रुकमणी मंगल कथा ( भाग -1 )
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जरासंध को भायलो,सिसुपालो छो नाम।
चंदेरी को राजवी,करतो ओछा काम।।
जरासंध का जोर सूं,तप्यो घणो सिसुपाल।
जोरां मरदी सूं घणा,हड़प्या ऊंनै माल।।
जा पूग्यो अमरावती,जरासंध बी लार।
भिसमक जी की लाडली,परणूं रुकमण नार।।
मांड खँदाई रुकमणी,आओ किसन मुरार।
हाथ पकड़ लो सांवरा,जनम जनम को ब्वार।।
पाती बेगी बांचज्यो,मांडी रुकमण नार।
आई बपता टाळज्यो,जनम जात भरतार।।
नेणा बरसै धार छै,म्हारी सुणो पुकार।
टेम तथी टाळो मती,हरण करो थै आर।।
लगा डील कै सींगसो,सिसुपालो छै त्यार।
खड़ा बराती बारणै,रुकमी बीरो लार।।
पाती बांची सांवरो,रथड़ो ल्यो सणगार।
चाल पड़्या अमरावती,भिसमक जी कै द्वार।।
चलगी माता पूजबा,ले सखियां नै लार।
हाथ पकड़ कै सांवरो,हरली रुकमण नार।।
सिसुपालो पाछै पड़्यो,रुकमी ऊंकी लार।
पड़ी कोइनै पार सा,बांध्यो किसन मुरार।।
सरम्या मरग्यो सींगसो,मेंदी पाड़ी बा’र।
देख कँवारो बींद नै,रोयो सा सणगार।।
भावज मारै टाणक्यो,बोली लूंण लगार।
कसीक लाया बींदणी,मूंडो देखूं जार।।
देवर सा बरज्या घणा,क्यूं ना लाया नार।
नीची करली नाड़की,आया नाक कटार।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा
रूकमणी मंगल कथा ( भाग- 2 )
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रुकमी बीरो छोड दो,बेंण करी मनवार।
हाथ पगां नै खोल कै,चलग्या किसन मुरार।।
जोसी मोरत खाड दै,बोल्यो रुकमी बीर।
करणो ईंको ब्यावलो,सबको ईंमै सीर।।
कंकू पतरी मांड कै,देवां हाथूं हाथ।
करां पूगती द्वारका,बेगा आवै नाथ।।
सरतन करलां ब्याव को,करणा पेळा हाथ।
बर रुकमण को सांवरो,जनम जनम को साथ।।
लगन पूग ग्या द्वारका,सब कै छूट्यो छाव।
नूता सब कै मांडद्या,सांवरिया को ब्याव।।
गजानंद नै नूतद्या,मूसक का असवार।
गणपत ब्यादा थै हरो,पटको म्हांकी पार।।
नूतो द्यो केलास मं,इंदर नूत्यो लार।
करद्यो नूतो पूगतो,देवलोक मं जार।।
आग्या संदा फावणा,छोड छाड कै काम।
मूंडै बोली द्वारका,रूपाळो चतराम।।
लाग्यो मेंदी सींगसो,खाबा नै पकवान।
नाच्या नाच्या सब फरै,लाडो बणग्या क्हान।।
पसी भराई बींद की,चढग्या वांकै तेल।
मांडो घर मं रोपद्यो,पूज्या गाडी बेल।।
मांडो झीम्या फावणा,मन माफक छो खांण।
तरपत होगी आतमा,सब नै खायो तांण।।
भावज काजळ आंजद्यो,लाडो बेठ्यो चोक।
खडी नँगासी क्हान की,राजी संदो लोक।।
जाणो छै अमरावती,भिसमक जी कै द्वार।
सूना घर छोडां कस्यां,छावै फेरादार।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा
रुकमणी मंगल कथा ( भाग- 3 )
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नारद बोल्या क्हान सूं,सुण लो म्हारी बात।
सूंडाळा छै गणपती,लाजै घणी बरात।।
गजानंद नै छोड दां,यांनै करदां सेट।
गाळ्यां गासी बायरां,लांबो यांको पेट।।
ताळा कूंच्यां सूंप दो,गणपत पै बसवास।
देव रुखाळै द्वारका,थांका छै ये खास।।
बात मान ली क्हान नै,मलग्या फेरादार।
ताळा कूंच्यां सूंपदी,लागी कोनै बार।।
गणपत बी राजी घणा,म्हारो छै बसवास।
कूंच्यां वांनै टांकली,लेबा लाग्या सास।।
गणपत जी नै देख कै,नारद चलग्या पास।
सरम्यां मरता छोडग्या,ज्यादा खावो गास।।
