Monday, April 27, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर

ग़ज़ल

बड़ी पूंजी वो अर्जित कर रहे हैं।

जो अपने ग़म को संचित कर रहे हैं।।

*

हवा को रक्तरंजित करने वाले।

स्वयं को ही कलंकित कर रहे हैं।।

*

नहीं जी पा रहे हैं ज़िंदगी को।

किसी नाटक को मंचित कर रहे हैं।।

*

ये मुरझाए हुए पेड़ों के पत्ते।

हमारे मन को विचलित कर रहे हैं।।

*’

उन्हीं फूलों का दुश्मन है ज़माना।

जो उपवन को सुगंधित कर रहे हैं।।

*

हमें पिंजरे में करके क़ैद “अनवर”।

वो अपनी जीत निश्चित कर रहे हैं।।

शकूर अनवर

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