Saturday, April 18, 2026
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श्रीमद्भगवद्गीता-कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 8/27….

अर्जुन तू योग युक्त हो जा ..

भगवान कहते हैं कि हे प्रथा नंदन अर्जुन ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता । अतः हे अर्जुन! तू सब समय में योग युक्त अर्थात समता में स्थित हो जा

भगवान कहते हैं कि शुक्ल मार्ग प्रकाश मय है और कृष्ण मार्ग अंधकार मय है । जिनके अंतःकरण में उत्पत्ति विनाश सील वस्तुओं का महत्व नहीं है और जिनके उद्देश्य ध्येय में प्रकाश रूप अर्थात ज्ञान रूप परमात्मा ही हैं, ऐसे परमात्मा की तरफ चलने वाले साधक शुक्ल मार्गी है अर्थात उनका मार्ग प्रकाश मय है

परंतु संसार में जो रचे पचे हैं और उनके सांसारिक पदार्थों का संग्रह करना और उनसे सुख भोगना ही ध्येय होता है ऐसे  मनुष्य तो घोर अंधकार में ही हैं । परंतु जो भोगने के उद्देश्य से यहां के भोगों से संयम करके यज्ञ,तप, दान आदि शास्त्र विहित शुभ कर्म करते हैं और करने के बाद स्वर्ग आदि ऊंची भोग भूमियों में जाते हैं । यद्यपि ऐसे भक्त मनुष्यों से ऊंचे उठे हुए हैं, फिर भी जन्म मरण वाले मार्ग में होने के कारण  अंधकार में ही हैं

 

गीता श्लोक 8/28…

योगी परमात्मा को प्राप्त होता है .

भगवान कहते हैं कि योगी अर्थात भक्त इसको (अर्थात इस अध्याय में वर्णित विषय को) जानकर वेदों में, यज्ञों में, तपों में तथा दान में जो_ जो पुण्य फलों का अतिक्रमण कर जाता है और आदि स्थान अर्थात आरंभिक अर्थात शुरूआती स्थान में, परमात्मा को प्राप्त हो जाता है

यज्ञ, दान, तप, तीरथ, व्रत आदि जितने भी शास्त्रीय उत्तम से उत्तम कार्य हैं और उनका जो फल है, वह विनाशी ही होता है । जब उत्तम से उत्तम कार्य का भी आरंभ और समाप्ति होती है, तो फिर उस कार्य से उत्पन्न होने वाला फल अविनाशी कैसे हो सकता है ? जीव स्वयं परमात्मा का अविनाशी अंश होकर भी विनाशी पदार्थ में फंसा रहे तो इसमें उसकी अज्ञानता ही मुख्य है । अतः मनुष्य इस अध्याय में वर्णित विषय के रहस्य को समझ लेता है, वह यज्ञ, तप, दान आदि सभी पुण्य फलों का अतिक्रमण कर जाता है अर्थात वह इन सब पर विजय प्राप्त कर लेता है

 

अध्याय _

राजविद्या_राजगुह्य _यो

श्लोक 9/

भगवान द्वारा अर्जुन के लिए विज्ञान सहित ज्ञान…….

श्री भगवान बोले यह अत्यंत गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान, दोष दृष्टि रहित तेरे लिए तो मैं फिर अच्छी तरह से कहूंगा, जिसको जानकर तू अशुभ से अर्थात जन्म मरण रूप संसार से मुक्त हो जाएगा

भगवान के मन में जिस तत्व को या विषय को कहने की इच्छा है,उसकी तरफ लक्ष्य करने के लिए “इदम”पद कहा गया है । उसी तत्व को जो भगवान के मन और बुद्धि में स्थित है, की महिमा कहने के लिए ही उसको गुह्यतम (गीता 9/34 )कहा गया है अर्थात वह तत्व अत्यंत गोपनीय है

इसी को अन्य स्थानों पर राजगुह्यम तथा सर्वगुह्यम (गीता 18/64 )भी कहा गया है

अनसूयवे _  इसका तात्पर्य है कि हे अर्जुन तुम भगवान में दोष दृष्टि रहित हो अर्थात तुम भगवान में दोष नहीं ढूंढते, सदा उनके भजन में लगे रहते हो