नारद भरद्या कान नै,ताता होग्या तात।
गजानंद जी रूंसग्या,बगड़ी बणती बात।।
सरम्यां मरता छोडग्या,गणपत खावै खार।
बला खँदाया ऊंदरा,पोली करो गडार।।
चत मन सूं खोदी धरा,धरती पींदै जार।
पोली करदी ऊंदरा,ऊपर राखी गार।।
गया बराती गोयरै,नारद वांकी लार।
रथड़ा सूं पींदै पड़्या,पाड़ै संदा बा’र।।
नारद बोल्या क्हान सूं,जार करो मनवार।
गणपत को यो काम छै,राख्या फेरादार।।
मनजा गणपत लाडला,मती बगाड़ै काम।
धरती संदी खोद दी,आयो थारो नाम।।
धोखा सूं घर राख द्यो,करदो म्हारो न्याव।
क्हान परणसी थै पछै,प्हैली म्हारो ब्याव।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा
रुकमणी मंगल कथा ( भाग – 4 )
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खबद करी जद गणपती,मचग्यो हाहाकार।
हेर सगाई सांदरो,लाया सा परणार।।
रिध सिध वांकी बींदण्यां,गजानंद भरतार।
ओर रुखाळो मेलग्या,गणपत लेग्या लार।।
गणपत छोड्यो रूंसबो,रिध सिध वांकी लार।
बण्या बराती गणपती,खच्या अणद का तार।।
रथ मं बेठ्या क्हान जी,कर कै वे सणगार।
आगै छै बलराम जी,देवत सारा लार।।
पूग्या वे अमरावती,देद्या सा समचार।
अगवाणी भिसमक करी,कांकड़ बांध्यो आर।।
बाथां भर भर वे मल्या,घणी करी मनवार।
लाडो नरखै बायरां,भाया किसन मुरार।।
तोरण आया क्हान जी,सबी बराती लार।
सासू मां नै आरती,करी बींद की आर।।
गया बराती झीमबा,मनजोगो छो खांण।
घणी करी मनवार सा,सबनै खायो तांण।।
नाप तोल होयां पछै,तोरण दीयो मार।
गया मुळकता क्हान जी,बेठ्या मंडप जार।।
मां बापू कै साथ मं,आई रुकमण नार।
गठजोड़ा की गांठ सूं,बांध्या किसन मुरार।।
छै फेरा खायां पछै,कोल बचन की आंच।
बरसपती की बांधणी,कन्यादान की सांच।।
बचन निभाज्यो बींद सा,करज्यो मत इनकार।
फेरो फरकै सातवों,बणै बींद भरतार।।
हामळ भर ली क्हान नै,होग्या सा वे त्यार।
अगन देव की साख मं,परण्यां रुकमण नार।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा
रुकमणी मंगल कथा ( भाग – 5 )
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कँवर कलेवो झीमबा,गणपत चलग्या लार।
धाप्या कोनै गणपती,खाली सब भंडार।।
रिध सिध आई साधबा,जदी पड़ी सा पार।
तरपत होग्या गणपती,भरद्या सा भंडार।।
गणपत जी की मसखरी,खींकी लाग लपेट।
गाळ्यां गावै बायरां,लांबो यांको पेट।।
सीरो झीमो देवता,ईंमै थांको सीर।
खाली राखो पेट नै,पीज्यो सा थै नीर।।
बेठो थै बलराम जी,झीमो दूधी खीर।
नोरंगी या गाळ छै,कान्हा का थै बीर।।
जनवासा मं क्हान जी,लाया रुकमण लार।
रीत रकांणा साध कै,सखियां लेगी आर।।
समझ राखजै लाडली,मत करजै टकरार।
आज पराई मां जणी,मायड़ करै दुलार।।
पास पड़ोसी आपणा,वांसूं राखां हेत।
बरी बगत मं साथ दै,मायड़ करी सचेत।।
कांण कायदो राखजै,मती मारजै मान।
आवै कोनै ओळमो,बदै आपणी सान।।
मायड़ देदी सीख सा,नेणां आंसू धार।
सँभळाई सा बांधणी,बनड़ी करदी लार।।
पाळ पोस मोटी करी,करद्या पेळा हाथ।
दनिया को दसतूर छै,रोया भर भर बाथ।।
रोवै भिसमक बापजी,माथो पकड़ै बीर।
करै बिदाई साथण्यां,ईंमै सबको सीर।।
रुकमण पूजी डेळ नै,छूट्यो सा परिवार।
पोळ छूटगी प्हीर की,बसी द्वारका जार।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा






