गीता श्लोक 13/05…
क्षेत्र के रूप और विकार….
भगवान कहते हैं की मूल प्रकृति और समस्त बुद्ध महत्व समझती अहंकार पंच महाभूत और 10 इंद्रियां एक मन तथा पांचो इंद्रियों के पांच विभाग अर्थात विषय यह 24 तत्वों का क्षेत्र अर्थात शरीर है ।
एक_ मूल प्राकृतिक
दो_ बुद्धि
तीन_ अहंकार
4_ 5 महाभूत
5 _ 10 इंद्रियां, एक मन
6_ पांचो इंद्रियों के विषय
यह 24 तत्वों वाला क्षेत्र अर्थात शरीर है ।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, यह पंच महाभूत हैं । एक-एक महाभूत के पांच विभाग होकर जो मिश्रण बनता है _उसको पंजीकृत महाभूत कहते हैं । इन पांच महाभूतों के विभाग न होने पर इनको अपांचीकृत महाभूत कहते हैं ।
10 इंद्रियां एक मन और शब्द आदि पांच विषयों के कारण होने से, यह महाभूत प्रकृति हैं और अहंकार के कार्य होने से यह विकृति हैं । अतः यह पंच महाभूत प्रकृति भी हैं और विकृति भी हैं । स्त्रोत्र, त्वचा,नेत्र, रसना और घ्राण यह पांच ज्ञानेंद्रिय हैं तथा वाक, वाणी, पाद, उपस्थ और पायु, यह पांच कर्मेंद्रियां हैं ।
गीता श्लोक 13/06…..
क्षेत्र का स्वरूप……
भगवान कहते हैं कि इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात अर्थात शरीर, चेतना अर्थात प्राण शक्ति और धृति, इन विकारों सहित यह क्षेत्र संक्षेप से कहा गया है ।
इच्छा क्या है ? अमुक वस्तु व्यक्ति परिस्थिति आदि मिले, ऐसी जो मन में चाहना है, उसको इच्छा कहते हैं । इच्छा मूल विकार है। ऐसा कोई पाप और दुख नहीं है, जो सांसारिक इच्छाओं से पैदा ना हुआ हो । सभी पाप और दुख सांसारिक इच्छाओं से ही पैदा होते हैं ।
अहंकार ….अहंकार को यहां भाव भी कहते हैं । पंच महाभूत का कारण होने से यह अहंकार प्रकृति है और बुद्धि का कार्य होने से यह विकृति है ।
महाभूत ….पृथ्वी,जल, तेज, वायु और आकाश, यह पंच महाभूत हैं । 24 तत्वों से बने हुए शरीर रूपी समूह का नाम संघात भी है । इसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है । चेतन को प्राण शक्ति भी कहते हैं । चेतना में भी परिवर्तन होता रहता है ।
धृति …..धृति का नाम धारण शक्ति भी है । यह धृति अर्थात धारण शक्ति भी बदलती रहती है । मनुष्य कभी धैर्य को धारण करता है और कभी प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य को छोड़ देता है । कभी धैर्य अधिक रहता है, कभी धैर्य काम हो जाता है, ऐसा बदलता रहता है ।
गीता श्लोक 13(07…..
ज्ञान के साधन …….
भगवान ने कहा है कि अपने में श्रेष्ठ का भाव होना चाहिए । दिखावटीपन नहीं होना चाहिए । अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, बाहर भीतर की शुद्धि और मन का हृदय में होना अर्थात स्थिर होना।
अमानित्व_ अपने को श्रेष्ठ, सामान्य, पूज्य या बहुत बड़ा समझना एवं मान बढ़ाई, प्रतिष्ठा, पूजा आदि की इच्छा करना, यह मानित्व है, परंतु इन सब का नहीं होना ही अमानित्व है ।
अहिंसा_ किसी भी प्राणी को मन या शरीर से किसी प्रकार भी कष्ट न देना । मन से किसी का बुरा न चाहना । वाणी से किसी को गाली न देना । कठोर वचन न कहना । शरीर से किसी को न मारना । हानि न पहुंचाना,यह सब अहिंसा के भाव हैं । इनके सर्वथा अभाव का नाम हिंसा है । जिस साधक में अहिंसा का भाव आ जाता है, उसका किसी के प्रति वैर भाव नहीं रहता ।
आर्जवम _ मन, वाणी और शरीर की सरलता का नाम आर्जवम है । जिस साधक में यह भाव आ जाता है, उसमें कुटिलता का सर्वथा अभाव हो जाता है ।
गीता श्लोक 13/08….