प्रवक्ष्यामि _ इस पद का तात्पर्य है कि मैं  यह ज्ञान अच्छी तरह से कहूंगा

_ मैं तेरे लिए गोपनीय बात को फिर से अच्छी तरह अर्थात समझाकर कहूंगा

_ उस गुह्यतम बात को विलक्षण रीति से अर्थात विशेष तरीके से कहूंगा

ज्ञान_ इन सब बातों को दृढ़ता से मानना “ज्ञान” है

विज्ञान_ इस ज्ञान को जानना या अनुभव करना “विज्ञान” है

भगवान ने_ इसी ज्ञान को गुह्यतम कहा गया है

 

गीता श्लोक 9/

यह विज्ञान सहित ज्ञान संपूर्ण विद्याओं का राजा है …..

भगवान कहते हैं कि यह विज्ञान (तर्क) सहित ज्ञान अर्थात समग्र रूप संपूर्ण विद्याओं का राजा और संपूर्ण गोपनीयों का राजा है । अतः यह अति पवित्र तथा अति श्रेष्ठ है और फल भी प्रत्यक्ष है । यह धर्म है, अविनाशी है और करने में बहुत सुगम  है अर्थात इसको प्राप्त करना बहुत सुगम है

राजविद्या _ यह विज्ञान सहित ज्ञान संपूर्ण  विद्याओं का राजा है क्योंकि इसको ठीक तरह से जान लेने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहता । पहले भगवानh ने कहा था कि मेरे समग्र रूप को जानने के बाद कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता

राजगुह्ययम _ संसार में गुप्त रखने योग्य जितनी बातें हैं, उन सब बातों का यह राजा है । क्योंकि संसार में सबसे बड़ी दूसरी कोई रहस्य की बात है ही नहीं

 

गीता श्लोक 9/

मुझे न मानने वाले ( मुझे न पूजने वाले) बार बार जन्म लेते हैं .

भगवान कहते हैं कि है परंतप( दुष्टों को कष्ट पहुंचाने वाले, दुष्टों को तपाने वाले) अर्जुन ! इस धर्म की महिमा पर श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु रूप संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं अर्थात बार-बार  जन्मते मरते रहते हैं

धर्म धर्म दो तरह का होता है_ स्वधर्म और परधर्म । मनुष्य का जो अपना स्वरूप है, वह उसके लिए स्वधर्म है और प्रकृति तथा प्रकृति का कार्य करने के लिए परधर्म है । मनुष्य अपने शरीर को,कुटुंब को, धन संपत्ति वैभव को, निःसंदेह रूप से उत्पत्ति_ विनाश शील और प्रतिक्षण परिवर्तनशील जानते हुए भी, उन पर विश्वास करते हैं, श्रद्धा करते हैं, उनका आश्रय लेते हैं । वह ऐसा विचार नहीं करते कि इस शरीर आदि के साथ हम कितने दिन रहेंगे और यह हमारे साथ कितने दिन रहेगा । श्रद्धा तो स्वधर्म पर होनी चाहिए,परंतु वह हो गई पर धर्म पर

संसार के रास्ते पर तो मरना ही मरना है,विनाश ही विनाश है । परम धाम एक ऐसा स्थान है, जहां पहुंचने पर बार बार आने जाने का चक्कर खत्म हो जाता है

 

गीता श्लोक 9 / 4 व 5….

