Saturday, April 18, 2026
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आठ वसु और भीष्म….कालीचरण राजपूत

आठ वसु और भीष्म….

महाभारत/आदिपर्व/संभव पर्व /पर आधारित…

एक समय की बात, सर्वदेव पधारे ब्रह्मा जी के पास ।

राज ऋषि नृप महाभिष को, कुछ पाने की थी आस ।।

इसी समय देवलोक में गंगा का नारी रूप पधारा ।

तभी पवन के झोंके ने था गंगा का वस्त्र उघारा।।

शांति वार्ता हुई स्वर्ग में, देवों ने नहीं धरा कोई अस्त्र ।

चूक हुई पवन देव से, उड़ा दिए देवनदी के वस्त्र ।।

नीचे दृष्टि की देवों ने महाभिस घूर रहे गंगा को ।

उधर महाभिस की आंखें देखे सुरसरि तन नंगा को ।।

आठ वसुओं के अंश एक में भीष्म आठवां जाया ।

आठ पुत्रों के जन्म बाद, वह श्राप पूरा हो पाया ।।

बोले बसु पुत्र आठवां, रहेगा तेज और बलशाली ।

नृप शांतनु नहीं होंगे, सुत की बगिया के माली ।।

उद्घोष किया वशुओं ने, यह पुत्र रहेगा निःसंतान ।

शांतनु गंगा का सुत होगा, तेजस्वी और महान ।।

लेकर गंगा गई पुत्र को, था नाम देवव्रत पाया ।

वह बना बाद में भीष्म, था सुत गंगा का जाया ।।

मिश्रण था वह आठ अंश का, खूब बलिष्ठ थी काया ।

युवा उम्र में लिया भीष्म व्रत, खूब ही नाम कमाया ।।

खूब ही नाम कमाया …

के.सी. राजपूत, कोटा।

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