गीता श्लोक 9/31…
मेरे भक्त का पतन नहीं होता…
भगवान कहते हैं कि वह तत्काल उसी क्षण धर्मात्मा हो जाता है और निरंतर रहने वाली शांति को प्राप्त हो जाता है । हे कुंती नंदन ! मेरे भक्त का पतन नहीं होता, तुम ऐसी प्रतिज्ञा करो।
भगवान कहते हैं कि दुराचारी से दुराचारी भी मेरा अनन्य भक्त बन जाने पर तुरंत धर्मात्मा हो जाता है । अपने द्वारा किए जाने वाले दुराचारों को वह पूर्ण रूप से त्याग कर धर्माचारी बन जाता है । महान पवित्र हो जाता है । क्योंकि यह जीव स्वयं परमात्मा का अंश है और उसका उद्देश्य भी परमात्मा की प्राप्ति करना हो गया, तो अब उसके धर्मात्मा होने में क्या देर लगेगी । यह जीव जब परमात्मा नहीं बना था और जब पाप आत्मा बन गया, तब भी वैसा ही पवित्र था । क्योंकि परमात्मा का अंश होने से जीव सदा ही पवित्र है । केवल संसार के संबंध से वह पाप आत्मा बना था । संसार का संबंध हटते ही या छूटते ही वह ज्यों का त्यों पवित्र हो गया ।
गीता श्लोक 9/31…
मेरे भक्त का पतन नहीं होता…
भगवान कहते हैं कि वह तत्काल उसी क्षण धर्मात्मा हो जाता है और निरंतर रहने वाली शांति को प्राप्त हो जाता है । हे कुंती नंदन ! मेरे भक्त का पतन नहीं होता, तुम ऐसी प्रतिज्ञा करो।
भगवान कहते हैं कि दुराचारी से दुराचारी भी मेरा अनन्य भक्त बन जाने पर तुरंत धर्मात्मा हो जाता है । अपने द्वारा किए जाने वाले दुराचारों को वह पूर्ण रूप से त्याग कर धर्माचारी बन जाता है । महान पवित्र हो जाता है । क्योंकि यह जीव स्वयं परमात्मा का अंश है और उसका उद्देश्य भी परमात्मा की प्राप्ति करना हो गया, तो अब उसके धर्मात्मा होने में क्या देर लगेगी । यह जीव जब परमात्मा नहीं बना था और जब पाप आत्मा बन गया, तब भी वैसा ही पवित्र था । क्योंकि परमात्मा का अंश होने से जीव सदा ही पवित्र है । केवल संसार के संबंध से वह पाप आत्मा बना था । संसार का संबंध हटते ही या छूटते ही वह ज्यों का त्यों पवित्र हो गया ।
गीता श्लोक 9/32…
भक्ति के अधिकारी कौन ?…
भगवान कहते हैं कि हे प्रथा नंदन जो भी पाप योनि वाले हों तथा जो भी स्त्रियां, वैश्य और शूद्र हों, वह भी सर्वथा मेरे शरण होकर निसंदेह परम गति को प्राप्त हो जाते हैं ।
भगवान कहते हैं कि जिनके इस जन्म में आचरण खराब हैं, अर्थात जो इस जन्म का पापी है, उसको भगवान ने दुराचारी कहा है । जो कभी पिछले जन्म के पापी हैं और अपने पुराने पापों का फल भोगने के लिए नीच योनि में पैदा हुए हैं, उनको भगवान ने पाप योनि कहा है ।
पाप योनि में असुर, राक्षस, पशु, पक्षी आदि सभी आते हैं । यह सभी भगवत भक्ति के अधिकारी माने जाते हैं । जीव भगवान के अंश से होने के कारण भगवान की तरफ चलने में, भगवान की भक्ति करने में, भगवान के सम्मुख के अधिकारी नहीं है । वह भगवान की पाठ, पूजा, जप, तप, यज्ञ, दर्शन आदि कर सकते हैं । भगवान के साथ संबंध जोड़ने में योग्यता, अयोग्यता कोई कारण नहीं है ।
गीता श्लोक 9/33….
भक्ति के अधिकारी कौन ? ….