ज्ञान के साधन …..
भगवान कहते हैं कि इंद्रियों के विषय में वैराग्य का होना, अहंकार भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियों में दुख रूप दोषों को बार-बार देखना_____
भगवान कहते हैं कि इस लोक और परलोक के जितने भी शब्द, रूप, स्पर्श,रस और गंध रूप विषय पदार्थ है, अतःकरणऔर इंद्रियों द्वारा जिनका भोग किया जाता है और अज्ञान के कारण जिनको मनुष्य सुख के कारण समझता है, किंतु वास्तव में जो दुख के कारण हैं, उन सब में प्रीति का सर्वथा अभाव हो जाना इंद्रियों के विषय में वैराग्य हो जाना है ।
जन्म का कष्ट सहन नहीं होता । असहाय जीवन को पहले माता के गर्भ में बहुत सारे कष्ट सहन करने पड़ते हैं । फिर जन्म के समय भी बहुत कष्ट उठाना पड़ता है ।अनेक प्रकार की योनियों में बार-बार जन्म लेने से जो दुख होता है । उसे जन्म दुख कहते हैं । मृत्यु के समय भी महान कष्ट होता है । जीवो को यह जन्म, मृत्यु,जरा,व्याधि प्राप्त होते हैं । यह इनके कारण हैं, अपने किए हुए पाप कर्म ।
गीता श्लोक 13/09…..
ज्ञान के साधन………..
भगवान कहते हैं कि आशक्ति रहित होना,पुत्र, स्त्री, घर आदि में एकात्मता अर्थात घनिष्ठ संबंध न होना और अनुकूलता या प्रतिकूलता की प्राप्ति में चित्त अर्थात मन का नित्य सम रहना…..
भगवान कहते हैं कि उत्पन्न होने वाली सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, घटना, स्थिति, आदि में जो प्रियता है, उसे शक्ति कहते हैं उसे शक्ति से रहित होने का नाम सत्य है अनुकूल व्यक्त क्रिया घटना और पदार्थ का सहयोग और प्रतिकूलता का वियोग सब को “इष्ट” है अर्थात अच्छा लगता है । इसी प्रकार अनुकूल का वियोग और प्रतिकूल का सहयोग “अनिष्ट” है अर्थात यह अच्छा नहीं लगता । इन इष्ट और अनिष्ट के साथ संबंध होने पर हर्ष,अशोक आदि का न होना अर्थात अनुकूल के सहयोग और प्रतिकूल के वियोग से चित्त में हर्ष आदि न होना तथा प्रतिकूल के सहयोग और अनुकूल पर वियोग से किसी प्रकार के शोक भय और क्रोध आदि का न होना, सदा ही निर्विकार एक रस रहना, इसको इष्ट और अनिष्ट पति में समचित्तता कहते हैं ।
गीता श्लोक 13/10…..
ज्ञान के साधन….
भगवान कहते हैं कि मुझ में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति का होना, एकांत स्थान में रहने का स्वभाव होना और जन समुदाय में प्रीति का होना………
संसार का आश्रय लेने के कारण साधक का देहाभिमान बना रहता है । यह देहाभिमान अव्यक्त के ज्ञान में मुख्य बाधा है । इसी बाधा को दूर करने के लिए भगवान तत्वज्ञान का उद्देश्य रखकर अनन्य योग द्वारा अपनी अव्यभिविचारणी भक्ति करने का साधन बता रहे हैं । क्योंकि भक्ति रूपी साधन से भी देहाभिमान सुगमता पूर्वक दूर हो सकता है ।
अपना संबंध केवल भगवान से हो, किसी दूसरे के साथ बिल्कुल भी अपना संबंध न हो, यह भगवान में विशेष भक्ति होना है ।मैं एकांत में रहकर परमात्मा तत्व का चिंतन करूं, भजन करूं, स्मरण करूं, शास्त्रों का अध्ययन करूं, मेरे साधन में कोई बाधा न आए, मेरे साधन में कोई साथ न रहे, मैं किसी के साथ न रहूं, साधक की ऐसी स्वाभाविक अभिलाषा का नाम “विविक्त देश सेवित्व” है ।
गीता श्लोक 13/11…
ज्ञान से जानने योग्य….
भगवान कहते हैं कि जो ज्ञेय अर्थात पूर्वोक्त ज्ञान से जानने योग्य है, उस परमात्म तत्व को मैं अच्छी तरह से कहूंगा, जिसको जानकर मनुष्य अमृत तत्व का अनुभव कर लेता है । वह ज्ञेय तत्व अनादि वाला और परम ब्रह्म है । उसको न सत कहा जा सकता है और न असत ही कहा जा सकता है ।
भगवान यहां जानने योग्य तत्व के वर्णन का उपक्रम करते हुए, प्रतिज्ञा करते हैं, कि जिसकी प्राप्ति के लिए ही मनुष्य शरीर मिला है, उसे प्रपनीय तत्वों का मैं विस्तार से वर्णन करूंगा । संसार में जानने योग्य एक परमात्मा ही है, उस प्रपनीय तत्व का मैं विस्तार से वर्णन करूंगा । सांसारिक विषयों को कितना ही जान लें, फिर भी जानना शेष ही रहेगा । संसार की जानकारी में जन्म मरण भी मिटेगा नहीं । परंतु परमात्मा को तत्व से अर्थात ठीक-ठाक जान लेने पर जानना बाकी नहीं रह जाएगा । साथ ही जन्म _ मरण का चक्कर भी खत्म हो जाएगा । संसार में परमात्मा के अतिरिक्त जानने योग्य और कुछ है ही नहीं । परमात्मा तत्व को यह कहने का तात्पर्य है कि वह तत्व जान ने योग्य है । उसको जानना चाहिए और वह जाना जा सकता है ।
गीता श्लोक 13/13
परमात्मा सबको व्याप्त करके स्थित हैं …
भगवान कहते हैं कि वह परमात्मा सब जगह हाथों और पैरों वाले, सब जगह नेत्रों और मुखो वाले तथा सब जगह कानों वाले हैं । वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित हैं ।
भक्त जहां कहीं भगवान के चरणों में चंदन लगाना चाहता है और पुष्प चढ़ना चाहता है, नमस्कार करना चाहता है, उसी स्थान पर भगवान के चरण मौजूद हैं । हजारों, लाखों भक्त एक ही समय में भगवान के चरणों की अलग-अलग पूजा करना चाहें, तो उसके भाव के अनुसार वहां भगवान के चरण मौजूद हैं । भक्त भगवान को जहां पर दीपक दिखता है आरती करता है, वहीं भगवान के नेत्र मौजूद हैं, जो भगवान को सब जगह देखता है, भगवान भी उसकी दृष्टि से कभी ओझल नहीं होते । जहां पर भी भगवान के मस्तक पर चंदन लगाना चाहे वहां ही भगवान का मस्तिष्क मौजूद है । जहां भगवान को भोग लगाना चाहे, वही भगवान का मुख मौजूद है अर्थात ___
चहुं दिसि आरति चहुं दिसि पूजा, चहुं दिस राम और नहीं दूजा ।।
गीता श्लोक 13/14…
भगवान सर्व समर्थ हैं ….
भगवान कहते हैं कि वह परमात्मा संपूर्ण इंद्रियों से रहित हैं और संपूर्ण इंद्रियों के विषयों को प्रकाशित करने वाले हैं । आसक्ति रहित हैं और संपूर्ण संसार का भरण पोषण करने वाले हैं तथा गुणों से रहित हैं और संपूर्ण गुणों के भोक्ता हैं ।
किसी वस्तु का दूर और पास होना, तीन दृष्टियों से कहा जाता है__
एक _ देशकृत,
दूसरा_ कालकृत और
तीसरा _ वस्तुकृत
परमात्मा तीनों ही दृष्टियों से दूर भी है और पास भी है । परमात्मा एक ही देश में दूर भी है और पास भी है अर्थात पूरे देश अर्थात सभी स्थानों पर सब जगह परमात्मा हैं। इसलिए साधक को सांसारिक भोग संग्रह की इच्छा का त्याग करके केवल परमात्मा प्राप्ति की अभिलाषा जागृत करनी चाहिए । परमात्म तत्व की प्राप्ति की परीक्षा होते हो ही परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है । वह परमात्मा अत्यंत सूक्ष्म होने से इंद्रियों और अंतःकरण का विषय नहीं है । जीवों के अज्ञान के कारण, वह परमात्मा जानने में नहीं आते । जिनको परमात्मा का ज्ञान नहीं है, उनको परमात्मा देखने में नहीं आते । परंतु जिनको परमात्मा का ज्ञान हो गया है, उन्हें सर्वत्र ही परमात्मा नजर आते हैं।
गीता श्लोक 13/15…
भगवान अत्यंत सूक्ष्म हैं ……
भगवान कहते हैं कि वे परमात्मा संपूर्ण प्राणियों के बाहर और भीतर परिपूर्ण हैं और चर एवं अचर प्राणियों के रूप में भी वे ही हैं तथा दूर से दूर तथा पास से पास भी वही हैं और वह अत्यंत सूक्ष्म होने से जानने में नहीं आते ।
किसी वस्तु का दूर होना और पास होना तीन दृष्टियों में कहा जाता है__
एक _ देशकृत,
दूसरा_ कालकृत और
तीसरा _ वस्तुकृत
परमात्मा तीनों ही दृष्टियों से पास भी हैं और दूर भी हैं । परमात्मा एक ही देश में पास भी हैं और दूर भी हैं अर्थात पूरे देश अर्थात सभी स्थानों पर, सब जगह परमात्मा हैं । इसलिए साधक को संसार के भोग संग्रह की इच्छा का त्याग करके केवल परमात्मा प्राप्ति की अभिलाषा जागृत करनी चाहिए । परमात्मा तत्व की प्राप्त की तीव्र अभिलाषा होते ही परमात्मा की प्राप्त हो जाती है ।
परमात्मा अत्यंत सूक्ष्म होने से इंद्रियों और अंतःकरण का विषय नहीं हैं। जीवों के अज्ञान के कारण, वह परमात्मा जानने में नहीं आते । जिनको परमात्मा का ज्ञान नहीं है, उनको परमात्मा देखने में नहीं आते । परंतु जिनको परमात्मा का ज्ञान हो गया है, उन्हें सर्वत्र परमात्मा नजर आते हैं ।
गीता श्लोक 13/16
भगवान सबका पालन पोषण करते हैं…….
भगवान कहते हैं कि वह परमात्मा स्वयं विभाग रहित होते हुए भी, संपूर्ण प्राणियों में विभक्त की तरह स्थित और वह जानने योग्य परमात्मा ही संपूर्ण प्राणियों को उत्पन्न करने वाले तथा उनका भरण पोषण करने वाले और संहार करने वाले हैं।
परमात्मा तो स्थावर जंगम सभी प्राणियों में है और वह स्वयं विभाग रहित हैं । परमात्मा विभिन्न प्राणियों के शरीरों की उपाधियों से अलग-अलग दिखाई देते हैं हुए भी, तत्व से एक ही हैं । चेतन तत्व अर्थात् परमात्मा एक ही है । वह ही परमात्मा रजोगुण की प्रधानता स्वीकार करने से ब्रहमा रूप से सबको उत्पन्न करते हैं । Mसत्यगुन की प्रधानता स्वीकार करने से विष्णु रूप में सबका भरण पोषण करने वाले और तमोगुण की प्रधानता होने पर शिव रूप से अर्थात रूद्र रूप से संघार करने वाले हैं ।
गीता श्लोक 13/17
परमात्मा सब के हृदय में विराजमान हैं……
भगवान कहते हैं कि परमात्मा संपूर्ण ज्योतियो के भी ज्योति और अज्ञान से अत्यंत पर कहे गए हैं । वे ज्ञान स्वरूप, जानने योग्य, ज्ञान से प्राप्त करने योग्य और सबके हृदय में विराजमान हैं ।
भगवान कहते हैं कि जिससे प्रकाश मिलता है, वह सभी ज्योति हैं, क्योंकि प्रकाश का नाम ज्योती भी है । अतः भगवान ही प्रकाश के स्रोत हैं । शब्द की ज्योती कान है । शीत, उष्ण, कोमल, कठोर आदि के स्पर्श का ज्ञान त्वचा से होता है, अतः स्पर्श की ज्योति त्वचा है । अनेक रंग, रूपों का ज्ञान नेत्रों से होता है । अतः रूप की ज्योति नेत्र हैं । अनेक स्वादों का पता जीव से लगता है, अतः रस की ज्योति जीभ है । सुगंध, दुर्गंध का ज्ञान नाक से होता है। अतः गंध की ज्योति नाक है । इंद्रियों की ज्योति बुद्धि है । बुद्धि की ज्योती स्वयं है तथा स्वयं की ज्योती परमात्मा है । परमात्मा में कभी भी अज्ञान नहीं आता m वह स्वयं ज्ञान रूप है, अतः उस परमात्मा को ज्ञान अर्थात ज्ञान स्वरूप कहा गया है ।
गीता श्लोक 13/18
मेरा भक्त मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है…….
भगवान कहते हैं कि क्षेत्र तथा ज्ञान और जानने योग्य को संक्षेप में कहा गया है। मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है ।
भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त क्षेत्र को साधन समुदाय रूप ज्ञान को और दिए या तत्व अर्थात् परमात्मा को तत्व से जानकर मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है। क्षेत्र को ठीक तरह से जान लेने पर क्षेत्र से संबंध विच्छेद हो जाता है । ज्ञान को ठीक तरह से जानने से अपने से देहाभिमान मिट जाता है । यह तत्व को ठीक तरह से जान लेने पर उसकी प्राप्ति हो जाती है । परमात्मा का संपूर्ण ज्ञान भक्ति से ही हो सकता है । वह कहता है कि साधक को भक्त हो जाना चाहिए ।
गीता श्लोक 13/19 और 13/20
प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनाथ हैं……
भगवान कहते हैं की प्रकृति और पुरुष दोनों को ही तुम अनादि समझो और विकारों को तथा गुणों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न समझो । कार्य और करण के द्वारा होने वाली क्रियायो को उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही गई है और सुख दुखों के भोक्तापन में पुरुष हेतु कहा गया है ।
ज्ञान से मनुष्य शरीर क्षेत्र तथा शरीर के ज्ञाता, जीवात्मा तथा परमात्मा दोनों को जान सकता है । शरीर क्रिया क्षेत्र में क्षेत्र है और प्रकृति से निर्मित है । शरीर के भीतर कार्यों का भोग करने वाला आत्मा ही पुरुष या जीव है। इसके अतिरिक्त भी दूसरा ज्ञात होता है, जो परमात्मा है । यह समझना चाहिए कि परमात्मा तथा आत्मा एक ही भगवान की अभिन्न अभिव्यक्तियां हैं । जीवात्मा उनकी शक्ति है और परमात्मा उनका साक्षात अंश है। प्रकृति और जीव दोनों ही नित्य हैं । वह सृष्टि के पहले से विद्यमान हैं । यह भौतिक अभिव्यक्ति परमात्मा की शक्ति से है । आत्मा की दृष्टि से देखें तो सारे जीव एक समान हैं ।
गीता श्लोक 13/21
ऊंच नीच योनियों में जन्म लेने का कारण…
भगवान कहते हैं की प्रकृति में स्थित पुरुष अर्थात जीव ही प्रकृति जन्म गुणों का भोक्ता बनता है और गुणों का संग ही इसके उच्च नीच योनि में जन्म लेने का कारण बनता है।
वास्तव में पुरुष प्रकृति शरीर में स्थित है ही नहीं परंतु जब वह प्रकृति अर्थात शरीर के साथ तादात्म्य में करके शरीर को मैं और मेरा मान लेता है, तब वह प्रकृति में स्थित कहा जाता है । ऐसा प्रकृति में स्थित पुरुष ही अनुकूल परिस्थिति के आने पर सुखी होता है और प्रतिकूल परिस्थिति के आने पर दुखी होता है । यही पुरुष का प्रकृति जन्य गुणों का उपभोक्ता बनाना है ।
जिन योनियों में सुख की बहुलता होती है उसको सत् योनी कहते हैं और जिन योनियों में दुख की बहुलता होती है उसको सत् योनि कहते हैं । पुरुष का सत असत् योनियों में जन्म लेने का कारण संग ही है ।
श्रीमद्भगवद्गीता-कालीचरण राजपूत





