आठ वसु और भीष्म….
महाभारत/आदिपर्व/संभव पर्व /पर आधारित…
एक समय की बात, सर्वदेव पधारे ब्रह्मा जी के पास ।
राज ऋषि नृप महाभिष को, कुछ पाने की थी आस ।।
इसी समय देवलोक में गंगा का नारी रूप पधारा ।
तभी पवन के झोंके ने था गंगा का वस्त्र उघारा।।
शांति वार्ता हुई स्वर्ग में, देवों ने नहीं धरा कोई अस्त्र ।
चूक हुई पवन देव से, उड़ा दिए देवनदी के वस्त्र ।।
नीचे दृष्टि की देवों ने महाभिस घूर रहे गंगा को ।
उधर महाभिस की आंखें देखे सुरसरि तन नंगा को ।।
आठ वसुओं के अंश एक में भीष्म आठवां जाया ।
आठ पुत्रों के जन्म बाद, वह श्राप पूरा हो पाया ।।
बोले बसु पुत्र आठवां, रहेगा तेज और बलशाली ।
नृप शांतनु नहीं होंगे, सुत की बगिया के माली ।।
उद्घोष किया वशुओं ने, यह पुत्र रहेगा निःसंतान ।
शांतनु गंगा का सुत होगा, तेजस्वी और महान ।।
लेकर गंगा गई पुत्र को, था नाम देवव्रत पाया ।
वह बना बाद में भीष्म, था सुत गंगा का जाया ।।
मिश्रण था वह आठ अंश का, खूब बलिष्ठ थी काया ।
युवा उम्र में लिया भीष्म व्रत, खूब ही नाम कमाया ।।
खूब ही नाम कमाया …
के.सी. राजपूत, कोटा।
आठ वसु और भीष्म….कालीचरण राजपूत






