करता है पहले किसी फल सिद्धि का उद्देश्य मन में रखकर ही करता है । अतः मन में पहले भोग तत्व अर्थात भोग की इच्छा आती है, फिर उसके अनुसार कार्य करता है अर्थात बाद में कर्तव्य आता है । इस दृष्टि से भगवान यहां सबसे पहले फल इच्छा का त्याग होने पर क्रिया करने पर कृतित्व नहीं होता । जिस प्रकार आकाश, वायु आदि चारों भूतों में रहता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह सब शरीरों में रहने वाला आत्मा किसी भी शरीर में लिप्त नहीं होता ।

 

गीता श्लोक 13/33….

आत्मा संपूर्ण शरीर को प्रकाशित करता है ।

भगवान कहते हैं कि हे भरत वंश के उद्भव अर्जुन ! जैसे एक ही सूर्य इस संपूर्ण संसार को प्रकाशित करता है, ऐसे ही क्षेत्रज्ञ अर्थात आत्मा संपूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है ।

आंखों में दिखाई देने वाले इस संपूर्ण संसार को, संसार के पदार्थ को, एक सूर्य ही प्रकाशित करता है । संसार की सब क्रियाएं सूर्य के प्रकाश के अंतर्गत होती हैं । परंतु सूर्य, “मैं सबको प्रकाशित करता हूं” ऐसा नहीं सोचता । संसार में जो कुछ भी चंद्रमा, तारे, अग्नि, जड़ी, बूटी आदि में प्रकाश है । वह सब सूर्य का ही है । सूर्य की तरह एक ही क्षेत्रीय अर्थात क्षेत्रज्ञ आत्मा संपूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है । परंतु क्षेत्रीय अर्थात सूर्य उन क्रियायो को करने, करवाने में कारण बनता है । सूर्य तो केवल संसार को प्रकाशित करता है और उसके प्रकाश में समस्त संसार की क्रियाएं होती हैं । परंतु क्षेत्रीय केवल संसार को ही प्रकाशित नहीं करता, वरन उसमें स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों की संपूर्ण क्रियाएं होती हैं ।

 

गीता श्लोक 13/34…

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को जानने का फल….

भगवान कहते हैं कि इस प्रकार जो ज्ञान रूपी नेत्रों से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभाग को तथा कार्य, कारण सहित प्रकृति से स्वयं को अलग जानते हैं, वह परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं ।

संतो, महापुरुषों, ब्रह्म ज्ञानियों, के अनुसार ज्ञान मार्ग विवेक से आरंभ होता है और वास्तविक विवेक अर्थात ज्ञान होने पर प्रकृति से सर्वथा संबंध विच्छेद होकर स्वत सिद्ध परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है । सत्य _असत्य, नित्य _अनित्य, क्षेत्र_ क्षेत्रज्ञ को अलग-अलग जानने का नाम ज्ञान चक्षु अर्थात विवेक है । यह क्षेत्र विकारी है, कभी एक रूप नहीं रहता । यह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है, परंतु क्षेत्र में रहने वाला आत्मा, इसको जानने वाला क्षेत्रज्ञ, सदा एक रूप रहता है । क्षेत्रज्ञ में न परिवर्तन हुआ है और ना होगा और ना होना ही संभव है । इस तरह जानना, अनुभव करना, ज्ञान चक्षु से क्षेत्र _क्षेत्रज्ञ के विभाग को जानना ही क्षेत्र की ही परमात्मा से विमुख होकर भिन्नता मानी है और क्षेत्र के सम्मुख होकर क्षेत्र से एकता मानी है । इसलिए परमात्मा से एकता और क्षेत्र से सर्वथा भिन्नता दोनों बातों का कहना जरूरी है ।

 

गीता अध्याय_ 14….

गुणत्रय विभाग योग…

श्लोक _ 14/01….

उत्तम और श्रेष्ठ ज्ञान को मैं फिर कहूंगा_ _

भगवान बोले संपूर्ण ज्ञानों में उत्तम और श्रेष्ठ ज्ञान को मैं फिर कहूंगा, जिसको जानकर सबके सब मुनि लोग इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्ध को प्राप्त हो गए हैं ।

लौकिक और पारलौकिक ज्ञानों में भाषाओं, लिपियो, और कलाओं का ज्ञान है । उनमें सबसे अधिक प्रकृति, पुरुष का भेद बताने वाला, प्रकृति से अतीत करने वाला, परमात्मा की प्राप्ति करने वाला, यह ज्ञान, जो भगवान बता रहे हैं, श्रेष्ठ है एवं सर्वोत्कृष्ट है । इसके समान दूसरा कोई ज्ञान है ही नहीं, हो ही नहीं सकता, होना संभव भी नहीं है, क्योंकि दूसरे ज्ञान सभी फसाने वाले हैं अर्थात बंधन में डालने वाले हैं । भगवान द्वारा बताए जाने वाला यह ज्ञान, प्रकृति और उसके संसार शरीर से संबंध विच्छेद करने वाला होने से श्रेष्ठ है ।

 

: गीता श्लोक 14/02…

सधर्मता को प्राप्त पुरुष व्यथित नहीं होते….

भगवान कहते हैं कि इस ज्ञान का आश्रय लेकर मनुष्य मेरे सधर्मता को प्राप्त हो जाते गए हैं । वह महासर्ग में भी पैदा नहीं होते और महाप्रलय में भी व्यथित नहीं होते ।

पूर्व श्लोक 14 /01 में वर्णित ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे सानिध्य को प्राप्त हो जाते हैं । ज्ञानी महापुरुष भगवान के समान निर्मित निर्विकार तो हो जाते हैं,परंतु वे भगवान के समान संसार की उत्पत्ति, पालन और संहार का कार्य नहीं कर सकते हैं । हां योगाभ्यास के बल से किसी योगी में कुछ सामर्थ्य आ जाती है, परंतु वह सामर्थ्य भी भगवान की सामर्थ्य के समान नहीं होती क्योंकि वह यूंजान योगी है अर्थात उसने अभ्यास करके सामर्थ्य प्राप्त की है । परंतु भगवान युक्त योगी हैं अर्थात भगवान में सामर्थ हमेशा से स्वत सिद्ध है । भगवान सब कुछ करने में समर्थ हैं । योगी की सामर्थ्य तो सीमित होती है, परंतु भगवान की सामर्थ्य असीम होती है ।

 

गीता श्लोक 14/03…

मेरे द्वारा गर्भ स्थापन से सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है.

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भगवान कहते हैं कि हे भरत वंश के उद्भव अर्जुन ! मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्ति स्थान है और मैं उसमें जीव रूप गर्भ का स्थापना करता हूं । उससे संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है ।

इस श्लोक में मूल प्रकृति को महदब्रह्म कहा गया है । ऐसा कहने के कई कारण हो सकते हैं जैसे_

एक_ परमात्मा छोटेपन और बड़ेपन से रहित हैं । अतः सूक्ष्म से सूक्ष्म भी और महान से महान भी हैं परमात्मा के सिवाय संसार में सबसे बढ़कर कोई व्यापक तत्व नहीं है । इसलिए मूल प्रकृति को महदब्रह्म कहा गया है दो _ महत् अर्थात समबुद्ध और ब्रह्म अर्थात परमात्मा, भगवान, प्रभु, के बीच में होने से मूल प्रकृति को महतब्रह्म कहा गया है तीन _ ब्रह्मा जी का महा सर्ग (ब्रह्मा जी का प्रकट होना) और प्रलय (ब्रह्मा जी का लीन होना) सिद्ध करने के लिए महदब्रह्म शब्द दिया गया है ।

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