सभी प्राणी मेरे में स्थित हैं …

 

भगवान कहते हैं कि यह संसार मेरे निराकार रूप से व्याप्त है । सभी प्राणी मेरे में स्थित हैं, परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूं । मेरे इस ईश्वर संबंधी योग सामर्थ्य को देख सभी प्राणियों को उत्पन्न करने वाला और प्राणियों का धारण एवं भरण _ पोषण करने वाला मेरा स्वरूप उन प्राणियों में स्थित नहीं है

मया का अर्थ है _मेरा साकार रूप तथा

अव्यक्त मूर्तिना _से निराकार रूप बताया गया है

इसका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान साकार रूप से भी हैं और निराकार रूप से भी है अर्थात व्यक्त रूप से भी हैं और अव्यक्त रूप से भी हैं । वास्तव में भगवान दोनों रूप में है और वह एक ही है निर्गुण और सगुण भगवान के अलग-अलग विशेषण है और अलग- अलग नाम है लेकिन भगवान तो एक ही है।

सभी प्राणी मेरे में स्थित है । प्राणी मेरे को छोड़कर रह नहीं सकते । क्योंकि सारे प्राणी मेरे से ही उत्पन्न होते हैं, मेरे में स्थित रहते हैं और मेरे में ही ली हो जाते हैं । उनकी उत्पत्ति स्थिति और प्रलय जो कुछ परिवर्तन होता है, वह सब मेरे में ही होता है अतह  वे सब प्राणी मेरे में ही स्थित है

 

गीता श्लोक 9 / 4 व 5….

सभी प्राणी मेरे में स्थित हैं …

 

भगवान कहते हैं कि यह संसार मेरे निराकार रूप से व्याप्त है । सभी प्राणी मेरे में स्थित हैं, परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूं । मेरे इस ईश्वर संबंधी योग सामर्थ्य को देख सभी प्राणियों को उत्पन्न करने वाला और प्राणियों का धारण एवं भरण _ पोषण करने वाला मेरा स्वरूप उन प्राणियों में स्थित नहीं है

मया का अर्थ है _मेरा साकार रूप तथा

अव्यक्त मूर्तिना _से निराकार रूप बताया गया है

इसका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान साकार रूप से भी हैं और निराकार रूप से भी है अर्थात व्यक्त रूप से भी हैं और अव्यक्त रूप से भी हैं । वास्तव में भगवान दोनों रूप में है और वह एक ही है निर्गुण और सगुण भगवान के अलग-अलग विशेषण है और अलग- अलग नाम है लेकिन भगवान तो एक ही है।

सभी प्राणी मेरे में स्थित है । प्राणी मेरे को छोड़कर रह नहीं सकते । क्योंकि सारे प्राणी मेरे से ही उत्पन्न होते हैं, मेरे में स्थित रहते हैं और मेरे में ही ली हो जाते हैं । उनकी उत्पत्ति स्थिति और प्रलय जो कुछ परिवर्तन होता है, वह सब मेरे में ही होता है अतह  वे सब प्राणी मेरे में ही स्थित है

 

गीता श्लोक 9/6…..

सभी प्राणी मुझ में ही स्थित हैं / मुझ में ही समाए हुए हैं ….

भगवान कहते हैं कि जैसे सब जगह बिचरने वाली हवा / वायु  आकाश में स्थित रहती है, ऐसे ही संपूर्ण प्राणी मुझ में ही स्थित रहते हैं, ऐसा  हे अर्जुन तुम मान लो

जिस प्रकार सब जगह विचरण करने वाली महान वायु नित्य ही आकाश में स्थित रहती है, कहीं बिना स्पंदन के अर्थात बिना कंपन के रहती है, कहीं सामान्य रूप से क्रियाशील रहती है, कहीं बड़े बेग से चलती है, परंतु किसी भी रूप से चलने वाली वायु आकाश से अलग नहीं होती । चाहे वायु कहीं रुकी हुई मालूम पड़ती है, परंतु वह रहती आकाश में ही है । वह आकाश को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती । इस प्रकार तीनों लोकों और 14 भवनों में घूमने वाले स्थावर जंगम सभी प्राणी मेरे में ही स्थित रहते हैं

 

गीता श्लोक 9/7…

सभी प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं …

 

भगवान कहते हैं कि एक कुंती नंदन अर्जुन कपों का छह होने पर अर्थात महा प्रलय के समय सभी प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कपों के आड़ अर्थात आरंभ में अर्थ अर्थात शुरुआत में महासर्ग या महाउदय के समय मैं फिर उनकी रचना करता हूं

भगवान कहते हैं कि सभी प्राणी मेरे ही अंश से हैं और सदा ही मेरे में ही स्थित रहने वाले हैं । परंतु वह प्रकृति और प्रकृति के कार्य शरीर आदि के साथ तालमेल या तादात्म्य करके  जो कुछ भी करते कार्य करते हैं, उन कर्मों का तथा उनके फलों के साथ संबंध जुड़ जाता है, इससे बार-बार जन्मते और मरते रहते हैं । महाप्रलय अर्थात महाविनाश का समय आता है, जिसमें ब्रह्मा जी अपनी 100 वर्ष की आयु पूरी करके विलीन हो जाते हैं । उस समय प्रकृति के पर्वत हुए हुए सभी प्राणी प्रकृति जन्य संबंध को लेकर प्रकृति में लीन हो जाते हैं

 

गीता श्लोक 9/8…

मैं बार बार प्रकृति की रचना करता हूं ….

  भगवान कहते हैं की प्रकृति के वश में होने से परतंत्र हुए, इस संपूर्ण प्राणी जगत अर्थात प्राणी समुदाय के कल्पों के आदि में मैं अपनी प्रकृति को वश में करके बार-बार रचना करता हूं

भगवान का कहना है की महाप्रलय या महाविनाश के समय सभी प्राणी अपनी व्यष्टि प्रकृति में लीन हो जाते हैं । व्यस्ति प्रकृति समस्टि प्रकृति में लीन हो जाती है । समस्टी प्रकृति परमात्मा में लीन हो जाती है । परंतु जब महासर्ग अर्थात महाउत्पत्ति अथवा महाविकास का समय आता है, जीवों के कर्मफल देने के लिए भगवान उन्मुख  हो जाते हैं

यह जीव महा प्रलय अर्थात महाविनाश के समय प्रकृति में लीन हो जाते हैं तो तत्व है प्रकृति का कार्य प्रकृति में ही लीन हुआ था और परमात्मा का अंश चेतन समुदाय परमात्मा में लीन हुआ था, अगर वह परमात्मा में लीन होने से पहले गुणों का त्याग कर देता है, तो परमात्मा में लीन होने पर सदा के लिए मुक्त हो जाता है अर्थात जन्म मरण बंधन से छूट जाता है

 

गीता। श्लोक  9/9….

मुझे कर्म नहीं बांधते….

 

भगवान कहते हैं कि हे (धनंजय) अर्जुन!  उन सृष्टि रचना आदि कर्मों में  अनासक्त और उदासीन की तरह रहते हुए , मुझे वे कर्म नहीं बांधते

महासर्ग के आदि में प्रकृति के परवश हुए प्राणियों की उनके कर्मों के अनुसार विविध प्रकार से रचना रूप जो कर्म है, उसमें मेरी आसक्ति नहीं है । कारण है कि उनमें मैं उदासीन की तरह रहता हूं । प्राणियों के उत्पन्न होने पर में हर्षित नहीं होता और उनके प्रकृति में लीन होने पर मैं दुखी भी नहीं होता

भगवान ने अपने आप को उदासीन की तरह कहा है । बात यह है कि मनुष्य  उस वस्तु से उदासीन होता है, जिस वस्तु की सत्ता वह मान्यता है । परंतु जिस संसार की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय होता है, उसकी भगवान के अतिरिक्त कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है । वे तो उदासीन की तरह रहते हैं । क्योंकि भगवान की दृष्टि में संसार की कोई सत्ता नहीं है

 

गीता श्लोक  9/10…

जगत का विविध प्रकार से परिवर्तन होता है ….

