गीता श्लोक 11/19…
प्रभु की सामर्थ्य……..
अर्जुन कहते हैं कि मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत प्रभावशाली, अनंत भुजाओं वाले, चंद्र और सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुखों वाले और अपने तेज से इस संसार को तपाते हुए देख रहा हूं ।
हे प्रभु आप आदि, मध्य और अंत से रहित हैं । आप सीमा रहित हैं । देशकृत, वस्तु कृत और काल कृत आदि किसी तरह से भी आपकी सीमा नहीं है । देश और काल सभी आपके अंतर्गत हैं ।
आप में अनंत पराक्रम और सामर्थ्य है । आप अनंत भुजा वाले हैं । अपने अनंत तेज से तपाने वाले आप हैं ।
गीता श्लोक 11/20…..
प्रभु ! आपके उग्र रूप से तीनों लोक व्यथित हैं ….
अर्जुन बोले हे महात्मन ! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का अंतराल और संपूर्ण दिशाएं एक आपसे ही परिपूर्ण हैं । आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्यथित अर्थात व्याकुल हो रहे हैं ।
भगवान के लिए यहां अर्जुन ने महात्मा कहकर संबोधित किया है । इसका तात्पर्य है कि प्रभु आप महान आत्मा हैं और आपके स्वरूप के समान किसी का स्वरूप नहीं है और न होगा और हो भी नहीं सकता । इसलिए आप महात्मा अर्थात महान रूप वाले हैं,महान आत्मा हैं । पृथ्वी और आकाश के मध्य जितना रिक्त स्थान है, वह रिक्त स्थान आपसे ही परिपूर्ण है अर्थात आपसे ही भर रहा है आप सभी दिशाओं में विराजमान हैं ।
गीता श्लोक 11/21…
विराट रूप में स्वर्ग आदि लोकों के दृश्य……
अर्जुन कहते हैं कि हे भगवान ! वही देवताओं के समुदाय आप में प्रविष्ट हो रहे हैं । उनमें से कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपका नाम और गुणों का कीर्तन कर रहे हैं । महर्षियों और सिद्धों के समुदाय कल्याण हो ! मंगल हो ! ऐसा कहकर उत्तम स्रोतों के द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं ।
जब अर्जुन स्वर्ग में गए थे, तब उनका देवताओं से परिचय हुआ था । उन्हीं देवताओं के लिए यहां अर्जुन कह रहे हैं कि यह सभी देवता, आपसे ही उत्पन्न होते हैं, आप में ही स्थित रहते हैं और आप में ही प्रविष्ट होते हैं । परंतु उन देवताओं में से जिनकी आयु अभी ज्यादा शेष है, ऐसे “आजान देवता” oविराट रूप के अंतर्गत नर सिंह आदि के भयानक रूपों को देखकर, भयभीत होकर, हाथ जोड़े हुए, आपका नाम, रूप,लीला, गुण आदि का गान कर रहे हैं । देवता लोग नरसिंह आदि अवतारों को देखकर और काल रूप मृत्यु से भी भयभीत होकर ही भगवान का गुणगान कर रहे हैं ।
गीता श्लोक 11/22…..
भगवान का विकराल रूप दर्शन ..
जो 11 रुद्र, 12 आदित्य, 8 वशु, 12 साध्यगण, 10 विश्व देव और दो अश्वनी कुमार तथा 49 मारुदगण और गरम-गरम भोजन करने वाले सात पितृगण तथा गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समुदाय हैं, वह सभी चकित होकर आपको देख रहे हैं ।
मन, अनुमंता, प्राण, नर, यान, चित्ती, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु यह बारह साध्य हैं । कृतु, दक्ष, श्रव, सत्य, काल, काम, धुनि, कुरुवान, प्रभवान और रोचमान यह 10 विश्वदेव हैं । काव्य, अनल, सोम, यम, आर्यमा, अग्निस्वात और वरहिस्वत, यह साथ पितर हैं । उष्ण अर्थात गरम अन्न खाने के कारण पितरों का नाम “ऊष्मपा” है ।
यह सभी देवता, पितर, गंधर्व, यक्ष आदि सभी चकित होकर प्रभु आपको देख रहे हैं । यह सभी देवता आपके विराट रूप के ही अंग हैं । अतः देखने वाले और दिखाने वाले सभी, एक परमात्मा आप ही हैं ।
गीता श्लोक 11/23…
विकराल विश्वरूप दर्शन….