भगवान कहते हैं कि जो पवित्र आचरण करने वाले ब्राह्मण और ऋषि रूप क्षत्रिय, भगवान के भक्त हों, वह परम गति को प्राप्त हो जाएं, इनमें तो कहना ही क्या । इसलिए इस अनित्य और सुख रहित शरीर को प्राप्त करके तू मेरा भजन कर ।
भगवान कहते हैं कि जब वर्तमान में पाप करने वाला पूर्ण तरह दुराचारी और पूर्व जन्म के पापों के कारण नीच योनि में जन्म लेने वाले प्राणी तथा स्त्रियों, वैश्य और शूद्र यह सभी मेरे शरण होकर मेरा आश्रय लेकर परम गति को प्राप्त हो जाते हैं । तो फिर पूर्व जन्म के आचरण भी अच्छे हों और इस जन्म में भी उत्तम कुल में जन्म हुआ हो, ऐसे पवित्र ब्राह्मण और पवित्र क्षत्रिय अगर मेरे शरण हो जाए अथवा मेरे भक्त बन जाए, तो वह परम गति को प्राप्त हो जाएंगे ।
गीता श्लोक 9/34…
भगवान का स्मरण कैसे किया जाय……
भगवान कहते हैं कि अर्जुन तू मेरा भक्त हो जा मुझ में मन वाला हो जा। मेरा पूजन करने वाला हो जा और मुझे नमस्कार कर । इस प्रकार अपने आप को मेरे साथ लगाकर, मेरे पारायण हुआ तू मुझे ही प्राप्त होगा ।
भगवान कहते हैं कि अपने मन की बात वही कही जाती है जहां सुनने वाले में कहने वाले के प्रति दोष दृष्टि न हो, वरन आदर भाव हो । अर्जुन तो दोष दृष्टि से रहित है । इसलिए भगवान ने उसे अनसूया (बिना दोष वाला) कहा है । इसी कारण से भगवान यहां अर्जुन के सामने अपने हृदय की गोपनीय बात कह रहे हैं ।
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! तू मेरा ही साथ अपनाकर केवल मेरे साथ ही संबंध जोड़, जो कि अनादि काल से स्वत सिद्ध है । तू भूल बस मेरे और संसार के साथ अपना संबंध मान रखा है, मैं अमुक वर्ग का हूं, अमुक आश्रम का हूं, अमुक संप्रदाय का हूं, प्रमुख नाम वाला हूं । अब तो तू अपने को बदल दे कि _ हे भगवान अब मैं आपका हूं और आप मेरे हो ।
अध्याय _10 (विभूतियोग)
श्लोक 10/01….
मेरे परम वचन तुम फिर से सुनो ..
भगवान बोले हे महाबाहो! मेरे परम वचनों को तुम फिर से सुनो, जिसे मैं मुझमें अत्यंत प्रेम रखने वाले तुम्हारे लिए हित की कामना से कहूंगा ।
भगवान की विभूतियों को तत्व से जानने पर भगवान में भक्ति होती है, प्रेम होता है, भगवान अपनी बची शेष विभूतियों का और भी विशेषता से वर्णन करते हैं । भगवान के मन में अपनी महिमा की बात,अपने हृदय की बात, अपने प्रभाव की बात, कहने की विशेष मन में आ रही है । इसलिए वे अर्जुन से कहते हैं कि तू मेरे परम वचनों को सुन ।
जहां-जहां भगवान अर्जुन को और विस्तार से अर्थात खोल कर बातें बताते हैं वहां वहां वे परम वचन रहस्य आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं । भगवान कहते हैं कि जिसने सूर्य को उपदेश दिया था, वही में तेरे रथ के घोड़े हांकता हुआ तेरे सामने बैठा हूं । वे परम वचन कहते हुए कहते हैं कि तू संपूर्ण धर्म के निर्णय के झंझट को छोड़कर एक मेरे शरण में आजा । मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा । तू चिंता मत कर ।
अध्याय _10 (विभूतियोग)
श्लोक 10/01….
मेरे परम वचन तुम फिर से सुनो ..