 

भगवान कहते हैं कि प्रकृति मेरी अध्यक्षतामें चराचर सहित संपूर्ण जगत की रचना करती है । हे कुंतीनंदन ! इसी कारण से जगत का विविध प्रकार से परिवर्तन होता है

भगवान कहते हैं कि मेरे से सत्ता स्फूर्ति पाकर ही प्रकृति चर और अचर, जड़ चेतन आदि भौतिक सृष्टि को रचती है । संसार में जो कुछ परिवर्तन हो रहा है, वह सब का सब प्रकृति के द्वारा ही हो रहा है । परंतु यह सब भगवान की अध्यक्षता में हो रहा है । भगवान की अनंत शक्तियां है । परंतु वे प्रकृति के द्वारा ही प्रकट होती है

भगवान संसार की रचना प्रकृति को लेकर करते हैं और प्रकृति संसार की रचना भगवान की अध्यक्षता में करती है । भगवान अध्यक्ष हैं, इसी कारण से जगत का विविध परिवर्तन होता रहता है

 

गीता श्लोक 9/11……

मूर्ख लोग मुझे श्रेष्ठ नहीं मानते..

भगवान कहते हैं कि मूर्ख लोग मेरे संपूर्ण प्राणियों के महान ईश्वर रूप श्रेष्ठ भाव को न जानते हुए मुझे मनुष्य शरीर के आश्रित मानकर अर्थात साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं।

जो प्रकृति और उसके कार्य का संचालक है,वह शासक है और प्रवर्तन है । जिसकी इच्छा के बिना वृक्ष का पत्ता तक नहीं हिलता, प्राणी अपने कर्मों के अनुसार जिन लोकौ में जाते हैं, उन उन लोकौ में प्राणियों पर शासन करने वाले जितने देवता हैं, उनका भी जो ईश्वर अर्थात मालिक है, जो सबको जानने वाला है । ऐसा वह मेरा महाभूतेश्वर रूप सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है

भगवान कहते हैं कि मेरे सर्वोत्कृष्ट भाव को जो सर्वथा स्वतंत्र है, क्षर से अतीत है और अक्षर से भी उत्तम है तथा वेदों में और शास्त्रों में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध है, ऐसे मेरे परम भाव को मूर्ख लोग नहीं जानते। इसी से हुए मेरे को मनुष्य जैसा मान कर मेरी अवज्ञा करते हैं

 

गीता श्लोक 9/12….

भगवान की अवज्ञा का फल…

 

भगवान कहते हैं कि जो आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृति का ही आश्रय लेते हैं, ऐसे अविवेकी मनुष्यों की सब आशाएं व्यर्थ होती हैं   सब शुभ कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं, अर्थात उनकी आशाएं कर्म और ज्ञान अर्थात समझ और जानकारी सात फल देने वाले नहीं होते

जो लोग भगवान से विमुख होते हैं,  सांसारिक भोग चाहते हैं, स्वर्ग चाहते हैं, तो उनकी यह सब कामना ही व्यर्थ होती हैं । कारण यह है कि नाशवान और परिवर्तनशील वस्तु की कामना पूरी होगी ही, ऐसा कोई नियम नहीं है । अगर किसी की इच्छा पूरी हो भी गई, तो उसे अधिक समय तक परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती । तब तक कितनी ही सांसारिक वस्तुओं की इच्छाएं की जाएं और उनका फल भी मिल जाए, तो भी वह व्यर्थ ही हैं

 

गीता श्लोक 9/13….

महात्मा लोग मेरा भजन करने वाले होते हैं …….

 

भगवान कहते हैं कि हे प्रथानंदन ! दैवी प्रकृति के आश्रित अनन्य मन वाले महात्मा लोग मुझे संपूर्ण प्राणियों आदि और अविनाशी समझकर  मेरा भजन करते हैं

 

दैवी संपत्ति में दैव  नाम परमात्मा का है और परमात्मा की संपत्ति दैवी संपत्ति कहलाती है । परमात्मा सत अर्थात सत्य है । अतः परमात्मा की प्राप्त करने वाले जितने भी गुण और आचरण हैं, उनके साथ-सत शब्द लगता है अर्थात वे सद्गुण सदाचार कहलाते हैं । जितने भी सद्गुण और सदाचार हैं, वह सब के सब भगवत स्वरूप हैं । भगवान के स्वरूप होने से उनको प्रकृति कहा जाता है । इसलिए देवी प्रकृति का सहारा लेना भी भगवान का सहारा लेना है । देवी संपत्ति के अधूरेपन में ही अभिमान पैदा होता है । मनुष्य में देवी संपत्ति तभी प्रकट होती है, जब उसका उद्देश्य केवल भागवत प्राप्त का हो जाता है । भगवत प्राप्ति के लिए दैवी गुणों  का आश्रय लेकर ही वह परमात्मा की तरफ बढ़ सकता है  और उसमें अभिमान नहीं आता । वरन उसके साधन में नित्य नए उत्साह आता है