हे महाबाहो ! आपके बहुत मुखों और नेत्रों वाले, बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत विकराल दातों वाले, महान रूप को देखकर सब प्राणी व्यथित हो रहे हैं तथा मैं भी व्यथित हो रहा हूं ।
अर्जुन कहते हैं कि हे भगवान ! आपके मुख एक दूसरे से नहीं मिलते, कई मुख सौम्य हैं, कई विकराल हैं, कई मुख छोटे हैं, कई मुख बड़े हैं । ऐसे ही जो आपके नेत्र हैं, वह भी एक समान दिखाई नहीं दे रहे हैं । कई नेत्र सौम्य हैं और कई नेत्र विकराल हैं, कई नेत्र छोटे हैं, कई बड़े हैं, कई लंबे हैं, कई चौड़े हैं, कई गोल हैं, कई टेढ़े हैं आदि आदि।
हाथों की बनावट, गुण, आकृति और उनके कार्य विलक्षण हैं । यह विचित्र_ विचित्र हैं और चरण भी तरह-तरह के हैं । विराट रूप में पेट भी समान रूप के दिखाई नहीं दे रहे हैं । कोई बड़ा है, कोई छोटा है, कोई भयंकर है । मुखों में बहुत विकराल दाढ़ें हैं । ऐसे महान भयंकर विकराल रूप को देखकर सब प्राणी व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूं ।
गीता श्लोक 11/24…
अर्जुन की बेचैनी…..
अर्जुन कहते हैं कि हे विष्णु! आपके देदीप्यमान अनेक वर्ण हैं । आप आकाश को स्पर्श कर रहे हैं अर्थात सब ओर से बहुत बड़े हैं । आपका मुख फैला हुआ है और विशाल है । आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं । ऐसे आपको देखकर भयभीत अतःकरण वाला मैं धैर्य और शांति को प्राप्त नहीं हो रहा हूं ।
हे प्रभु आप सर्व व्यापक विष्णु हैं, जिन्होंने पृथ्वी का भार दूर करने के लिए कृष्ण रूप से अवतार लिया है । काले, पीले एवं गौर आदि अनेक वर्ण हैं, जो बड़े देदीप्यमान अर्थात चमकने वाले अर्थात चमकीले हैं । आपका स्वरूप इतना लंबा है कि वह आकाश को स्पर्श कर रहा है ।
जिस प्रकार कोई बड़ा जंतु खाने के लिए अपना मुंह फैलता है, इसी प्रकार से पूरे विश्व को चट करने के लिए आपका मुख फैला हुआ दिखाई दे रहा है । आपके नेत्र बड़े देदीप्यमान अर्थात चमकीले और विशाल दिखाई दे रहे हैं । इस प्रकार में आपको देखकर भीतर से बहुत व्यथित अर्थात परेशान हो रहा हूं । मुझे कहीं से भी धैर्य प्राप्त नहीं हो रहा है और शांति भी नहीं मिल रही है ।
गीता श्लोक 11/25…
डर के कारण अर्जुन को दिशा भ्रम हो रहा है …..
अर्जुन कहते हैं कि हे प्रभु ! आपके प्रलय काल की अग्नि के समान प्रज्वलित और दातों के कारण विकराल अर्थात भयानक अर्थात डरावने मुखों के कारण मुझे तो दिशाओं का ज्ञान भी नहीं हो रहा है और शांति भी नहीं मिल रही है । इसलिए ये देवेश ! हे जगत के स्वामी आप प्रसन्न होइए ।
अर्जुन कह रहे हैं कि महाप्रलय के समय संपूर्ण त्रिलोक को भस्म करने वाली जो अग्नि प्रकट होती है, उसे कालाग्नि कहते हैं । उसी कालाग्नि के समान आपके मुख हैं । जो भयंकर दातों के कारण बहुत विकराल डरावने हो रहे हैं । उनको देखने मात्र से ही बड़ा डर लग रहा है । अगर उनका कार्य देखा जाए तो उसके सामने किसी का टिकना ही मुश्किल है । ऐसे विकराल मुखों को देखकर विकरालता के कारण मुझे दिशाओं का ज्ञान भी नहीं हो रहा है । वास्तव में दिशाओं का ज्ञान सूर्य के उदय और अस्त होने से होता है । परंतु वह सूर्य तो आपके नेत्रों की जगह है अर्थात वह तो आपके विराट रूप के अंतर्गत आ गया है । इसके अतिरिक्त आपके चारों ओर महान प्रज्वलित प्रकाश ही प्रकाश दिखाई दे रहा है । इसलिए मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं हो पा रहा है ।