भगवान बोले हे महाबाहो! मेरे परम वचनों को तुम फिर से सुनो, जिसे मैं मुझमें अत्यंत प्रेम रखने वाले तुम्हारे लिए हित की कामना से कहूंगा ।
भगवान की विभूतियों को तत्व से जानने पर भगवान में भक्ति होती है, प्रेम होता है, भगवान अपनी बची शेष विभूतियों का और भी विशेषता से वर्णन करते हैं । भगवान के मन में अपनी महिमा की बात,अपने हृदय की बात, अपने प्रभाव की बात, कहने की विशेष मन में आ रही है । इसलिए वे अर्जुन से कहते हैं कि तू मेरे परम वचनों को सुन ।
जहां-जहां भगवान अर्जुन को और विस्तार से अर्थात खोल कर बातें बताते हैं वहां वहां वे परम वचन रहस्य आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं । भगवान कहते हैं कि जिसने सूर्य को उपदेश दिया था, वही में तेरे रथ के घोड़े हांकता हुआ तेरे सामने बैठा हूं । वे परम वचन कहते हुए कहते हैं कि तू संपूर्ण धर्म के निर्णय के झंझट को छोड़कर एक मेरे शरण में आजा । मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा । तू चिंता मत कर ।
गीता श्लोक 10/02…
मेरे प्रकट होने को देवता भी नहीं जानते……
भगवान कहते हैं कि मेरे प्रकट होने को न देवता जानते हैं, न महर्षि लोग, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का आदि हूं ।
भगवान कहते हैं कि मेरे प्रकट होने अर्थात प्रादुर्भाव को न देवता जानते हैं और न महर्षि लोग जानते हैं । देवता लोग तो दिव्य है, फिर भी वह मेरे प्रकट होने को नहीं जानते, फिर महर्षि गण कैसे जान सकते हैं । क्या नहीं जान सकते ?
एक__ मेरा मत्स्य, कच्छप,बामन अर्थात ब्रह्मण आदि रूप में प्रकट होना अर्थात अवतार लेना
दो__ श्रेष्ठ में क्रिया भाव और विभूति के रूप में प्रकट होना
तीन __मेरे प्रकट होने के उद्देश्य को अर्थात लक्ष्य को अर्थात हेतुओं अर्थात कर्म को देवता लोग और महर्षि लोग नहीं जान सकते ।
देवता लोग भी पूरा-पूरा नहीं जानते हैं, तो महर्षि लोग तो देवताओं के नीचे की सीढ़ी पर आते हैं । देवताओं को मेरे प्रकट होने की बात तो दूर रही, उनको मेरे दर्शन भी नहीं हो पाते हैं । देवता लोग हमेशा मेरे दर्शनों के लिए लालायित बने रहते हैं । इसी प्रकार जिन महर्षियों ने अनेक ऋचाओं, मंत्रों, विद्या, विलक्षण_ विलक्षण शक्तियों को प्रकट किया है तथा जो संसार में ऊंचे उठे हुए हैं, जो दिव्य अनुभव से युक्त हैं, जिनके लिए कुछ करना जानना और पाना बाकी रहा नहीं रहा ऐसे तत्वज्ञ जीवन मुक्त महर्षि लोग भी मेरे प्रकट होने को अर्थात अवतारों को अनेक प्रकार की लीलाओं को मेरे महत्व को पूरा-पूरा नहीं जानते ।
गीता श्लोक 10/03……
मनुष्य की मुक्ति कैसे होगी ? …
भगवान कहते हैं कि जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और संपूर्ण लोकों का महान ईश्वर जानता है अर्थात दृढ़ता से, संदेह रहित स्वीकार कर लेता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान है और वह संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है ।
भगवान के प्रकट होने को देवता और महर्षि भी नहीं जानते तो मनुष्य कैसे जान पाएगा । परंतु मनुष्य इतना तो जान ही सकता है कि वह अपना कल्याण कर ले । यह जानना कि भगवान अज अर्थात जन्म रहित हैं, वह अजन्माहैं, अनादि हैं, भगवान आदि और अनादि काल, समय के भी काल हैं । उन कालातीत भगवान में काल का भी आदि और अंत हो जाता है । भगवान संपूर्ण लोकों के महान ईश्वर अर्थात स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों के ज्ञाता, त्रिलोकी हैं।
गीता श्लोक 10/4, 10/5…
भगवान के परम वचन …..
भगवान कहते हैं कि बुद्धि, ज्ञान, असमंज, क्षमा, सत्य, दम, शम तथा सुख, दुख,उत्पत्ति, विनाश, भय, अभय और अहिंसा, समता,संतोष, तप, दान, यश और अपयश प्राणियों के यह अनेक प्रकार के अलग-अलग 20 भाव मुझसे ही होते हैं ।
भगवान कहते हैं कि बुद्धि, ज्ञान, समता, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुख, भाव, अभाव, भय, अभय,अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश, अपयश, आदी सब भाव मुझसे ही होते हैं । मनुष्य के अच्छे आचरणों भावों और गुणों को लेकर संसार में जो नाम की प्रसिद्ध प्रशंसा आदि होते हैं, उनका नाम यश है । मनुष्यों के बुरे आचरणों,भावों और गुणों को लेकर संसार में जो नाम की निंदा होती है, उसको अपयश या अयस कहते हैं । संसार में जो कुछ विहित तथा निषिद्ध हो रहा है, शुभ तथा अशुभ हो रहा है,और संसार में जितने सद्भाव तथा दुर्भाव हैं, वह सब के सब भगवान की लीला है । इस प्रकार भक्त भगवान को तत्व से समझ लेता है, तो उसका भगवान में अविचल योग अर्थात लगाव हो जाता है ।
[16/12, 6:15 am] Kavi -K. C. Rajput: व्यक्ति रूप से 25 विभूतियां भगवान द्वारा बनाई गई हैं ।उपरोक्त 25 विभूतियां व्यक्ति रूप से हैं, जो कि प्राणियों में विशेष प्रभावशाली हैं और जगत की कारण भी हैं ।
सात महर्षि दीर्घ आयु वाले मित्रों को प्रकट करने वाले ऐश्वर्यवान, दिव्य दृष्टि वाले गुण, विद्या आदि से परिपूर्ण, धर्म का साक्षात्कार करने वाले और गोत्रों के प्रवर्तक, ऐसे साथ गुणों से युक्त सप्त ऋषि कहे हैं । वह सात ऋषि हैं__ मरीचि, अंगिरा अत्रि, अंगिरा, पुलस्त और वशिष्ठ
एक_ वे सात गुणों से युक्त हैं ।
दो _ वे सातों वेद वेत्ता हैं, वेदों के आचार्य हैं ।
तीन _ धर्म प्रवृत्ति का संचालन करने वाले हैं ।
चार _ वे प्रजापत ब्रह्मा के कार्य में नियुक्त किए जाते हैं ।
पांच _ इन्हीं सातों ऋषियों को यहां महर्षि कहा गया है।
चार संकादि_ सनक, सनंदन, सनत कुमार और सनातन । यह चारों ही ब्रह्मा जी के तप करने पर सबसे पहले प्रकट हुए थे । यह चारों भगवत स्वरूप हैं ।सबसे पहले प्रकट होने पर यह चारों सदा 5 वर्ष की अवस्था वाले बालक के रूप में ही रहते हैं । यह तीनों लोकों में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का प्रचार करते हैं । और घूमते रहते हैं । उनकी वाणी में हरि शरणम उच्चारण होता रहता है । यह भागवत कथा के बहुत प्रेमी हैं । अतः इन चारों में एक वक्ता और तीन श्रोता बनकर कथा करते हैं और सुनते रहते हैं ।
मनु _ ब्रह्मा जी के 1 दिन में 14 मनु होते हैं । यह 14 मनु हैं_ स्वयंभू, स्वरचित,उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सवर्णी, दक्षसारणी,ब्रह्मश्रावणी, धर्म सावरणी, रूद्रसवर्णी, देव सावरणीय और इंद्र श्रावणी । यह सभी ब्रह्मा जी की आज्ञा से सृष्टि के उत्पादक और प्रवर्तक हैं ।
गीता श्लोक 10/6…..
भगवान के परम वचन ….
भगवान कहते हैं कि सात महर्षि और उनसे भी पहले होने वाले चार सनकादि तथा 14 मनु, यह सब के सब मेरे मन से पैदा हुए हैं और मुझ में भाव अर्थात श्रद्धा भक्ति रखने वाले हैं । जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है
गीता श्लोक 10/7
विभूतियों क़ो तत्व से जानने का फल……
भगवान कहते हैँ कि जो मनुष्य मेरी इस विभूति को और योग सामर्थ्य को तत्व से जानता है अर्थात दृढ़ता पूर्वक, संदेह रहित स्वीकार कर लेता है वह अविचल भक्ति योग से युक्त हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं ।
भगवान के ऐश्वर्य क़ो विभूति कहते हैँ और भगवान की अलौकिक विलक्षण शक्ति अनंत सामर्थ्य को योग कहते हैं । ऐसा कहा जाता है कि शक्ति का नाम योग है और उसे योग से प्रकट होने वाली विशेषताओं का नाम विभूति है । भाव और व्यक्ति के रूप में जितनी विभूतियां हैं, वह तो भगवान की सामर्थ्य से तथा प्रभाव से प्रकट हुई विशेषताएं हैं । यह भगवान का योग है अर्थात प्रभाव है । भगवान अर्जुन से कहते भी हैं कि मेरे ईश्वरीय रूप को देख।
योग नाम सनातन, संबंध और सामर्थ्य का है । जो स्थिर परम तत्व है उसी से अपार सामर्थ्य आती है । वह निर्विकार परमात्मा तत्व महान और समर्थ शाली है । उसके सामान सामर्थ्य किसी में नहीं है और ना हो सकती है । कामना होने से शक्ति का क्षय होता है और निष्काम होने से शक्ति का संचय होता है ।
गीता श्लोक 10/8
विभूति और योग को तत्व से जानना क्या है ?
भगवान कहते हैं कि मैं संसार मंत्र का प्रभव अर्थात मूल कारण हूं और मुझसे ही सारा संसार प्रकाशित हो रहा है अर्थात चेष्टा कर रहा है अर्थात चल रहा है, ऐसा मानकर मुझ में ही श्रद्धा प्रेम रखते हुए, बुद्धिमान भक्त मेरा ही भजन करते हैं, सब प्रकार से मेरे ही शरण होते हैं । भगवान कहते हैं की समस्त संसार का मूल कारण मैं हूं अर्थात संसार भगवान की मूल विभूति है । संसार में जो कुछ देखने सुनने में आता है, वह सब की सब भगवान की विभूति है । भगवान से ही सभी विभूतियां प्रकट होती हैं । भगवान का यह भी कहना है कि उद्भिज, जरायुज,अंदज, श्वेदज अर्थात जड़ चेतन सब कुछ स्थावर, जंगम, यावन मात्र जितने प्राणी पैदा होते हैं, उन सब की उत्पत्ति के मूल में परमपिता परमेश्वर के रूप में मैं ही हूं।
गीता श्लोक 10/9
भक्तों के भजन की रीति….
भगवान कहते हैं कि मुझ में चित्त वाले मुझ में प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन आपस में मेरे गुण, प्रभाव आदि को जनाते हुए, और उनका कथन करते हुए, नित्य निरंतर संतुष्ट रहते हैं और मुझ में ही प्रेम करते हैं ।
भगवान से ही सब उत्पन्न हुए हैं, और भगवान से ही सबको ऊर्जा मिल रही है,सबके मूल में परमात्मा ही हैं, यह बात सबके मन में आनी ही चाहिए । इसके बाद एक ही बात मान और मस्तिष्क में आती है, अब इसके बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रहता ।
वे साधक मेरे में चित्त वाले हैं । एक तो अपने आप को भगवान में लग जाना होता है और मन को भगवान में लगाना होता है । जहां यह बात ध्यान में आ जाती है कि मैं भगवान का हूं, ऐसे स्वयं भगवान में लग जाता है । कोई साधन परमात्मा प्राप्ति के लिए सच्चे हृदय से साधक बन जाता है, तो साधन में उसकी मन स्वत लग जाता है ।
गीता श्लोक 10/10
भगवान की भक्त पर कृपा….
भगवान कहते हैं कि उन नित्य निरंतर मुझ में लगे हुए और प्रेम पूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को मैं वह बुद्धि योग देता हूं जिससे उनको मेरी प्राप्ति हो जाती है । भगवान में लगे हुए भक्त भगवान को छोड़कर न तो समता चाहते हैं, न तत्वज्ञान चाहते हैं तथा न कुछ अन्य चाहते हैं । उनका तो एक ही काम है, हर समय भगवान में लगे रहना । भगवान के भजन के अतिरिक्त उनके पास कोई काम नहीं है । अब सारा काम सारी जिम्मेदारी भगवान की है । इसलिए भगवान यहां उन भक्तों को तत्वज्ञान देने की बात कर रहे हैं । भगवान में जो चित्त और प्राण वाले हैं, भगवान के गुण प्रभाव लीला रहस्य को यदि आपस में एक दूसरे को जताते हुए अर्थात बताते हुए तथा भगवान के नाम गुण का कथन करते हुए, नित्य निरंतर भगवान में ही संतुष्ट रहते हैं और भगवान में ही प्रेम करते हैं । ऐसे नित्य निरंतर भगवान में ही लगे हुए भक्तों के लिए एक पद “सततयुक्तानाम” दिया गया है ।
भगवान कहते हैं कि उन भक्तों पर कृपा करने के लिए उनके स्वरूप में रहने वाला मैं उनके अज्ञान जन्य अंधकार को, देदीप्यमान ज्ञान रूप दीप के द्वारा नष्ट कर देता हूं ।
भगवान कहते हैं कि उन भक्तों के हृदय में कुछ भी सांसारिक इच्छा नहीं होती । इतना ही नहीं उनके भीतर मुझे छोड़कर मुक्ति की भी इच्छा नहीं होती । अभिप्राय यह है कि वह न तो सांसारिक चीज चाहते हैं और न परमार्थिक चीज ही चाहते हैं । वे तो केवल मेरा ही भजन करते हैं । उनके इस निष्काम भाव और प्रेम पूर्वक भजन करने को देखकर मेरा हृदय द्रवित हो जाता है, मैं चाहता हूं कि मेरे द्वारा उनकी सेवा हो जाए अर्थात वे मेरे से कुछ लेकिन । परन्तु वे मेरे से कुछ नहीं करते । अतः बदले में मैं उन पर कृपा करने के लिए कृपावश होकर मैं उनके अज्ञानजन्य अंधकार को दूर कर देता हूं ।
गीता श्लोक 10/12, 10/13
अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति..
अर्जुन बोले परम ब्रह्म परमधाम और महान पवित्र आप ही हैं, आप शाश्वत, दिव्यपुरुष, आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापक हैं । ऐसा आपको सब के सब ऋषि,देव, ऋषि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं ।
अर्जुन भगवान के समक्ष बैठे हैं और अर्जुन उनकी स्तुति कर रहे हैं कि मेरे पूछने पर जिसको अपने परम ब्रह्म कहा है वह परम ब्रह्म आप ही है, जिसमें सारा संसार व्याप्त है, वह परमधाम अर्थात परम स्थान आप ही हैं, जिनको पवित्र में भी पवित्र कहा गया है, वह महान पवित्र भी आप ही हैं ।
ग्रन्थों में ऋषियों ने देव ऋषि नारद ने असित और उनके पुत्र देवल ऋषि ने तथा महर्षि व्यास ने आपको शाश्वत दिव्य पुरुष आदि देव और विभु कहा है । आप आत्मा के रूप में शाश्वत सगुन, निराकार के रूप में दिव्य पुरुष, देवताओं और महर्षियों आदि के रूप में आदि देव, मूर्ख लोग मेरे को अज नहीं जानते अर्थात वह ऐसा नहीं जानते कि मैं अजन्मा हूं । मूर्ख लोग मुझे अज जानते हैं । इस रूप में अज और मैं अव्यक्त रूप से सारे संसार में व्याप्त हूं । इस रूप में विभु स्वयं आपने मेरे प्रति कहा है ।
गीता श्लोक 10/14
अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति…
अर्जुन कहते हैं कि हे केशव ! मुझे आप जो कुछ कह रहे हैं, वह सब में सत्य मानता हूं । हे भगवान ! आपके प्रकट होने को न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं ।
इस इस श्लोक के आरंभ में ही अर्जुन ने भगवान को केशव कहकर संबोधित किया है कि सब शब्द का विग्रह करें तो इस प्रकार होगा _ केशव क , अ, ईश, व,
क _ से तात्पर्य ब्रह्मा से है ।
अ _ से तात्पर्य विष्णु से है ।
ईश_ से तात्पर्य महेश अर्थात शंकर जी से है ।
व_ से तात्पर्य वपु अर्थात स्वरूप से है ।
इस प्रकार _
क , अ, ईश, व_ केशव अर्थात भगवान विष्णु ।
केशव शब्द में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवता समाहित हैं । केशव इन तीनों का ही मिश्रित रूप है ।
अर्जुन का यहां केशव संबोधन देने से तात्पर्य है कि आप ही संसार की उत्पत्ति अर्थात ब्रह्मा, स्थिति अर्थात विष्णु और संहार अर्थात करने वाले आप ही शंकर हैं । आप ब्रह्मा विष्णु और शंकर के मिश्रित स्वरूप हैं ।
अर्जुन कहते हैं कि आप मेरे प्रति जो कुछ कहते आए हैं, उसे मैं पूर्ण सत्य मानता हूं । अभी भी आपने इस अध्याय में जो विभूति तथा योग का वर्णन किया है, वह सब भी में सत्य मानता हूं । आप ही सबके उत्पादक और संचालक हैं । आप ही सर्वोपर हैं । सब के मूल में आप ही हैं ।
गीता श्लोक 10/15
भगवान को हर कोई नहीं जान सकता……..
अर्जुन भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे भूत भावन! हे भूतेष ! हे देव देव ! हे जगत पते! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने आप से अपने आप को जानते हैं ।
हे प्रभु आप समस्त प्राणियों को संकल्प मात्र से पैदा करने वाले हैं । आप ही भूत भावन हैं । संपूर्ण प्राणियों और देवताओं के मालिक होने से आप भूतेष और देव देव हैं । संपूर्ण पुरुषों में उत्तम होने से आप समस्त लोगों में और वेदों में एक पुरुषोत्तम नाम से जाने जाते हैं ।
भगवान की विभूतियां की और भक्तों पर कृपा करने की बात सुनकर अर्जुन में भगवान के प्रति विशेष भाव पैदा होते हैं । उन भावों में विभोर होकर हुए भगवान के लिए एक साथ पांच संबोधनों जैसे भूत भावन, भूतेष, देव देव, जगत्पते और पुरुषोत्तम का प्रयोग करते हैं । भगवान अपने आप को अपने आप से ही जानते हैं । अपने आप को जानने में उन्हें किसी प्रकृतक साधन की आवश्यकता नहीं होती है । अपने आप को जानने में उनकी अपनी कोई वृत्ति पैदा नहीं होती है । कोई जिज्ञासा भी नहीं होती है । उनमें तो शरीर और शरीरी ही अर्थात आत्मा का भाव भी नहीं है ।
गीता श्लोक 10/16
भगवान से विभूतियों का विस्तार से कहने की प्रार्थना ,, ….
अर्जुन बोले हे प्रभु ! इसलिए जिन विभूतियों से आप इन संपूर्ण लोगों को व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियों का संपूर्णता से वर्णन करने में आप ही समर्थ हैं ।
भगवान यह बात पहले कह चुके हैं कि उसका (साधक का) मेरे में अटल भक्ति योग हो जाता है । उसे सुनने पर अर्जुन के मन में आया कि भगवान में दृढ़ भक्ति होने का यह बहुत सम अर्थात सरल या आसान और श्रेष्ठ उपाय है, क्योंकि भगवान की विभूतियों को और योग को तत्व से जानने पर मनुष्य का मन भगवान की तरफ स्वाभाविक ही खिंच जाता है और भगवान में उसकी स्वाभाविक ही भक्ति जागृत हो जाती है । अर्जुन अपना कल्याण चाहते हैं और कल्याण के लिए उनको भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ उपाय दिखती है । इसलिए अर्जुन कहते हैं कि जिन विभूतियों से आप संपूर्ण लोगों को व्याप्त करके स्थित हैं उन अलौकिक विलक्षण विभूतियों का विस्तार पूर्वक संपूर्णता से वर्णन करिए क्योंकि उनको कहने में आप ही समर्थ हैं ।
गीता श्लोक 10/17..
अर्जुन द्वारा भगवान की प्रार्थना .
अर्जुन कहते हैं कि हे योगिन ! अर्थात योगीराज ! निरंतर सांगोपाँग चिंतन करता हुआ मैं आपको कैसे जानू और हे भगवान ! किन-किन भावों में आप मेरे द्वारा चिंतन किये जा सकते हैं अर्थात किन-किन भावों में मैं आपका चिंतन करूं ?
भगवान ने कहा है कि जो मेरे विभूति और योग को तत्व से जानता है, वह अभी चल भक्ति योग से युक्त हो जाता है ।इसलिए अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि हर समय चिंतन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूं?
भगवान कहते हैं कि जो अनन्य चित्त होकर नित्य निरंतर मेरा स्मरण करता है, उस योगी को मैं सुलभता से प्राप्त हो जाता हूं । उसके बाद भगवान ने कहा है कि जो अनन्य भक्त मेरा निरंतर चिंतन करते रहते हैं, उनका योग क्षेम मैं स्वयं बहन करता हूं । इस प्रकार चिंतन की महिमा सुनकर अर्जुन कहते हैं कि जिस चिंतन से मैं आपको तत्व से जान पाऊं वह चिंतन मैं कहां करूं? किस वस्तु व्यक्ति देश काल घटना स्थिति आदि में मैं आपका चिंतन करूं?