 

गीता श्लोक 9/14…

भजन के प्रकार……

 

भगवान कहते हैं कि मुझ में नित्य निरंतर लगे हुए मनुष्य, दृढ़ वृत्ति होकर लगन पूर्वक साधन में लगे हुए और प्रेम पूर्वक कीर्तन करते हुए तथा मुझे नमस्कार करते हुए निरंतर  मेरी उपासना करते हैं

 

मनुष्य केवल भगवान में ही नीति युक्त रह सकते हैं सांसारिक भोगों और संग्रह में नहीं क्योंकि समय-समय पर भोगों से गलन होती है और संग्रह से भी उप्रति अर्थात अलग-अलग अथवा भी लगाव होता है परंतु भगवान की प्राप्ति का भगवान की तरफ चलने का जो एक उद्देश्य है, एक दृढ़ विचार होता है, उसमें कभी भी फर्क नहीं पड़ता

भगवान का अंश होने के कारण जीव का भगवान के साथ अखंड संबंध है । मनुष्य जब तक उसे संबंध को नहीं पहचानता तभी तक वह भगवान से विमुख रहता है । अपने को भगवान से अलग मानता है । परंतु जब वह भगवान के साथ अपने नित्य संबंध को पहचान लेता है, तो फिर वह भगवान के सम्मुख हो जाता है

 

गीता श्लोक 9/15…..

अन्य साधक…..

भगवान कहते हैं कि अन्य साधक ज्ञान यज्ञ के द्वारा एक ही भाव से अर्थात अभेद भाव से मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे भी कई साधक अपने को पृथक मानकर चारों तरफ मुख वाले मेरे विराट रूप की अर्थात संसार को मेरा विराट रूप मानकर स्वयं सेवक भाव से मेरी अनेक प्रकार से उपासना करते हैं

भगवान कहते हैं कि ज्ञान योगी साधन ज्ञान यज्ञ से अर्थात विवेक पूर्वक असद का त्याग करते हुए सर्वत्र व्यापक परमात्मा तत्व को और अपने वास्तविक स्वरूप को एक मानते हुए, निर्गुण निराकार स्वरूप की उपासना करते हैं । ऐसे की कर्मयोगी साधक अपने को सेवक मानकर और मात्र संसार का सेवक मानकर और मात्र संसार को भगवान का विराट रूप मानकर अपने शरीर इंद्रियां मन बुद्धि आदि की संपूर्ण क्रियायों को तथा पदार्थों को संसार की सेवा में ही लगा देते हैं । भगवान की कृपा से उनको संसार की सेवा करने से भी उनको पूर्णता की प्राप्ति हो जाती है ।

 

संसार का बीज  तो वृक्ष से पैदा होता  है । और वृक्ष पैदा करके बीज नष्ट हो जाता है । परंतु ये दोनों ही दोष मेरे में नहीं हैं । भगवान  कहते हैं कि मेरी तो कोई शुरुआत नहीं है । मैं बीज की तरह नष्ट नहीं होता हूं

 

गीता श्लोक 9/16, 17, 18.

