ग़ज़ल
बड़ी पूंजी वो अर्जित कर रहे हैं।
जो अपने ग़म को संचित कर रहे हैं।।
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हवा को रक्तरंजित करने वाले।
स्वयं को ही कलंकित कर रहे हैं।।
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नहीं जी पा रहे हैं ज़िंदगी को।
किसी नाटक को मंचित कर रहे हैं।।
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ये मुरझाए हुए पेड़ों के पत्ते।
हमारे मन को विचलित कर रहे हैं।।
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उन्हीं फूलों का दुश्मन है ज़माना।
जो उपवन को सुगंधित कर रहे हैं।।
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हमें पिंजरे में करके क़ैद “अनवर”।
वो अपनी जीत निश्चित कर रहे हैं।।
शकूर अनवर