अलग अलग उपासनाएं  हैं, परंतु उसी भगवान की कैसे

भगवान कहते हैं कि कृतु मैं हूं, मंत्र मैं हूं, श्रद्धा मैं हूं, औषधि मैं हूं, मंत्र मैं हूं, घृत में हूं, अग्नि मैं हूं और हवन रूप क्रिया भी मैं हूं, जानने योग्य पवित्र ओंकार,ऋग्वेद, सामवेद और  यजुर्वेद भी मैं ही हूं  । इस संपूर्ण जगत का पिता दाता, माता-पिता,  प्रभु, साक्षी निवास, आश्रय,सूर्योदय, उत्पत्ति,प्रलय, स्थान, निधान अर्थात भंडार तथा अविनाशी बीज भी में ही हूं

भगवान स्वयं कह रहे हैं कि विभिन्न रूपों में मैं ही हूं , तो विभिन्न रूपों में भी भगवान की पूजा की जा सकती है

 

गीता श्लोक  9/19…

अमृत और मृत्यु भी मैं ही हूं ..

 

भगवान कहते हैं कि है अर्जुन! संसार के हित के लिए मैं ही सूर्य से तपता हूं, मैं ही जल को ग्रहण करता हूं और फिर इस जल को मैं ही वर्षा के रूप में वर्षा कर देता हूं और तो क्या कहूं अमृत और मृत्यु तथा सत्य और असत्य मैं ही हूं

पृथ्वी पर जो भी अशुद्ध और गंदी चीज हैं जिनमें रोग पैदा होते हैं उनका शोषण करके प्राणियों को निरोग करने के लिए अर्थात औषधीय और जड़ी बूटियां में जो जहरीला भाग है उसका शोषण करने के लिए और पृथ्वी का जो जली भाग है जिससे अपवित्रता होती है उसको सूखने के लिए मैं सूर्य रूप से सूर्य बनकर तपता हूं सूर्य रूप से उन सबके लिए जली भाग को ग्रहण करके और उसे जल को शुद्ध तथा मीठा बनाकर समय आने पर वर्षा रूप से प्राणी मात्र के हित के लिए वर्षा कर देता हूं इससे प्राणी मात्र का जीवन चलता है आगे भगवान कहते हैं कि मैं ही अमृत हूं और मैं ही मृत्यु हूं मैं ही सत्य हूं और मैं ही सत्य हूं

 

गीता श्लोक    9/20..

कुछ लोग दिव्य भोग  भोगते हैं…

भगवान कहते हैं कि तीन वेदों में कहे हुए सकाम अनुष्ठान को करने वाले और सोमरस को पीने वाले, जो पाप रहित मनुष्य, यज्ञों के द्वारा, इंद्र रूप से मेरा पूजन करके, स्वर्ग प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं, वह पुण्य के फल स्वरुप, पवित्र इंद्रलोक को प्राप्त करके वहां स्वर्ग के देवता के दिव्या भोगों को भोगते हैं

भगवान कहते हैं कि संसार के लोग यहां के भोगों में ही लगे रहते हैं उनमें भी जो विशेष बुद्धिमान कहलाते हैं उनके हृदय में भी उत्पत्ति विनाश सुशील वस्तुओं का महत्व रहने से के कारण जब वह रिक, सा,  यजू, इन तीनों वेदों में कहे हुए सकाम कर्मों का तथा उनके फल का वर्णन सुनते हैं, तब वह यहां के भोगों की इतनी परवाह न करके स्वर्ग के भोगों के लिए ललचा उठाते हैं और स्वर्ग प्राप्ति के लिए वेदों में कहे हुए यज्ञों के अनुष्ठान में लग जाते हैं

गीताशलोक  9/21…..

भोगों की कामना करने वाले मनुष्य आवागमन (जन्म मृत्यु) को प्राप्त होते हैं …..

 

भगवान कहते हैं कि वह उसे विशाल स्वर्ग लोक के भोगों के भोग भोग कर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक में आ जाते हैं । इस प्रकार तीन वेदों में कहे हुए सकाम कर्म का आश्रय लिए हुए भोगों की कामना करने वाले मनुष्य आवागमन को प्राप्त होते हैं

भगवान बताते हैं कि स्वर्ग लोक भी बहुत विशाल है या विस्तृत है । वहां की आयु भी बहुत विशाल अर्थात लंबी है और वहां की भोग सामग्री बहुत विशाल है । इसलिए इंद्रलोक को विशाल कहा गया है । स्वर्ग की प्राप्त चाहने वाले न तो भगवान का आश्रय लेते हैं और न भगवत प्राप्त के किसी साधन का ही आश्रय लेते हैं । वह तो केवल तीनों वेदों में कहे हुए सकाम धर्म अर्थात अनुष्ठानों का ही आश्रय लेते हैं । इसलिए उनको  त्रिधर्म के शरण बताया गया है

ऐसे लोगों के प्रापक पुण्य क्षीण होने पर वे वापस पृथ्वी पर लौट आते हैं । अतः वे जन्म मरण के चक्कर से छूट नहीं पाते

 

गीता श्लोक 9/22….

भक्तों का योग क्षेम मैं वहां करता हूं ………

 

भगवान कहते हैं कि जो अनन्य भक्त मेरा चिंतन करते हुए मेरी भली भांति उपासना करते हैं, मुझ में निरंतर लगे हुए, उन भक्तों का योग क्षेम अर्थात अप्राप्त की  प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा का भार मैं वहन करता हूं

जो कुछ सुन देखने सुनने में और समझने में आता है, वह सब भगवान का स्वरूप ही है और उसमें जो कुछ परिवर्तन तथा चेष्टा हो रही है, वह सब की सब भगवान की लीला है । ऐसा जो दृढ़ता से मान लेते हैं या समझ लेते हैं, उनकी फिर भगवान के सिवाय कहीं भी महत्व बुद्धि नहीं होती । वह भगवान में ही लगे रहते हैं । इसलिए वे अन्य हैं । केवल भगवान में ही महता और प्रियता होने से उनके द्वारा स्वत भगवान का ही चिंतन होता है

अपने भक्तों के पास यदि कुछ नहीं है तो उनको वस्तु उपलब्ध कराना मेरा धर्म है और जो कुछ भी उनके पास है, उसकी रक्षा करना भी मेरा ही कर्तव्य है अर्थात अपने भक्तों का योग क्षेम मैं स्वयं बहन करता हूं

 

गीता श्लोक 9/2

अन्य देवताओं की पूजा, वास्तव में किसकी पूजा है

भगवान कहते हैं कि हे कुंती नंदन ! जो भी भक्त मनुष्य श्रद्धा पूर्वक अन्य देवताओं का पूजन करते हैं, वह भी मेरा ही पूजन करते हैं । परंतु वह अविधि पूर्वक करते हैं अर्थात वे देवताओं को मुझे अलग मानते हैं

जो देवताओं का पूजन करते हैं वह वास्तव में मेरा ही पूजन करते हैं क्योंकि तत्व से मेरे सिवाय अन्य कुछ है ही नहीं । अतः देवता भी तो मैं ही हूं । मेरे से अलग उन देवताओं की सत्ता है ही नहीं । वह मेरे ही स्वरुप हैं । अतः उनके द्वारा किया गया देवताओं का पूजन भी, वास्तव में मेरा ही पूजन है । परंतु है वह अविदधी पूर्वक । इसका तात्पर्य यह हुआ कि वह साधक मुझे उन देवताओं से अलग मानते हैं । जबकि देवता मेरे ही स्वरुप हैं

 

गीता श्लोक 9/24…..

विधि पूर्वक पूजा करना क्या है

भगवान कहते हैं क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूं, परंतु वे मुझे तत्व से नहीं जानते । इसी से उनका पतन होता है

जब जीव भोग और ऐश्वर्या में लग जाता है अर्थात अपने को भोगों का भोक्ता और संग्रह का मालिक मानकर उनका दास बन जाता है और भगवान से सर्व था विमुख हो जाता है तो फिर उनको यह बात याद ही नहीं रहती कि सबके भोक्ता और मालिक भगवान है । इसी से उनका पतन हो जाता है । परंतु जब इस जीव को चेत हो जाता है कि वास्तव में भोगों के भोक्ता और ऐश्वर्या के मालिक भगवान ही हैं, तो फिर भगवान में लग जाता है अर्थात ठीक रास्ते पर आ जाता है फिर उसका पतन नहीं होता

 

 

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